ऐपवा की चेतावनी, परिसीमन के नाम पर महिला आरक्षण में देरी मंजूर नहीं
नई दिल्ली (पब्लिक फोरम)। देश की आधी आबादी को राजनीतिक अधिकार देने के वादे पर सरकार की नीयत को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। नई दिल्ली के ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में आज ‘नेशनल कोहलिशन फॉर वूमेन रिजरवेशन’ (National Coalition for Women’s Reservation – महिला आरक्षण के लिए राष्ट्रीय गठबंधन) के बैनर तले आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में विभिन्न महिला और नागरिक संगठनों ने केंद्र सरकार से आगामी मॉनसून सत्र में महिला आरक्षण बिल को बिना किसी शर्त के तत्काल प्रभाव से लागू करने की पुरजोर मांग की है। संगठनों ने चेतावनी दी है कि आरक्षण को परिसीमन से जोड़कर टालने की राजनीति को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कानून बनने के बाद भी न्याय का इंतजार
गौरतलब है कि यह ऐतिहासिक विधेयक साल 2023 में संसद के दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पारित हो चुका है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के नाम से पारित इस कानून को लेकर देश भर की महिलाओं में एक नई उम्मीद जगी थी। लेकिन सरकार ने इसके जमीनी क्रियान्वयन को आगामी जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन (Delimitation – निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण) की जटिल शर्तों से बांध दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में उनका हक मिलने में कई साल लग सकते हैं। महिला संगठनों का आरोप है कि सरकार इस बहाने अपने सांप्रदायिक और महिला-विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ा रही है और महिलाओं को केवल चुनावी वादों के जाल में उलझाकर रख रही है।
“भाजपा सरकार का झूठ अब नहीं चलेगा”
प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वूमेन्स एसोसिएशन (AIPWA – ऐपवा) की राष्ट्रीय सचिव कॉमरेड श्वेता राज ने सरकार की नीतियों और नीयत पर तीखा हमला बोला। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा:
“पिछले लोकसभा सत्र में तमाम महिला संगठनों और विपक्ष ने मिलकर भाजपा के साम्प्रदायिक एजेंडे को पीछे धकेला था। लेकिन, दुखद है कि अभी भी महिला आरक्षण बिल जमीन पर लागू नहीं हो पाया है। जबकि 2023 में यह सदन में सर्वसम्मति से पारित हो चुका है। भाजपा सरकार लगातार भारत की महिलाओं से झूठ बोलती आ रही है। भाजपा सरकार की यह महिला विरोधी साजिश अब देश में नहीं चलेगी।”
आम महिलाओं के जीवन पर सीधा असर
इस राजनीतिक और प्रशासनिक खींचतान का सबसे गहरा और दर्दनाक असर देश के ग्रामीण, कामकाजी और आदिवासी समाज की उन आम महिलाओं पर पड़ता है, जो समाज के सबसे निचले पायदान से उठकर नीति-निर्माण में अपनी हिस्सेदारी का इंतजार कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर, पंचायत स्तर पर सफल नेतृत्व देने वाली कोई जमीनी महिला जब देश की संसद या राज्य की विधानसभा में पहुंचकर अपने समाज की सुरक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए कानून बनाने का सपना देखती है, तो परिसीमन और जनगणना जैसी तकनीकी अड़चनें उसके हौसलों को तोड़ देती हैं। इस बिल में देरी का सीधा मतलब है कि देश की आधी आबादी को उनके बुनियादी हक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से दूर रखना।
आंदोलनकारी महिला संगठनों की मुख्य मांगें
गठबंधन से जुड़े संगठनों ने आगामी मॉनसून सत्र को देखते हुए अपनी मांगों का एक स्पष्ट खाका तैयार किया है:
🔹 बेशर्त कार्यान्वयन: महिला आरक्षण बिल को बिना किसी पूर्व शर्त (जैसे जनगणना या निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण) के तुरंत लागू किया जाए।
🔹 मॉनसून सत्र में हो फैसला: संसद के आने वाले मॉनसून सत्र में ही इस कानून को अमलीजामा पहनाया जाए ताकि आने वाले चुनावों में महिलाओं को इसका लाभ मिले।
🔹 वर्तमान सीटों पर ही मिले हक: इस कानून को देश की वर्तमान लोकसभा और विधानसभा सीटों पर ही तुरंत प्रभावी किया जाए, न कि नई सीटों के गठन का इंतजार किया जाए।
यह आंदोलन सिर्फ संसद या विधानसभा में कुछ सीटें हासिल करने की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और उनके वजूद का सवाल है। यदि सरकार आगामी मॉनसून सत्र में इस बिल को बिना किसी शर्त के जमीन पर नहीं उतारती है, तो यह देश की करोड़ों महिलाओं के भरोसे के साथ एक बड़ा विश्वासघात होगा। आने वाले दिनों में यह चिंगारी सड़कों से लेकर संसद तक एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकती है, जो देश की भावी राजनीति की दिशा तय करेगी।





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