ज़िंदगी

(एक कविता)

ऐ ज़िंदगी—
जाने कितने रंग दिखाती ।
कभी हँसाती, कभी रुलाती।
कभी दिन में तारे दिखलाती।
कभी खुशियों की बारिश है लाती,
कभी गमों का दरिया भर जाती है।
अच्छे – बुरे कर्मों का हिसाब
किस्तों में कर जाती। ऐ ज़िंदगी—

कभी आवाक्- सी है ज़िंदगी,
तो कभी बेबाक – सी है ज़िंदगी।
ज़ख्म भी देती है ज़िंदगी,
मरहम भी लगाती है ज़िंदगी।
शांति और बेबाकपन की
खुली किताब बन जाती। ऐ ज़िंदगी—

कभी आश है ज़िंदगी
तो कभी विश्वास है ज़िंदगी।
ज़िंदगी खेल भी है
तो जंग भी है ज़िंदगी।
आशा और विश्वास की
पराकाष्ठा बन जाती। ऐ ज़िंदगी —
जाने कितने रंग दिखाती।
-हेमलता जायसवाल

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