वाह, क्या बात है! ताली बजाइए वेदांता प्रबंधन के इस अद्भुत, अलौकिक और क्रांतिकारी ‘कॉर्पोरेट विज़न’ पर!
15 अगस्त 2026 की पूर्व संध्या… जब पूरा देश आजादी के जश्न की रोशनी में नहा रहा था, ठीक उसी वक्त – रात के 11:49 बजे – बालको मजदूर यूनियन कार्यालय के सामने का मुख्य मार्ग घुप अंधेरे की आगोश में सिसक रहा था।
वाह साहब, वाह! यूनियन दफ्तरों के सामने की स्ट्रीट लाइटों को बुझाकर, मुख्य सड़क को अंधेरे में धकेलकर आखिर वेदांता प्रबंधन ने कितने अरबों का ‘ऐतिहासिक मुनाफा’ कूट लिया?
ज़रूर इस महान ‘लाइट-बंद अभियान’ से कंपनी की बैलेंस शीट रातों-रात हरी हो गई होगी! शेयर बाजार में वेदांता के शेयर सीधे मंगल ग्रह पर जा पहुंचे होंगे! क्या यही है वो आधुनिक कॉर्पोरेट गवर्नेंस, जहाँ मजदूरों के हक की आवाज बुलंद करने वाले ठिकानों के बाहर की बत्तियाँ बुझाकर ‘प्रॉफिट मार्जिन’ नापा जाता है?

श्रेय की होड़: आखिर यह महान विचार किसका है?
लेकिन ठहरिए… इस ऐतिहासिक ‘मास्टरस्ट्रोक’ का सेहरा आखिर किसके सिर बांधा जाए? यह सवाल पूछना तो बनता है:
🔸 क्या यह ‘चीफ कॉर्पोरेट अफेयर्स एंड एडमिनिस्ट्रेशन ऑफिसर’ साहब के दूरदर्शी और शातिर दिमाग की उपज है?
🔸 या फिर यह सीधे ‘सीईओ साहब’ की किसी ग्लोबल ‘कॉर्पोरेट कॉस्ट-कटिंग मास्टरक्लास’ का जलवा है?
🔹 एक यक्ष प्रश्न जो कॉर्पोरेट दफ्तरों के वातानुकूलित कमरों तक पहुँचना चाहिए:
🔹 आजादी की पूर्व संध्या पर मुख्य मार्ग को अंधेरे में डुबोकर आप किसकी आँखों में धूल झोंक रहे हैं? क्या दो-चार स्ट्रीट लाइटों की बिजली बचाकर आप अपने खजाने का घाटा पाट रहे हैं, या अपनी घटिया सोच और तंगदिली का ढिंढोरा पीट रहे हैं?

सड़क पर पसरा यह सन्नाटा और अंधेरा चीख-चीखकर पूछ रहा है कि आखिर इतने बड़े कॉर्पोरेट घराने को एक सड़क को रोशन रखने में किस बात का डर सता रहा है?
इस घुप अंधेरे मार्ग से गुजरता हर मजदूर बस यही एक सवाल पूछ रहा है – अंधेरा सड़क पर है, या प्रबंधन की नीयत में?
जवाब की उम्मीद में अंधेरे को घूरती आँखें आज भी सवालिया निशान बनी हुई हैं… पर अफसोस, साहब खामोश हैं और हुज़ूर बेखबर!





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