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ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग: वाम दलों का 26 सितंबर से देशव्यापी अभियान

SIR पर रोक और चुनाव आयोग में बदलाव की मांग.
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर उठे सवाल

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नई दिल्ली (पब्लिक फोरम)। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया रोकने और निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता बहाल करने की मांग को लेकर वाम दलों ने देशव्यापी विरोध अभियान का आह्वान किया है। CPI, CPI(M) और CPI(ML)-लिबरेशन समेत पांच वाम दलों के संयुक्त बयान के अनुसार यह अभियान 26 सितंबर से 2 अक्टूबर 2026 तक चलेगा। यह घोषणा निर्वाचन आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर उठे सवालों के बीच की गई है।

निर्वाचन आयोग के कामकाज पर वाम दलों ने जताई चिंता
नई दिल्ली स्थित AKG भवन में हुई बैठक में वाम दलों ने मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की। बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली में बदलाव की मांग की गई।
वाम दलों की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में सामने आई है, जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में निर्वाचन आयोग के भीतर मतदाता सूची, SIR और नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े कुछ निर्णयों पर दो निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, निर्वाचन आयुक्त एस. एस. संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर कुछ निर्णयों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं।

फॉर्म-6 में बदलाव भी विवाद का विषय
विवाद का एक प्रमुख मुद्दा फॉर्म-6 में SIR से संबंधित जानकारी जोड़े जाने का भी रहा है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म में ऐसा प्रावधान जोड़ा गया था, जिसमें आवेदक से पिछली SIR के दौरान स्वयं, माता-पिता या दादा-दादी का नाम मतदाता सूची में होने से संबंधित जानकारी मांगी गई थी। दो निर्वाचन आयुक्तों ने इस बदलाव को लेकर आपत्ति जताई थी।
30 सितंबर को निर्वाचन आयोग ने SIR पूरा हो चुके राज्यों में ECINET पोर्टल पर फॉर्म-6 से संबंधित यह विवादित घोषणा हटा दी। आयोग के इस कदम की खबर उसी दिन सामने आई।

हालांकि, निर्वाचन आयोग ने SIR से जुड़े अपने फैसलों का बचाव करते हुए कहा है कि आयोग के निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। 26 सितंबर को आयोग की बैठक के बाद जारी सरकारी सूचना में भी संबंधित फैसलों को पूरे आयोग की मंजूरी प्राप्त होने की बात कही गई।

वाम दलों की चार प्रमुख मांगें
संयुक्त बयान में वाम दलों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग की है। इसके साथ ही उन्होंने SIR प्रक्रिया रोकने और मतदाता सूची से गलत तरीके से बाहर किए गए लोगों का मतदान अधिकार बहाल करने की मांग रखी है।

वाम दलों की प्रमुख मांगें हैं—
*मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाया जाए।
*SIR प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए।
*मतदाता सूची से गलत तरीके से हटाए गए लोगों का मतदान अधिकार बहाल किया जाए।
*निर्वाचन आयोग की स्वतंत्र और लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली बहाल की जाए।
*निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव किया जाए।

नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव की भी मांग
वाम दलों ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए ऐसी चयन समिति बनाने की मांग की है, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों।
यह मांग सुप्रीम कोर्ट के Anoop Baranwal मामले में 2023 में निर्धारित व्यवस्था के संदर्भ में रखी गई है। बाद में संसद द्वारा बनाए गए कानून में चयन समिति की संरचना में बदलाव किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले में इस बदलाव को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया गया था।

26 सितंबर से 2 अक्टूबर तक विरोध अभियान
वाम दलों ने अपनी देशभर की इकाइयों से 26 सितंबर से 2 अक्टूबर तक सप्ताहभर विरोध कार्यक्रम आयोजित करने का आह्वान किया है। उनके अनुसार, 28 सितंबर को भगत सिंह की जयंती और 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
इस अभियान को वाम दल निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता, मताधिकार तथा चुनावी लोकतंत्र से जुड़े सवालों से जोड़ रहे हैं।

पूरे मामले में निर्वाचन आयोग का पक्ष भी सामने आया है। आयोग ने कहा है कि SIR से संबंधित निर्णय सामूहिक रूप से लिए गए और आंतरिक विचार-विमर्श में अलग-अलग टिप्पणियां या आपत्तियां निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती हैं। 26 सितंबर को आयोग ने SIR के दौरान कुछ मतदाताओं से संबंधित मामलों में बूथ स्तर के अधिकारियों को घर जाकर दस्तावेज एकत्र करने और उन्हें संबंधित निर्वाचन अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए थे।

इस बीच, आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर न्यायिक स्तर पर भी सवाल उठाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने CEC ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में आयोग के निर्णयों से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई के लिए मामला स्वीकार किया है। याचिका में आरोप है कि कुछ फैसलों में आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों से अलग अपना पक्ष रखते हुए निर्णयों को सर्वसम्मत बताया है।

निर्वाचन आयोग मतदाता सूची तैयार करने और चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था है। इसलिए मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्पष्ट नियमों का महत्व सीधे मतदाताओं के अधिकार से जुड़ता है।

वर्तमान विवाद में एक ओर विपक्षी और वाम दल आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं आयोग अपने निर्णयों को नियमों और सामूहिक प्रक्रिया के अनुरूप बता रहा है। ऐसे में आगे की स्थिति राजनीतिक विरोध के साथ-साथ न्यायिक और संस्थागत प्रक्रियाओं से भी तय होगी।

मतदाता सूची केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि चुनाव में नागरिक की भागीदारी का आधार है। इसलिए SIR, मतदाता सूची में बदलाव और निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का समाधान पारदर्शी प्रक्रिया, स्पष्ट जवाब और संस्थागत विश्वसनीयता के आधार पर होना महत्वपूर्ण है। आने वाले दिनों में वाम दलों का देशव्यापी अभियान और न्यायिक प्रक्रिया इस पूरे विवाद की दिशा तय करने वाले प्रमुख घटनाक्रम होंगे।

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