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केरल में अमेरिकी कंपनी कोरो हेल्थ द्वारा 800 कर्मचारियों की अचानक छंटनी: एटक ने उठाए सवाल

केरल (पब्लिक फोरम)। केरल के कोच्चि और कोझिकोड में अमेरिकी हेल्थकेयर एनालिटिक्स कंपनी ‘कोरो हेल्थ’ (Corro Health) द्वारा करीब 800 कर्मचारियों को अचानक नौकरी से निकालने का मामला तूल पकड़ रहा है। ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) ने इसे देश के श्रम कानूनों और बुनियादी मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन करार दिया है। पिछले शुक्रवार को रोज की तरह दफ्तर पहुंचे कर्मचारियों को बिना किसी पूर्व सूचना के ईमेल के जरिए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, जिसके बाद से प्रभावित परिवारों में अनिश्चितता का माहौल है और देश के श्रमिक संगठनों में भारी नाराजगी है।

अचानक आई ईमेल और बंद मिले दफ्तर के दरवाजे
यह घटना 3 जुलाई 2026 (शुक्रवार) की है। हॉस्पिटल्स और हेल्थकेयर सिस्टम्स को एनालिटिक्स और टेक्नोलॉजी-आधारित सॉल्यूशंस देने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी कोरो हेल्थ के कोच्चि और कोझिकोड कार्यालयों में उस वक्त अफरा-तफरी मच गई, जब सुबह ड्यूटी पर पहुंचे कर्मचारियों को “सेपरेशन और फुल एंड फाइनल सेटलमेंट” का ईमेल मिला। सालों से ईमानदारी से काम कर रहे इन कर्मचारियों को न केवल नौकरी से निकाला गया, बल्कि उन्हें कार्यालय परिसर के भीतर जाने की अनुमति भी नहीं दी गई। प्रभावित कर्मचारियों को दफ्तर के बाहर बुनियादी सुविधाओं जैसे पानी, भोजन और वॉशरूम तक के बिना घंटों इंतजार करना पड़ा।

(कॉमरेड अमरजीत कौर)

‘ग्रेट प्लेस टू वर्क’ के दावों और हकीकत में विरोधाभास
स्वयं को “ग्रेट प्लेस टू वर्क” (कार्यस्थल के लिए बेहतरीन जगह) प्रमाणित होने का दावा करने वाली एक वैश्विक कंपनी का यह रवैया कॉर्पोरेट कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ट्रेड यूनियनों का कहना है कि कर्मचारियों के साथ किया गया यह व्यवहार पूरी तरह से अमानवीय और उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। मुनाफे के लिए रात-दिन काम करने वाले कर्मचारियों को एक झटके में बिना किसी सम्मानजनक विदाई या पूर्व संवाद के सड़क पर ला खड़ा किया गया।

घरेलू श्रम कानूनों की अनदेखी
एटक के नेशनल सेक्रेटेरिएट की ओर से जारी बयान में स्पष्ट किया गया है कि यह छंटनी भारत के मौजूदा लेबर कोड (श्रम संहिताओं) का सीधा उल्लंघन है।
* नियम क्या कहता है: औद्योगिक कानूनों के मुताबिक, यदि किसी संस्थान में 300 या उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं, तो उसे बंद करने या बड़े पैमाने पर छंटनी करने से कम से कम 90 दिन पहले सरकार से अनुमति लेना अनिवार्य है। इसके साथ ही इस आवेदन की एक प्रति कर्मचारी प्रतिनिधियों (वर्कर्स रिप्रेजेंटेटिव्स) को भी सौंपनी होती है।
* कंपनी का कदम: कोरो हेल्थ प्रबंधन ने इस मामले में न तो सरकार को कोई अग्रिम सूचना दी और ना ही कर्मचारियों को विश्वास में लिया।

अंतरराष्ट्रीय मानकों और संधियों का उल्लंघन
चूंकि कोरो हेल्थ एक बहुराष्ट्रीय कंपनी है, इसलिए इसके ऊपर वैश्विक नियम भी लागू होते हैं। AITUC की महासचिव अमरजीत कौर के मुताबिक, कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत कई सिद्धांतों को ताक पर रख दिया है:

1* ILO का MNE डिक्लेरेशन: बहुराष्ट्रीय उद्यमों से जुड़ा अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का त्रिपक्षीय घोषणापत्र, जो सरकारों, नियोक्ताओं और श्रमिकों की सहमति से बना है।
2* UN गाइडिंग प्रिंसिपल्स (2011): संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा स्वीकृत ‘बिजनेस एंड ह्यूमन राइट्स’ के मार्गदर्शक सिद्धांत।
3* सस्टेनेबल डेवलपमेंट (2030 एजेंडा): इसके तहत सम्मानजनक कार्य और आर्थिक विकास के लक्ष्यों को बढ़ावा दिया जाता है।
4* RBC और NGRBC (भारत): भारत में लागू ‘रिस्पॉन्सिबल बिजनेस कंडक्ट’ और ‘नेशनल गाइडलाइंस फॉर रिस्पॉन्सिबल बिजनेस कंडक्ट’ की नीतियां।

आगामी प्रभाव और संगठन की मांग
आईटी और हेल्थकेयर एनालिटिक्स जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले युवाओं के लिए यह घटना एक बड़े झटके की तरह है। इस अचानक हुई छंटनी से 800 परिवारों के सामने तात्कालिक आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। AITUC ने केंद्र और केरल राज्य सरकार से इस मामले में तुरंत दखल देने की मांग की है। संगठन का रुख स्पष्ट है कि निकाले गए सभी कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से नौकरी पर बहाल किया जाए और कंपनी के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय श्रम मानकों के उल्लंघन के लिए सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

कोरो हेल्थ की यह कार्रवाई केवल एक कंपनी से कर्मचारियों की छंटनी का सामान्य मामला नहीं है, बल्कि यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करने वाले भारतीय कार्यबल की सुरक्षा और उनके अधिकारों से जुड़े बड़े नीतिगत संकट को रेखांकित करती है। कॉर्पोरेट विकास और विदेशी निवेश के स्वागत के बीच यदि देश के अपने श्रम कानूनों को इस तरह कमजोर या नजरअंदाज किया जाएगा, तो कार्यस्थल पर सुरक्षा केवल एक छलावा बनकर रह जाएगी। यह घटना इस बात पर पुनर्विचार करने को मजबूर करती है कि आधुनिक उद्योगों में मानवीय गरिमा और कानूनी जवाबदेही को मुनाफे की वेदी पर चढ़ने से कैसे रोका जाए।

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