मुंबई (पब्लिक फोरम)। भारतीय पार्श्व गायन की दुनिया में सादगी, मिठास और गहरे भावों की प्रतीक रहीं सुमन कल्याणपुर का 31 मई 2026 को 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया। तीन दशकों से अधिक समय तक हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं में गाकर उन्होंने जो जगह करोड़ों श्रोताओं के दिलों में बनाई, वह किसी पुरस्कार की मोहताज नहीं थी। उनके जाने से हिंदी सिनेमा के उस सुनहरे दौर की एक और कड़ी टूट गई, जिसे आज की पीढ़ी भी उसी चाव से सुनती है।
शुरुआत – ढाका से मुंबई तक
सुमन कल्याणपुर का जन्म 28 जनवरी 1937 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के ढाका (अब बांग्लादेश) में हुआ था। उनका मूल नाम सुमन हेम्माडी था। पिता शंकर राव हेम्माडी बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े थे। 1943 में परिवार मुंबई आ गया और यहीं से उनकी शिक्षा और कलात्मक यात्रा का विस्तार हुआ।
दिलचस्प तथ्य यह है कि उनका पहला प्रेम संगीत नहीं, बल्कि चित्रकला था। उन्होंने मुंबई के प्रतिष्ठित सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में अध्ययन भी किया। लेकिन धीरे-धीरे शास्त्रीय संगीत की ओर झुकाव बढ़ता गया और उन्होंने उस्ताद अब्दुल रहमान खान तथा पंडित केशवराव भोले जैसे गुरुओं से विधिवत प्रशिक्षण लिया।
1960-70 का दौर – पहचान और लोकप्रियता के वर्ष
1950 के दशक में पार्श्व गायन में पदार्पण के बाद सुमन कल्याणपुर ने 1960 और 1970 के दशक में अपनी अलग पहचान स्थापित की। नौशाद, एस.डी. बर्मन, रोशन, शंकर-जयकिशन, कल्याणजी-आनंदजी और हेमंत कुमार जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम करते हुए उन्होंने एक के बाद एक यादगार गीत दिए।
मोहम्मद रफी के साथ उनके युगल गीत विशेष रूप से लोकप्रिय हुए। “आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे”, “ना ना करते प्यार”, “तुमने पुकारा और हम चले आए”, “परबतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है” और “दिल ने फिर याद किया” जैसे गीत आज भी उतनी ही ताजगी से सुने जाते हैं।
वह सवाल जो अक्सर उठता था
सुमन कल्याणपुर के जीवन का सबसे चर्चित पहलू उनकी आवाज का लता मंगेशकर से साम्य था। कई बार श्रोता उनके गीतों को लता जी का गीत समझ लेते थे। संगीत विशेषज्ञ, हालांकि, यह स्पष्ट करते रहे हैं कि दोनों की गायकी में भले ही स्वर-संरचना की कुछ समानता हो, सुमन जी की भावाभिव्यक्ति और कोमलता की अपनी अलग शैली थी – जो उन्हें उनकी अपनी जगह स्थापित करती थी।
बहुभाषी योगदान और सम्मान
सुमन कल्याणपुर केवल हिंदी तक सीमित नहीं रहीं। मराठी, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, भोजपुरी, पंजाबी, उड़िया और असमिया सहित अनेक भारतीय भाषाओं में उन्होंने सैकड़ों गीत रिकॉर्ड किए। उनका सक्रिय संगीत-सफर तीन दशकों से भी अधिक रहा।
उनके योगदान को विभिन्न सम्मानों से स्वीकृति मिली। 2009 में महाराष्ट्र सरकार का लता मंगेशकर पुरस्कार, 2022 में मिर्ची म्यूजिक लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और 2023 में भारत सरकार का पद्म भूषण उन्हें प्रदान किया गया।
अंतिम विदाई
31 मई 2026 को मुंबई स्थित अपने निवास पर उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उनका निधन हुआ। बताया जाता है कि अंतिम दिनों में भी वे अपने पुराने गीत सुनना पसंद करती थीं – शायद उन्हीं सुरों में उन्हें सुकून मिलता था जिन्हें उन्होंने जीवनभर साधा था।
सुमन कल्याणपुर उन विरल कलाकारों में थीं जिन्होंने न विवाद की छाया ली, न प्रचार का सहारा – केवल अपनी गायकी से पहचान बनाई। भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्णिम काल की वे एक ऐसी आवाज थीं, जो सुनने वाले को चुपचाप अपने साथ बहा ले जाती थी। उनके गीत आज भी उतने ही जीवंत हैं – और रहेंगे। क्योंकि सच्चे सुर कभी पुराने नहीं पड़ते।
“पब्लिक फोरम की ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।”





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