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कैमरे की सीधी नज़र और ‘उल्टा’ राष्ट्रप्रेम: जब रील के ‘फ्रेम’ में तिरंगा ही उल्टा पड़ गया!

कोरबा (पब्लिक फोरम)। देशभक्ति का मौसम आते ही देश में तिरंगा यात्राओं की रफ्तार बढ़ जाती है। नारे गूंजते हैं, हाथों में तिरंगे लहराते हैं, कैमरे सक्रिय हो जाते हैं और सोशल मीडिया पर तस्वीरें पहुंचने लगती हैं। लेकिन कभी-कभी इस पूरी कवायद में एक छोटी-सी बात इतनी बड़ी हो जाती है कि पूरी देशभक्ति की पटकथा पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं।

कोरबा के बालको क्षेत्र में निकली एक तिरंगा यात्रा से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो इसी वजह से चर्चा में हैं। दावा है कि यात्रा के दौरान कुछ लोगों के हाथों में राष्ट्रीय ध्वज उल्टी दिशा में लहराता दिखाई दिया – यानी केसरिया रंग नीचे और हरा रंग ऊपर था।

अब सवाल यह नहीं कि गलती कितनी छोटी थी। सवाल यह है कि जिस राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान के नाम पर पूरा आयोजन किया गया, उसे हाथ में लेने से पहले उसकी मर्यादा और निर्धारित क्रम तक देखने की जहमत क्यों नहीं उठाई गई?

देशभक्ति सीधी थी, तिरंगा उल्टा कैसे हो गया?
बालको क्षेत्र में नगर पालिक निगम कोरबा के पार्षद एवं पूर्व नेता प्रतिपक्ष हितानंद अग्रवाल, भाजपा बालको मंडल अध्यक्ष डिलेंद्र यादव और वरिष्ठ नेत्री मंजू सिंह की अगुवाई में तिरंगा यात्रा निकाले जाने की जानकारी सामने आई है।
यात्रा में भारत माता की जय के नारे लगे। कार्यकर्ता उत्साह के साथ आगे बढ़े। कैमरे चले। तस्वीरें बनीं। माहौल देशभक्ति से सराबोर बताया गया।

लेकिन इसी बीच एक बेहद बुनियादी सवाल पीछे छूट गया – हाथ में जो तिरंगा है, वह सही दिशा में है भी या नहीं?
विडंबना देखिए कि यात्रा में शामिल लोगों के लिए देशभक्ति का नारा बिल्कुल सही था, लेकिन कथित तौर पर राष्ट्रीय ध्वज की दिशा ही गलत हो गई।
यानी आवाज में ‘भारत माता की जय’, लेकिन हाथ में तिरंगा उल्टा!

कैमरा सही था, बस तिरंगा गलत निकला!
आज के दौर में किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम की सफलता का एक पैमाना यह भी बन गया है कि कैमरे ने कितनी तस्वीरें लीं और सोशल मीडिया पर कितनी तेजी से पहुंचीं।
ऐसे में व्यंग्यात्मक सवाल पूछना स्वाभाविक है- क्या तिरंगा हाथ में लेने से पहले कैमरे का एंगल देखना ज्यादा जरूरी हो गया था?
क्योंकि अगर तस्वीर में नेता स्पष्ट दिखाई दे रहा है, समर्थक स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं, नारे स्पष्ट सुनाई दे रहे हैं और पूरा जुलूस कैमरे में कैद हो रहा है, तो हाथ में मौजूद तिरंगे की दिशा किसी को क्यों दिखाई नहीं दी?
यहां असली समस्या केवल एक झंडे के उल्टा होने की नहीं है। समस्या उस मानसिकता की है जिसमें प्रतीक महत्वपूर्ण हो जाता है, लेकिन प्रतीक की मर्यादा पीछे छूट जाती है।

सोशल मीडिया पर पोस्ट की जल्दी, फिर हटाने की जल्दी?
बताया जा रहा है कि यात्रा के बाद तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए गए। बाद में जब कुछ लोगों ने तस्वीरों में दिखाई दे रहे उल्टे तिरंगे की ओर ध्यान दिलाया, तो संबंधित तस्वीरें और वीडियो हटाए जाने की चर्चा सामने आई।
यदि ऐसा हुआ है तो मामला और दिलचस्प हो जाता है।
क्योंकि सवाल फिर यह नहीं रहेगा कि गलती कैसे हुई।

सवाल होगा – गलती का एहसास तिरंगा देखकर हुआ या सोशल मीडिया की टिप्पणियां देखकर?
यदि किसी कार्यक्रम में राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन में त्रुटि हो जाए तो उसे स्वीकार करना, सुधारना और भविष्य में सावधानी बरतना कहीं अधिक सम्मानजनक रास्ता है। तस्वीर हटाने से तस्वीर में हुई गलती का इतिहास तो नहीं बदलता।
इंटरनेट की दुनिया में पोस्ट हटाना आसान है, लेकिन लोगों की नजर से गुजर चुकी तस्वीरों को वापस लेना इतना आसान नहीं।

‘मानवीय भूल’ कहकर खत्म हो जाएगा मामला?
यहां एक और सवाल महत्वपूर्ण है।
यदि वास्तव में राष्ट्रीय ध्वज को निर्धारित तरीके से प्रदर्शित नहीं किया गया, तो क्या संगठन इसे महज ‘मानवीय भूल’ मानकर आगे बढ़ जाएगा?
गलती इंसान से हो सकती है। लेकिन राष्ट्रीय प्रतीकों के मामले में जिम्मेदारी का स्तर भी उतना ही बड़ा होना चाहिए- विशेषकर तब, जब आयोजन राजनीतिक संगठन के वरिष्ठ नेताओं और पदाधिकारियों की मौजूदगी में हो रहा हो।
देशभक्ति केवल नारा लगाने का नाम नहीं है।
देशभक्ति में संविधान के प्रति सम्मान है। राष्ट्रीय प्रतीकों की मर्यादा है। सार्वजनिक आचरण में जिम्मेदारी है। और सबसे बढ़कर, उस प्रतीक के प्रति अनुशासन है जिसे हाथ में लेकर हम दूसरों को देशप्रेम का संदेश देने निकलते हैं।

तिरंगा किसी फोटो का बैकग्राउंड नहीं, राष्ट्र का प्रतीक है
तिरंगा किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। वह किसी नेता, संगठन या सरकार का निजी प्रतीक भी नहीं है।
वह भारत गणराज्य का राष्ट्रीय ध्वज है।
इसलिए तिरंगा यात्रा निकालने वाले हर राजनीतिक दल और संगठन की जिम्मेदारी है कि वह जनता को केवल राष्ट्रभक्ति के नारे न सुनाए, बल्कि राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान और उसके सही उपयोग का उदाहरण भी प्रस्तुत करे।

क्योंकि राष्ट्रीय ध्वज को हाथ में लेकर निकला व्यक्ति केवल अपना फोटो नहीं खिंचवा रहा होता। वह सार्वजनिक रूप से एक राष्ट्रीय प्रतीक का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है।

बालको की इस घटना पर अंतिम फैसला किसी राजनीतिक दल, नेता या समर्थक को नहीं, बल्कि उपलब्ध तस्वीरों और तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।
लेकिन यदि तस्वीरों में राष्ट्रीय ध्वज वास्तव में उल्टा प्रदर्शित हुआ है, तो सवाल पूछना बिल्कुल जायज है-
देशभक्ति की इतनी जल्दी किस बात की थी कि तिरंगे को सीधा देखने का समय ही नहीं मिला?
और यदि सोशल मीडिया पर आपत्ति के बाद तस्वीरें हटाई गईं, तो दूसरा सवाल भी उतना ही जरूरी है—

तस्वीर हटाना समाधान है या गलती स्वीकार कर उससे सीख लेना?
देशभक्ति का सबसे सुंदर रूप वही है जिसमें प्रदर्शन कम और जिम्मेदारी ज्यादा हो।
तिरंगा हाथ में लेना आसान है।
तिरंगे की मर्यादा निभाना असली परीक्षा है।
और शायद अगली तिरंगा यात्रा से पहले नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक छोटा-सा काम जरूर कर लेना चाहिए- नारा लगाने से पहले झंडा देख लें कि सीधा है या नहीं।
क्योंकि देशभक्ति सीधी हो तो तिरंगा भी सीधा होना चाहिए।

जनता की राय:
क्या सार्वजनिक आयोजनों में राष्ट्रीय ध्वज के नियमों की अनदेखी को महज ‘मानवीय भूल’ कहकर छोड़ देना चाहिए? क्या राजनीतिक दलों को अपने कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को राष्ट्रीय ध्वज के सही उपयोग के संबंध में अनिवार्य रूप से प्रशिक्षित करना चाहिए?
क्या सोशल मीडिया पर फोटो खिंचवाने की हड़बड़ी में राष्ट्रीय ध्वज के नियमों को भूल जाना उचित है? नेताओं की इस घोर लापरवाही पर आपकी क्या राय है? “पब्लिक फोरम” पर अपने विचार हमें 750publicforum@gmail.com पर ज़रूर भेजें।

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