भगत सिंह की 119वीं जयंती. चुनाव आयोग, यूपीआई और विदेशी नीतियों को लेकर भाकपा माले महासचिव ने केंद्र सरकार को घेरा
पटना (पब्लिक फोरम)। भाकपा-माले (CPI-ML) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। सोमवार को गांधी मैदान के समीप भगत सिंह चौक पर शहीद-ए-आजम भगत सिंह की 119वीं जयंती के अवसर पर आयोजित ‘संविधान बचाओ, लोकतंत्र बचाओ’ जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार भगत सिंह के समाजवादी सपनों को कुचल रही है। इस दौरान उन्होंने एसआईआर (SIR), यूपीआई (UPI) चार्ज और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर भी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए।
लोकतंत्र और चुनाव आयोग पर उठाए सवाल
सभा को संबोधित करते हुए भट्टाचार्य ने दावा किया कि भगत सिंह महज 23 वर्ष की उम्र में शहीद हो गए थे और आज उसी उम्र के युवा सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ‘एसआईआर’ के नाम पर नागरिकों के वोट देने का अधिकार छीन रही है और देश के संसाधनों को मुट्ठी भर पूंजीपतियों को सौंप रही है।
चुनाव आयोग की वर्तमान व्यवस्था पर अविश्वास जताते हुए भाकपा माले महासचिव ने कहा, “ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में इस देश का चुनाव आयोग नहीं चल सकता।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आज सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को जेल में डाला जा रहा है और असहमति की आवाजों को दबाया जा रहा है।

यूपीआई चार्ज और आम जनता पर असर
आर्थिक नीतियों की आलोचना करते हुए भट्टाचार्य ने दावा किया कि यूपीआई (डिजिटल पेमेंट) के इस्तेमाल पर चार्ज लगाने का फैसला आम जनता और रोजी-रोजगार करने वाले छोटे तबके पर सत्ता का सीधा हमला है। उन्होंने कहा कि भगत सिंह एक ऐसे समाजवादी देश का सपना देखते थे, जहां समानता हो और संसाधनों पर सबका समान अधिकार हो, लेकिन वर्तमान नीतियां इसके विपरीत काम कर रही हैं।
साम्राज्यवाद और अमेरिकी व्यापार समझौते का विरोध
भगत सिंह के पूंजीवाद और साम्राज्यवाद विरोधी विचारों का हवाला देते हुए भट्टाचार्य ने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्यवादी देश अमेरिका विश्वभर में अशांति फैला रहा है और केंद्र सरकार उसकी ‘पिठ्ठू’ बनी हुई है।
भाकपा माले नेता ने दावा किया कि अमेरिका के साथ होने वाला व्यापार समझौता भारत के किसानों और देश के आंतरिक हितों के लिए खतरनाक साबित होगा। उन्होंने बताया कि भगत सिंह के ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ के नारों के साथ आज के समय में ‘फासीवाद हो बर्बाद’ का नारा भी जुड़ गया है।
यह बयान राजनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश के प्रमुख विपक्षी दलों द्वारा उठाए जा रहे उन मुख्य मुद्दों को रेखांकित करता है, जो सीधे तौर पर आम नागरिकों से जुड़े हैं। मताधिकार की सुरक्षा, चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता, और रोजमर्रा के लेन-देन (यूपीआई) पर संभावित आर्थिक बोझ ऐसे विषय हैं जिनका सीधा प्रभाव आम जनता, छोटे व्यापारियों और कामकाजी वर्ग पर पड़ता है। इसके अलावा, विदेशी व्यापार समझौतों का कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाला प्रभाव किसानों के अधिकारों की दृष्टि से एक संवेदनशील मुद्दा है।
सभा के अंत में उपस्थित लोगों ने संविधान, लोकतंत्र, मताधिकार की रक्षा करने और भगत सिंह के समाजवादी भारत के सपने को साकार करने के लिए संकल्प लिया। वामपंथी दल इन मुद्दों को लेकर भविष्य में अपना राजनीतिक संघर्ष और तेज कर सकते हैं। हालांकि, इन राजनीतिक आरोपों पर चुनाव आयोग या केंद्र सरकार की ओर से आगामी आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा, जो इस राजनीतिक विवाद की आगे की दिशा तय करेगी।






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