लाखों कुर्बानियों, अनगिनत शहादतों और सदियों के संघर्ष के बाद जब 15 अगस्त 1947 को भारत की सरजमीं पर आजादी का सूरज उगा था, तो इस देश के भूखे, नंगे, शोषित और पीड़ित इंसान ने एक सपना देखा था। सपना एक ऐसे भारत का, जहाँ हर पेट को रोटी मिलेगी, हर हाथ को काम मिलेगा, हर इंसान को बराबरी का सम्मान मिलेगा और जहाँ डर की जगह स्वाभिमान का राज होगा।
आज हम आजादी के 79वें साल के पड़ाव पर खड़े हैं। लाल किले की प्राचीर से गूँजते दावे, जगमगाते शहर, बड़ी-बड़ी इमारतें और विज्ञापनों में चमकता ‘नया भारत’ हमें दिखाया जाता है। लेकिन जैसे ही हम विज्ञापनों के इस चकाचौंध भरे पर्दे को हटाकर सड़कों, खेतों, कारखानों और तंग बस्तियों में झाँकते हैं, तो एक ही सवाल दिल को झकझोर देता है – आखिर देश का असली अन्नदाता किसान, देश की नींव रखने वाला मजदूर, देश का भविष्य कहलाने वाला युवा और आम जनता आज इतनी बेहाल, लाचार और बेबस क्यों है?
कल-कारखानों की बिक्री और भगत सिंह की चेतावनी का भयानक सच
आज हमारे देश में विकास के नाम पर जो खेल खेला जा रहा है, वह असल में देश की सार्वजनिक संपत्तियों की खुली बोली है। जिन रेल, तेल, बंदरगाहों, हवाई अड्डों, बिजली, बैंक, खदानों और कल-कारखानों को इस देश की जनता के खून-पसीने के टैक्स से खड़ा किया गया था, उन्हें आज तानाशाही राजनीतिक ताकतों द्वारा चंद पूंजीपति मित्रों के हाथों में कौड़ियों के भाव बेचा जा रहा है।
> शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने करीब एक सदी पहले ही हमें चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था:
> “लड़ाई केवल अंग्रेजों के खिलाफ नहीं है। अगर लॉर्ड रीडिंग की जगह सर पुरुषोत्तम दास ठाकुरदास बैठ जाएं और सत्ता का हस्तांतरण हो जाए, लेकिन आम जनता के शोषण का ढांचा न बदले, तो ऐसी आजादी महज एक छलावा होगी।”
> आज भगत सिंह की वह चेतावनी हमारे सामने कड़वी सच्चाई बनकर खड़ी है। गोरे साहब चले गए, लेकिन आज ‘भूरे साहबों’ और उनके कॉर्पोरेट आकाओं का शिकंजा इस देश की आत्मा पर कस चुका है। सरकारी क्षेत्र का विनाश करके सब कुछ निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, जहाँ न कोई स्थायी नौकरी है, न पेंशन है, न अधिकार हैं और न ही सामाजिक सुरक्षा। यह आजादी नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट गुलामी का एक नया और खतरनाक रूप है।
महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी: त्रस्त मजदूर, लाचार किसान और हताश युवा
आज भारत का बहुसंख्यक समाज तीन मुख्य महादानवों के शिकंजे में कसकर छटपटा रहा है – महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी।
टूटी पीठ और खाली पेट: मजदूर और किसान
जिस किसान ने देश का पेट भरा, आज वह खुद अपनी फसलों के सही दाम (MSP) मांगने के लिए सड़कों पर लाठियां और आंसू गैस खाने को मजबूर है। कर्ज के दलदल में डूबकर हर दिन कई किसान आत्महत्या करने को विवश हैं। दूसरी ओर, देश का मजदूर—जो सड़कों से लेकर गगनचुंबी इमारतों का निर्माण करता है—उसके श्रम अधिकारों (Labor Laws) को कमजोर करके उसे पूरी तरह मालिक की दया पर छोड़ दिया गया है। 12-12 घंटे की कमरतोड़ मजदूरी के बाद भी उसे इतनी दिहाड़ी नहीं मिलती कि वह अपने बच्चों को दो वक्त का पौष्टिक भोजन खिला सके।
सपनों की नीलामी: देश का युवा
देश की सबसे बड़ी ताकत, उसका युवा, आज सड़कों पर भटकने को मजबूर है। डिग्रियों के पुलिंदे लेकर घूम रहे लाखों नौजवानों के लिए नौकरियां गायब हैं। सरकारी भर्तियों के नाम पर केवल धांधली और पेपर लीक का खेल चल रहा है। संविदा (Contract) और ‘गिग वर्कर’ के नाम पर युवाओं का मानसिक और आर्थिक शोषण हो रहा है। हताशा और निराशा के इस अंधकार में डूबकर देश का युवा आज अपने भविष्य को लेकर बुरी तरह आशंकित है।
तमाम दावों के बावजूद, रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, दवाइयां, दालें और बच्चों की पढ़ाई इतनी महंगी हो चुकी है कि आम इंसान के लिए जीना एक दैनिक संघर्ष बन गया है।
हांशिए की आवाजों पर वार: महिला, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक
जब-जब कोई समाज आर्थिक रूप से खोखला होता है, तब-तब सत्ता में बैठी फासीवादी और नफरती ताकतें जनता को बांटने का काम करती हैं। आज देश का सामाजिक ताना-बाना बुरी तरह बिखेरा जा रहा है।
🔹 महिलाओं की सुरक्षा का ढोंग: हर दिन अखबार दुष्कर्म और बर्बरता की खबरों से भरे रहते हैं। बेटी बचाओ का नारा देने वाली सत्ता अपराधियों को संरक्षण देती नजर आती है।
🔹 दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार: आजादी के 79 साल बाद भी दलितों को घोड़ी चढ़ने या मूंछ रखने पर मार दिया जाता है। जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के अधिकारों को छीनकर कॉर्पोरेट्स को दिया जा रहा है और विरोध करने पर उन्हें उनके ही घर में बेदखल किया जा रहा है।
🔹 अल्पसंख्यकों में भय का माहौल: समाज में धार्मिक ध्रुवीकरण और नफरत का ऐसा जहर घोला जा चुका है कि अल्पसंख्यकों को लगातार भय और असुरक्षा के साये में जीने पर मजबूर किया जा रहा है।
आम जनता आज इतनी बेबस और लाचार बना दी गई है कि वह अपनी बुनियादी जरूरतों के बजाय अपनी अस्मिता और जान बचाने की चिंता में उलझकर रह गई है।
असहमति की हत्या: बुद्धिजीवियों और आजाद आवाजों पर हमले
किसी भी जीवंत लोकतंत्र की पहचान उसकी आजाद आवाजों से होती है—पत्रकार, लेखक, प्रोफेसर, छात्र, कलाकार और वैज्ञानिक। लेकिन आज स्थिति यह है कि जो भी व्यक्ति सरकार की गलत नीतियों, कॉर्पोरेट लूट या नफरती राजनीति के खिलाफ आवाज उठाता है, उसे तुरंत ‘देशद्रोही’ या ‘अर्बन नक्सल’ घोषित कर दिया जाता है।
पत्रकारों को जेल में डाला जा रहा है, लेखकों की कलम पर पहरे बिठाए जा रहे हैं और स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं (ED, CBI, न्यायपालिका) को सत्ता का हथियार बना दिया गया है। जब सवाल पूछना ही गुनाह बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि फासीवाद हमारे दरवाजे पर पूरी ताकत से दस्तक दे चुका है।
क्या है समाधान? भगत सिंह और अंबेडकर के सपनों का भारत
यदि हमें भारत को इस बेहाली, लाचारी और तबाही से बचाना है, तो हमें उस मूल रास्ते पर लौटना होगा जिसकी नींव हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने रखी थी। भगत सिंह और डॉ. भीमराव अंबेडकर का भारत केवल अंग्रेजों को भगाने का नाम नहीं था, बल्कि वह एक संपूर्ण सामाजिक और आर्थिक क्रांति का विचार था।
1. आर्थिक लोकतंत्र और सामाजिक न्याय
🔹 संसाधनों का पुनर्वितरण: देश के संसाधनों पर किसी चंद कॉर्पोरेट्स का नहीं, बल्कि देश के 140 करोड़ नागरिकों का हक होना चाहिए। निजीकरण की अंधी दौड़ को तुरंत रोका जाए और शिक्षा, स्वास्थ्य व परिवहन जैसे बुनियादी क्षेत्रों को पूर्णतः सरकारी और मुफ्त बनाया जाए।
🔹 अंबेडकर का संवैधानिक रास्ता: डॉ. अंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि “26 जनवरी 1950 को हम एक विरोधाभास के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता।” जब तक हम सामाजिक और आर्थिक असमानता को समाप्त नहीं करेंगे, तब तक हमारा लोकतंत्र ताश के पत्तों की तरह हिलता रहेगा।
2. भगत सिंह का इंकलाब
भगत सिंह का ‘इंकलाब’ केवल बम-पिस्तौल का नाम नहीं था। इंकलाब का अर्थ था – अन्यायपूर्ण व्यवस्था का अंत। आज युवाओं को अपने अधिकारों के लिए, रोजगार के लिए, और वैज्ञानिक सोच वाले समाज के निर्माण के लिए एकजुट होकर एक नए वैचारिक आंदोलन की शुरुआत करनी होगी।
आने वाले कल का भारत
आजादी के 79 साल बाद आज देश एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ कॉर्पोरेट लूट, फासीवादी नफरत, बेरोजगारी और तानाशाही का अंधकार है, तो दूसरी तरफ देश के आम नागरिकों की उम्मीदें, संघर्ष और बदलाव की तड़प है।
आने वाले कल का भारत वह नहीं हो सकता जहाँ चंद लोग खरबपति हों और करोड़ों लोग दाने-दाने को तरसें। आने वाले कल का भारत वह होगा:
🔹 जहाँ खेत में लहराती फसल किसान के चेहरे पर मुस्कान लाए।
🔹जहाँ कारखाने की सीटी मजदूर के स्वाभिमान का प्रतीक हो।
🔹 जहाँ युवा के हाथों में डिग्री के साथ-साथ सम्मानजनक रोजगार हो।
🔹 जहाँ हर महिला, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक बिना किसी डर के, सिर उठाकर जी सके।
🔹 और जहाँ भारत का संविधान किसी राजनीतिक दल की किताब न होकर, हर नागरिक के जीवन का सुरक्षा कवच हो।
यह भारत अपने आप नहीं बनेगा। इसके लिए आज के युवा, मजदूर, किसान और हर जागरूक नागरिक को नफरत के बाजार को खारिज करके प्रेम, भाईचारे, समानता और अधिकारों की राजनीति को अपनाना होगा। यही हमारे शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही इस देश को बेहाली से आजादी की ओर ले जाने का एकमात्र रास्ता होगा।





Recent Comments