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भाकपा (माले) प्रमुख दीपांकर भट्टाचार्य की तस्वीर के गलत इस्तेमाल पर पार्टी ने जताई कड़ी आपत्ति

नई दिल्ली (पब्लिक फोरम)। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन ने एक बयान जारी कर अपने महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य की तस्वीर के गलत इस्तेमाल पर गहरी नाराजगी और कड़ी आपत्ति जताई है। पार्टी की केंद्रीय कमेटी के अनुसार, कुछ मीडिया घरानों और समाचार पोर्टलों ने पश्चिम बंगाल के तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के एक नेता के घर से बेहिसाब नकदी बरामद होने की खबर में वामपंथी नेता दीपांकर भट्टाचार्य की तस्वीर का इस्तेमाल किया है। पार्टी ने इसे छवि बिगाड़ने की कोशिश बताते हुए संबंधित मीडिया संस्थानों से तुरंत भूल-सुधार करने और माफीनामा जारी करने की मांग की है।

क्या है पूरा मामला?
इस पूरे विवाद के पीछे समान नाम होना एक बड़ी वजह बनकर सामने आया है। हाल ही में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के एक स्थानीय नेता, जिनका नाम भी दीपांकर भट्टाचार्य है, के परिसर से कथित तौर पर भारी मात्रा में बेहिसाब नकदी बरामद होने की बात सामने आई थी। इस खबर को प्रसारित करते समय कुछ समाचार पत्रों और डिजिटल मीडिया पोर्टलों ने टीएमसी नेता की जगह भाकपा (माले) के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य की तस्वीर लगा दी। पार्टी का आरोप है कि इस लापरवाही के कारण आम जनता के बीच उनके नेता की छवि को नुकसान पहुँचा है।

पार्टी ने जताई कड़ी निंदा

भाकपा (माले) की केंद्रीय कमेटी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में इस कृत्य की आलोचना की गई है। बयान में कहा गया:
“हम गलत सूचना फैलाने और जान-बूझकर बदनाम करने के इस शरारतपूर्ण कृत्य की कड़ी
निंदा करते हैं। हम ऐसे सभी समाचार पत्रों और मीडिया पोर्टलों से आग्रह करते हैं कि वे अपनी इस गलती को तत्काल सुधारें और अपने पाठकों के लिए एक माफीनामा तथा स्पष्टीकरण जारी करें।”

पत्रकारिता के सरोकार और विश्वसनीयता का संकट
यह घटना आज के दौर में मीडिया की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति की छवि उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। दशकों के राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष के बाद अर्जित की गई साख जब इस तरह की तकनीकी या लापरवाही भरी गलतियों के कारण धूमिल होती है, तो उसका असर केवल उस व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उनसे जुड़े कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भावनाओं पर भी पड़ता है।

इस विवाद के मुख्य पहलू इस प्रकार हैं:
– तथ्यों की अनदेखी: एक ही नाम के दो अलग-अलग राजनीतिक दलों के व्यक्तियों के बीच अंतर न कर पाना मीडिया की बुनियादी जिम्मेदारी पर सवाल उठाता है।
– भ्रम की स्थिति: इस तरह की खबरों से पाठकों और आम नागरिकों के बीच असमंजस की स्थिति पैदा होती है।
– नैतिक जिम्मेदारी की मांग: पार्टी ने मीडिया से केवल तस्वीर हटाने को ही नहीं कहा है, बल्कि पाठकों के सामने सच रखने के लिए औपचारिक स्पष्टीकरण की मांग भी की है।

एक सजग प्रयास की आवश्यकता
सूचनाओं के तेजी से प्रसारित होने वाले इस डिजिटल युग में खबरों की त्वरित गति अक्सर सत्यता की जांच (फैक्ट-चेक) पर हावी हो जाती है। ऐसी स्थिति में
समाचारों की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए संपादकीय सतर्कता अत्यंत आवश्यक है। यह घटना यह याद दिलाती है कि एक छोटी सी असावधानी किसी के सामाजिक जीवन और सम्मान को कितनी ठेस पहुंचा सकती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि संबंधित संस्थान इस पर सकारात्मक और त्वरित कदम उठाएंगे।

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