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कुशमही में कोरवा-परहिया आदिवासियों पर हमला, आंदोलन; डीसी के आश्वासन पर टूटा धरना

गढ़वा (पब्लिक फोरम)। झारखंड के गढ़वा जिले के कुशमही गांव में 26 जुलाई को वन विभाग की बांस रोपण योजना पर सवाल उठाने पर ग़ैर-आदिवासी ग्रामीणों ने कोरवा और परहिया समुदाय के लोगों पर हमला कर दिया, जिसमें दो बुजुर्ग-युवा गंभीर रूप से घायल हुए। घटना के विरोध में शुरू हुआ अनिश्चितकालीन धरना 30 जुलाई को उपायुक्त के कड़ी कार्रवाई के आश्वासन के बाद स्थगित कर दिया गया।

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सामुदायिक वन प्रबंधन फेडरेशन, गढ़वा के अध्यक्ष मानिक चंद कोरवा के अनुसार, 26 जुलाई को वन विभाग बांस रोपण का काम करा रहा था। ग्राम सभा के लोगों ने केवल यह पूछा कि यह काम किसके आदेश से हो रहा है और इसके लिए नियुक्त दण्डाधिकारी कौन है। इसी सवाल पर ग्रामीणों के साथ मारपीट शुरू हो गई।
इस हमले में 72 वर्षीय केश्वर परहिया और 29 वर्षीय बिरेंद्र कोरवा गंभीर रूप से घायल हुए। केश्वर परहिया के सिर में गंभीर चोट लगी और दोनों बांहें टूट गईं, जबकि बिरेंद्र कोरवा के सिर में भी गंभीर चोट आई। महिलाओं के साथ भी मारपीट और जातिसूचक गालियों के साथ अपमान किया गया।

घटना का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि हमलावर वन विभाग के अधिकारी या कर्मचारी नहीं, बल्कि पड़ोसी गांव गोबरदाहा के गैर-आदिवासी लोग थे। घटना के बाद थाना प्रभारी विष्णुकांत की गाड़ी से दोनों घायलों को सदर अस्पताल, गढ़वा में भर्ती कराया गया।

वन अधिकार बनाम प्रशासनिक कार्रवाई
कुशमही गांव में लगभग 120 परिवार और करीब 600 लोग रहते हैं, जिनमें अधिकांश कोरवा और परहिया समुदाय के सदस्य हैं – ये दोनों विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (Particularly Vulnerable Tribal Group, PVTG) की श्रेणी में आते हैं। ग्राम सभा का कहना है कि उन्हें वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार प्राप्त हैं।
ग्राम सभा की सहमति के बिना ही वन विभाग द्वारा बांस रोपण, ट्रेंच और गड्ढों की खुदाई जैसे काम किए जा रहे थे। ग्राम सभा ने इस बारे में प्रशासनिक अधिकारियों को पहले भी कई बार लिखित शिकायत दी थी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।

धरना और मांगें
🔹 घटना के विरोध में 27 जुलाई को कुशमही ग्राम सभा ने समाहरणालय, गढ़वा के सामने अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया। प्रमुख मांगें थीं:
आरोपियों पर एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम सहित अन्य उपयुक्त धाराओं में प्राथमिकी दर्ज हो
सभी नामजद आरोपियों की शीघ्र गिरफ्तारी हो।

🔹 ग्राम सभा की सहमति और कानूनी प्रक्रिया के पालन तक बांस रोपण योजना पर तत्काल रोक लगे।

🔹घायलों को बेहतर चिकित्सा उपचार तथा पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा और न्याय मिले।

धरने के दूसरे दिन, 28 जुलाई को ग्राम सभा ने झारखंड के मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें PVTG समुदायों पर हुए हमले और वन अधिकार अधिनियम के कथित उल्लंघन पर तत्काल व निष्पक्ष कार्रवाई की मांग की गई।

प्रशासन का आश्वासन
30 जुलाई 2026 को उपायुक्त, गढ़वा ने आन्दोलनकारियों को बुलाकर विस्तृत वार्ता की। उपायुक्त ने कहा, “इस मामले में किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।” उन्होंने आश्वासन दिया कि 8 दिनों के भीतर सभी आरोपियों के खिलाफ एससी/एसटी अधिनियम सहित प्रासंगिक धाराओं में कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित होगी, और मेराल थाना प्रभारी को गिरफ्तारी के स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। इसी आश्वासन के बाद ग्राम सभा ने धरना स्थगित कर दिया।

कुशमही की घटना यह सवाल फिर खड़ा करती है कि वन अधिकार अधिनियम के तहत मिले अधिकारों के बावजूद जमीनी स्तर पर आदिवासी समुदायों की सहमति को कितनी गंभीरता से लिया जाता है। केश्वर परहिया और बिरेंद्र कोरवा जैसे ग्रामीणों के लिए यह लड़ाई अब सिर्फ मुआवजे की नहीं, बल्कि अपनी जमीन और जंगल पर हक की पहचान की भी है। अगली आठ दिनों में प्रशासन की कार्रवाई ही तय करेगी कि यह आश्वासन कागज़ी रहता है या ज़मीन पर न्याय में बदलता है।

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