बिलासपुर (पब्लिक फोरम)| जब दुनिया अपनी रोज़मर्रा की भागदौड़ में डूबी थी, तब बिलासपुर के लालखदान (महमंद पंचायत) में एक छोटी-सी जगह पर इतिहास की एक अनसुनी दास्तान को याद किया जा रहा था। बुधवार को कामरेड दरसराम साहू के 36वें शहादत दिवस पर एक सादगीपूर्ण लेकिन भावपूर्ण संकल्प समारोह का आयोजन किया गया। इस मौके पर मज़दूर, किसान, छात्र, नौजवान और वरिष्ठ नागरिक – सब एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे, जैसे खुद कामरेड की विरासत उन्हें एकजुट कर रही हो।
झंडे की सलामी से शुरू हुआ श्रद्धा का सिलसिला
कार्यक्रम की शुरुआत शहीद कामरेड दरसराम साहू स्मृति भवन के पास स्थापित उनकी मूर्ति पर “झंडारोहण” और “माल्यार्पण” से हुई। इसके बाद उपस्थित सभी लोगों ने दो मिनट का मौन रखकर शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित की।

वह दो मिनट का मौन महज़ एक रस्म नहीं था – वह उन तमाम अनकहे दर्दों की गूँज थी जो दशकों से इस मिट्टी में दबी है। कुछ बुजुर्गों की आँखें नम थीं, कुछ नौजवानों के मुट्ठियाँ भिंची हुई थीं – संकल्प की आग जैसे फिर से सुलग रही थी।
कामरेड दरसराम साहू का नाम छत्तीसगढ़ के मज़दूर और किसान आंदोलन के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। वे एक ऐसे संघर्षशील नेता थे जिन्होंने शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं की। उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि एक साधारण इंसान भी असाधारण साहस के साथ अन्याय से लड़ सकता है।
36 साल बाद भी उनकी याद लालखदान की मिट्टी में जीवित है – इस बात से ही उनकी विरासत की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है।

सादगी में था संदेश की गहराई
समारोह में कोई बड़ा मंच नहीं था, कोई तामझाम नहीं – लेकिन जो था, वह था एक सच्चा जज़्बा। यही सादगी इस कार्यक्रम को खास बनाती थी। कामरेड दरसराम साहू ने जिस तरह ज़मीन से जुड़कर संघर्ष किया, उसी तरह आज उनके स्मरण में आयोजित यह कार्यक्रम भी ज़मीन से जुड़ा रहा।

लालखदान – जो महमंद पंचायत का एक सामान्य-सा गाँव है – आज एक बार फिर इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।
शहादत दिवस केवल बीते हुए कल को याद करने का अवसर नहीं होता – यह आने वाले कल के लिए संकल्प लेने का भी मौका होता है। इस समारोह में उपस्थित लोगों ने यही संकल्प लिया – कि जब तक मज़दूरों को उनका हक नहीं मिलता, जब तक किसानों की आवाज़ सुनी नहीं जाती, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा।
कामरेड दरसराम साहू की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी – यही इस समारोह का मर्म था, यही उनकी विरासत का वादा है।
“शहीद मरते नहीं – वे उन लोगों की आत्मा में जीते हैं जो उनके सपनों को आगे ले जाते हैं।”





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