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“मुफ्त” ई-केवाईसी की असल कीमत: सीएससी संचालकों की जेब पर बोझ, सिस्टम की खामियों का दंश कौन भोगे?

रायपुर/कोरबा (पब्लिक फोरम)। महतारी वंदन योजना के तहत अनिवार्य की गई ई-केवाईसी प्रक्रिया को सरकार ने भले ही “नि:शुल्क” घोषित किया हो, लेकिन जमीनी हकीकत इस दावे की पोल खोलती है। कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) संचालक आज उस “मुफ्त सेवा” की भारी कीमत चुका रहे हैं – अपनी जेब से, अपने कर्ज से और अपने सम्मान से। उपकरणों की खरीद के लिए लिया गया कर्ज, महीनों की देरी से मिलने वाला मामूली भुगतान और तकनीकी खामियों का सारा गुस्सा – यह सब उन संचालकों के हिस्से आ रहा है, जो खुद सीमित संसाधनों में काम कर रहे हैं।

कागज पर मुफ्त, जमीन पर कीमत
सरकारी योजनाओं की असली परीक्षा तब होती है, जब वे कागज से निकलकर गांव की गलियों और शहर के मोहल्लों में उतरती हैं। महतारी वंदन योजना के तहत पात्र महिला हितग्राहियों के लिए ई-केवाईसी अनिवार्य किया गया और इसे “नि:शुल्क सेवा” के रूप में प्रचारित किया गया – ताकि कोई भी महिला इस योजना के लाभ से वंचित न रहे।
नीयत नेक थी। लेकिन नीति के पहिये जब जमीन पर घुमे, तो एक कड़वी सच्चाई सामने आई – इस “मुफ्त सेवा” की असल लागत किसी और के कंधों पर लाद दी गई।

लाखों की लागत, नौ रुपये का मेहनताना
ई-केवाईसी के लिए जरूरी उपकरण – लैपटॉप, हाई-स्पीड इंटरनेट कनेक्शन, आईरिस स्कैनर – इनमें से किसी की भी व्यवस्था सरकार की ओर से नहीं की गई। नतीजा यह है कि सीएससी संचालकों को यह सारा ढांचा खुद खड़ा करना पड़ा। कई संचालकों ने बताया कि उन्होंने बाजार से कर्ज लेकर उपकरण खरीदे, इस उम्मीद में कि भुगतान मिलेगा तो कर्ज चुकाएंगे।
लेकिन भुगतान की तस्वीर और भी निराशाजनक है।

प्रत्येक सफल ई-केवाईसी पर लगभग “15 रुपये” तय किए गए हैं। इसमें से टीडीएस की कटौती के बाद संचालकों के हाथ आते हैं मात्र “9 रुपये”। इन नौ रुपयों में बिजली का बिल, इंटरनेट का खर्च, उपकरण की किश्त और खुद की मेहनत – सब कुछ निकालना है। यह गणित किसी भी हाल में नहीं बैठता।

नवंबर का काम, मार्च में भुगतान – व्यवस्था कितनी लाचार?

पैसे कम मिलें, यह तो एक पीड़ा है – लेकिन वह भी समय पर मिलें, तो शायद गुज़ारा हो जाए। मगर यहाँ तो देरी ने सारे हिसाब उलट दिए हैं।

जानकारी के मुताबिक, “नवंबर 2025” में किए गए कार्यों का भुगतान “मार्च 2026” में मिला। यानी चार महीने की प्रतीक्षा। उस दौरान संचालक का कर्ज बढ़ता रहा, ब्याज जुड़ता रहा और परिवार की जरूरतें दरवाजा खटखटाती रहीं।
यह महज एक संचालक की कहानी नहीं है – यह उस पूरी व्यवस्था का आईना है, जिसमें नीति बनाने वालों और उसे लागू करने वालों के बीच एक बड़ी खाई है।

जनता का गुस्सा, संचालक की मुश्किल
इस पूरी उलझन में सबसे तकलीफदेह पहलू है – आम जनता का आक्रोश। जब सर्वर डाउन होता है, नेटवर्क धीमा होता है या प्रक्रिया में देरी होती है, तो लंबी कतारों में खड़ी थकी-हारी महिलाएं अपना गुस्सा सीएससी संचालक पर निकालती हैं। वह संचालक, जो खुद उसी टूटी व्यवस्था का शिकार है, जनता की नजर में “सरकारी नुमाइंदा” बन जाता है।

सिस्टम की गलती, इंसान भुगते – यही इस कहानी का सबसे दर्दनाक मोड़ है।

तीन बुनियादी सवाल, जिनका जवाब जरूरी है।

यह स्थिति कुछ ऐसे सवाल छोड़ जाती है, जिन्हें अनदेखा करना अब संभव नहीं:

– क्या “मुफ्त सेवा” का मतलब यह है कि उसकी लागत किसी कमजोर कड़ी पर डाल दी जाए?
– क्या बिना पर्याप्त संसाधन और पारदर्शी भुगतान नीति के कोई भी जन-योजना सफल हो सकती है?
– और सबसे जरूरी – क्या यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ है?

सुधार अभी नहीं, तो कब?
विशेषज्ञों और जमीनी कार्यकर्ताओं का मानना है कि सरकार को तत्काल तीन मोर्चों पर काम करना होगा:

– स्पष्ट और समयबद्ध भुगतान व्यवस्था – ताकि संचालक कर्ज के बोझ तले न दबें।
– उपकरण खरीद में सरकारी सहायता या सब्सिडी – ताकि डिजिटल सेवा की नींव मजबूत हो।
– तकनीकी ढांचे को दुरुस्त करना – ताकि सर्वर डाउन और नेटवर्क की समस्याएं आम लोगों और संचालकों, दोनों को परेशान न करें।

अन्यथा, आज जो सीएससी संचालक किसी तरह टिके हैं, वे कल इस काम से मुँह मोड़ लेंगे ये और तब योजना कितनी भी अच्छी हो, उसे जमीन तक पहुँचाने वाला कोई नहीं रहेगा।

घोषणा नहीं, क्रियान्वयन बोलता है
किसी भी सरकारी योजना की सफलता उसकी शानदार घोषणा में नहीं, बल्कि उसके ईमानदार और व्यावहारिक क्रियान्वयन में होती है। महतारी वंदन योजना की ई-केवाईसी का यह अनुभव एक बड़ा सबक है – नीतियाँ बनाते समय उन लोगों की आवाज़ सुनी जानी चाहिए, जो उन्हें जमीन पर उतारते हैं।

वरना “मुफ्त” का यह तमगा, किसी की मेहनत और आँसुओं की कीमत पर टिका रहेगा – और वह कीमत, हम सब चुकाएंगे।

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