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जंतर-मंतर आंदोलन: शिवानंद तिवारी ने सीपीआई (एमएल) की युवा नेता नेहा बोरा के तेवर को बताया ‘नई राजनीति’ का संकेत

वरिष्ठ राजनेता शिवानंद तिवारी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए हालिया छात्र-युवा आंदोलन में सीपीआई (एमएल) की युवा नेता नेहा बोरा के प्रदर्शन की सार्वजनिक रूप से सराहना की है। एक बयान जारी करते हुए तिवारी ने नेहा के निर्भीक और लड़ाकू तेवर को देश में ‘नई राजनीतिक संभावना’ का संकेत बताया है। इसके साथ ही, उन्होंने वामपंथी संगठन को युवाओं के बीच मजबूत करने के लिए पार्टी के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य को बधाई दी है।

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प्राप्त जानकारी के अनुसार, शिवानंद तिवारी ने अपने वक्तव्य में नेहा बोरा के उस कदम का विशेष उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में जाकर तीखे शब्दों में अपना विरोध दर्ज कराया था। तिवारी का कहना है कि आज के दौर में इस तरह का आत्मविश्वास और राजनीतिक साहस नई पीढ़ी में प्रतिरोध की क्षमता के जीवित होने का प्रमाण है।
विपक्ष की कार्यशैली पर उठाए सवाल
शिवानंद तिवारी ने अपने बयान के माध्यम से देश के मुख्यधारा के विपक्षी दलों की वर्तमान स्थिति पर भी निशाना साधा है। उनके द्वारा किए गए दावों के अनुसार:
🔹अधिकांश विपक्षी राजनीतिक पार्टियों में उस ऊर्जा और राजनीतिक जीवंतता का अभाव है, जिसकी आज देश को जरूरत है।
🔹 पुरानी पीढ़ी के अनेक राजनीतिक दल आज भी अपने पुराने और घिसे-पिटे ढर्रे पर चल रहे हैं।
🔹 देश को आज एक वैकल्पिक राजनीति की आवश्यकता है, जिसमें केवल उम्र के लिहाज से नए लोग न हों, बल्कि राजनीति के तौर-तरीके, सोच और मुद्दे भी नए हों।

समता पार्टी और सीपीआई (एमएल) के पुराने गठबंधन का जिक्र
मामले की पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए तिवारी ने सीपीआई (एमएल) के पूर्व महासचिव दिवंगत विनोद मिश्रा के दौर को याद किया। उन्होंने बताया कि उस समय जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व वाली समता पार्टी और विनोद मिश्रा की सीपीआई (एमएल) के बीच चुनावी गठबंधन हुआ था और दोनों दलों ने एक ही दफ्तर से उम्मीदवारों की सूची जारी की थी। तिवारी के अनुसार, विनोद मिश्रा के निधन के बाद युवा उम्र में नेतृत्व संभालने वाले दीपांकर भट्टाचार्य ने संगठन को मजबूती से आगे बढ़ाया है, जिसका परिणाम आज नेहा बोरा जैसे युवा चेहरों के रूप में सामने आ रहा है।

वामपंथी दलों के बीच सीपीआई (एमएल) की युवा ऊर्जा
बयान में इस बात का भी दावा किया गया है कि जंतर-मंतर के आंदोलन में सीपीआई (एम) और सीपीआई सहित कई अन्य वामपंथी संगठनों के लोग मौजूद थे, लेकिन जिस नई ऊर्जा की जरूरत थी, वह सीपीआई (एमएल) से जुड़े युवाओं में सर्वाधिक दिखाई दी। तिवारी ने इस तथ्य का भी उल्लेख किया कि जिस वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का गठन हुआ था, उसी वर्ष देश में कम्युनिस्ट पार्टी की भी स्थापना हुई थी, हालांकि बाद में मार्क्सवादी धारा कई गुटों में विभाजित हो गई।

यह बयान राजनीतिक दृष्टि से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मुख्यधारा की राजनीति में युवाओं और छात्रों की घटती आक्रामक भागीदारी के मुद्दे को उठाता है। जब वरिष्ठ राजनेता वर्तमान विपक्ष की कार्यशैली को ‘घिसी-पिटी’ बताते हैं, तो यह सीधे तौर पर विपक्ष की रणनीतिक कमजोरियों की ओर इशारा करता है। साथ ही, यह बयान जमीनी स्तर पर वामपंथी छात्र आंदोलनों के भीतर पनप रहे नए नेतृत्व को एक संभावित राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास करता है।

शिवानंद तिवारी ने अपने वक्तव्य के अंत में यह उम्मीद जताई है कि जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह छात्र-युवा आंदोलन यहीं नहीं रुकेगा। यदि यह आंदोलन आगे बढ़ता है और युवाओं को अपनी राजनीतिक भूमिका तथा नेतृत्व विकसित करने का पर्याप्त अवसर मिलता है, तो आने वाले समय में देश की राजनीति में एक नए अध्याय और नई शुरुआत की संभावना बन सकती है। फिलहाल, इस बयान पर किसी अन्य विपक्षी दल या सत्ता पक्ष की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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