नोएडा में मजदूरों का संघर्ष और सरकारी दमन: जब रोटी की माँग को बनाया गया “अपराध”
नोएडा (पब्लिक फोरम)। देश में मजदूर प्रतिरोध की जो लहर पिछले कुछ महीनों से पानीपत, सूरत, सिंगरौली और मानेसर की सड़कों पर उठी थी, वह अब नोएडा-ग्रेटर नोएडा में आकर एक तूफान का रूप ले चुकी है। और इस तूफान का जवाब योगी सरकार ने बातचीत से नहीं, बल्कि लाठी और हथकड़ी से दिया है।
भूख और बेबसी की जमीन पर उगा आंदोलन
दिल्ली-एनसीआर की चमचमाती फैक्टरियों के पीछे एक काली सच्चाई छिपी है। बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल और झारखंड से रोजी-रोटी की तलाश में आए लाखों प्रवासी मजदूरों को यहाँ महज ग्यारह से बारह हजार रुपये महीने में 12-12 घंटे खटाया जाता है। इस तनख्वाह में मकान का किराया चुकाएँ, आने-जाने का खर्च उठाएँ, और घर भी पैसे भेजें – तो खाना किस खाते से खाएँ?
पक्की नौकरी नहीं, ESI नहीं, PF नहीं, बोनस नहीं, ओवरटाइम का उचित भुगतान नहीं। कानून की किताब में जो अधिकार लिखे हैं, वे इन मजदूरों के लिए सिर्फ कागज पर ही रहते हैं।
यही बेबसी आज सड़क पर उतरी है।
ऋचा ग्लोबल से डिक्सन तक – कंपनियाँ कई, दर्द एक
नोएडा और आसपास के औद्योगिक इलाकों में ऋचा ग्लोबल एक्सपोर्ट्स, मदरसन, केंट आरओ सिस्टम्स, डिक्सन टेक्नोलॉजीज, रेनबो फैबआर्ट, स्पार्क मिंडा साई, आइटल मोबाइल डिवाइसेज और अनुभव अपैरल्स – इन तमाम कंपनियों के मजदूर पुलिसिया दमन के बावजूद अपनी माँगों पर डटे हुए हैं।
इन प्रदर्शनों में महिला श्रमिकों की अगुवाई विशेष रूप से उल्लेखनीय है। परंतु मानेसर और नोएडा में पुरुष पुलिसकर्मियों ने इन महिला मजदूरों के साथ बर्बरता की – उन पर लाठियाँ बरसाई गईं और कई को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।

नेताओं को घर में कैद, वकीलों को भी नहीं बख्शा
ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस (ऐक्टू) के गौतम बुद्ध जिला कमिटी अध्यक्ष कामरेड अमर सिंह समेत अनेक यूनियन नेताओं को उनके घरों में नजरबंद कर दिया गया। यहाँ तक कि गिरफ्तार मजदूरों को कानूनी सहायता देने पहुँचे वकीलों को भी नोएडा पुलिस ने नहीं छोड़ा।
यह केवल दमन नहीं – यह न्याय तक पहुँचने के रास्ते को बंद करने की कोशिश है।
जलियांवाला बाग की याद – 107 साल बाद भी वही तस्वीर?
13 अप्रैल 1919 – जलियांवाला बाग। जनरल डायर ने निहत्थे भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाईं थीं।
आज ठीक उसी तारीख को ऐक्टू ने उत्तर प्रदेश सरकार की तुलना उसी जनरल डायर से की है। ऐक्टू महासचिव राजीव डिमरी के शब्दों में – जैसे 1919 में अंग्रेजी हुकूमत ने सत्ता की ताकत से आवाज को दबाने की कोशिश की थी, वैसे ही आज योगी सरकार की पुलिस रोटी माँगने वाले मजदूरों पर भारी हिंसा पर आमादा है।
लेबर कोड – अधिकारों का अंतिम अपहरण?
ऐक्टू समेत संघ-भाजपा से जुड़ी भारतीय मजदूर संघ को छोड़कर सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठन केंद्र सरकार के चार श्रम कोड कानूनों का विरोध कर रहे हैं। बरौनी, सोनीपत, सूरत, कोरबा, सिंगरौली, पेटनीकोट, कोटा और बक्सर – देश के कोने-कोने में मजदूर इन काले कानूनों के खिलाफ संघर्षरत हैं। 12 घंटे की जबरन कार्यशिफ्ट, ओवरटाइम का उचित भुगतान न मिलना, और ठेका मजदूरों का खुला शोषण – ये माँगें हड़ताल के बाद हड़ताल होने के बावजूद मोदी सरकार ने नहीं मानी हैं।
ऐक्टू की चेतावनी – दमन से आंदोलन नहीं दबता, भड़कता है
ऐक्टू ने केंद्र और राज्य सरकारों को स्पष्ट चेतावनी दी है – सभी गिरफ्तार मजदूरों और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं को तत्काल रिहा किया जाए। और अगर मालिकों व सरकारों ने अपनी जिद नहीं छोड़ी, तो यह आंदोलन दमन से दबेगा नहीं – आनेवाले दिनों में और तेज होगा।
देश के मजदूर आज कॉरपोरेट मुनाफाखोरी और सत्ता के गठजोड़ को साफ देख रहे हैं – और वे इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।





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