कोरबा (पब्लिक फोरम)। कोयला खदानों की धड़कन कहे जाने वाले कोरबा जिले में SECL (साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) के हजारों ठेका श्रमिकों का दशकों पुराना शोषण अब एक बड़े जन-आंदोलन की शक्ल लेने जा रहा है। ठेका मजदूर महासभा कोरबा के बैनर तले शुक्रवार, 12 जून 2026 को दोपहर तीन बजे से कुसमुण्डा स्थित महतारी अंगना (कबीर चौक) पर एक ऐतिहासिक महासभा आयोजित की जा रही है, जिसमें नए श्रम कानून OSHW Code (ऑक्युपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड) के तहत स्थायी रोजगार, समान सुविधा और समान वेतन की मांगें बुलंद की जाएंगी।
दशकों से जारी ठेका शोषण
कोरबा, जो भारत के सबसे बड़े कोयला उत्पादक क्षेत्रों में से एक है, यहाँ SECL की खदानों में हजारों की संख्या में ठेका श्रमिक काम करते हैं। ये वे मजदूर हैं जो कोयले की कालिख से सने हाथों से देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी करते हैं, लेकिन बदले में उन्हें नियमित कर्मचारियों के मुकाबले न तो समान वेतन मिलता है, न समान सुविधाएं, और न ही नौकरी की कोई सुरक्षा।
ठेका प्रणाली (Contract System) के नाम पर सालों से यह सिलसिला जारी है – जहाँ ठेकेदार कंपनियां श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम देती हैं, पीएफ-ईएसआई जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से वंचित रखती हैं, और किसी भी दिन काम से निकाल देने की तलवार हमेशा सिर पर लटकाए रखती हैं। यह ‘ऐतिहासिक शोषण’ अब नहीं चलेगा – यही संकल्प लेकर कोरबा के ठेका मजदूर एकजुट हो रहे हैं।
OSHW Code: नए कानून की आड़ में भी शोषण?
केंद्र सरकार ने श्रम क्षेत्र में सुधार के नाम पर चार नए श्रम संहिताएं (Labour Codes) लागू की हैं, जिनमें से एक है OSHW Code – यानी व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थिति संहिता। इस कानून में ठेका श्रमिकों को भी समान सुविधाएं देने का प्रावधान किया गया है। लेकिन जमीन पर स्थिति बिल्कुल अलग है।
श्रमिक संगठनों का आरोप है कि OSHW Code के तहत जो अधिकार कागज पर मिले हैं, वे व्यवहार में लागू नहीं हो रहे। ठेकेदार और प्रबंधन मिलकर इन प्रावधानों की अनदेखी कर रहे हैं। इसीलिए महासभा में माँग की जाएगी कि इस कानून को कड़ाई से लागू किया जाए और ठेका श्रमिकों को तत्काल –
स्थायी रोजगार (Permanent Employment) का अधिकार
नियमित कर्मचारियों के समान वेतन (Equal Pay for Equal Work)
समान सुविधाएं – पीएफ, ईएसआई, बोनस, अवकाश
OSHW Code का सख्त क्रियान्वयन और नियमित श्रम निरीक्षण
एक मजदूर की कहानी – लाखों की आवाज़
कोरबा के कुसमुण्डा इलाके में रहने वाले एक ठेका मजदूर की स्थिति SECL की सैकड़ों खदानों में काम करने वाले हजारों श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करती है। सुबह की शिफ्ट में खदान में उतरना, पसीना और कालिख से लथपथ होकर लौटना – और महीने के अंत में हाथ में आना मात्र उतना वेतन जो एक वक्त की रोटी भी ठीक से नहीं जुटा पाता। बच्चों की फीस, बीमारी का खर्च, और छत की मरम्मत – सब कुछ कर्ज पर टिका है।
उनके साथ काम करने वाला एक नियमित कर्मचारी वही काम करके कई गुना अधिक तनख्वाह, पीएफ, मेडिकल सुविधा और आवास भत्ता पाता है। यह असमानता नहीं, यह अन्याय है – और यही अन्याय कल की महासभा का केंद्र बिंदु होगा।
महासभा का आह्वान – ‘जागो, एक हो, संगठित हो’
महासभा के निमंत्रण पत्र में स्पष्ट रूप से लिखा है – ‘ठेका श्रमिक जागो, एक हो, संगठित हो।’ यह महज एक नारा नहीं, यह उस वर्ग की पुकार है जो वर्षों से मूक रहकर शोषण सहता आया है। ठेका मजदूर महासभा कोरबा के संयोजकों ने बताया कि इस आयोजन में जिले के विभिन्न खदान क्षेत्रों – कुसमुण्डा, दीपका, गेवरा, कोरबा एवं बालको सहित अन्य क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रमिकों के पहुंचने की उम्मीद है।
यह सभा SECL प्रबंधन और राज्य सरकार को एक स्पष्ट संदेश देगी कि ठेका श्रमिकों की उपेक्षा अब और नहीं सही जाएगी।
व्यापक संदर्भ: देशभर में ठेका श्रमिकों का संघर्ष
यह महासभा अकेली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में नोएडा-मानेसर से लेकर विशाखापट्टनम तक, ठेका श्रमिकों ने सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों की मांग की है। ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस (ऐक्टू) सहित कई श्रमिक संगठन लगातार मांग करते आ रहे हैं कि ठेका प्रणाली को समाप्त किया जाए और सभी श्रमिकों को स्थायी रोजगार दिया जाए।
छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के कार्यकाल में श्रम कानूनों के कमजोर क्रियान्वयन को लेकर विपक्ष और श्रमिक संगठन पहले से ही मुखर हैं। ऐसे में कोरबा की यह महासभा प्रदेश की राजनीति और श्रम परिदृश्य में एक नई हलचल पैदा कर सकती है।
12 जून की यह महासभा एक शुरुआत है – एक ऐसी शुरुआत जो कोरबा के ठेका मजदूरों को संगठित आंदोलन की राह दिखा सकती है। यदि महासभा में बनी माँगें SECL प्रबंधन और राज्य सरकार तक नहीं पहुंचीं, तो आयोजकों ने संकेत दिए हैं कि आगे बड़े आंदोलन की तैयारी भी की जाएगी। देश की ऊर्जा आपूर्ति की रीढ़ कहलाने वाले इन मजदूरों की आवाज को नजरअंदाज करना अब किसी के लिए भी आसान नहीं होगा।





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