नई दिल्ली/कोरबा (पब्लिक फोरम)| आज के समय में जब आप बाजार से अपना पसंदीदा बिस्कुट, साबुन या कुकिंग ऑयल खरीदते हैं, तो शायद आपको लगता है कि कीमतें वही पुरानी हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि उसी 10 रुपये के पैकेट में अब बिस्कुट कम निकलते हैं या साबुन का टिकिया पहले से काफी पतली हो गई है? इसे अर्थशास्त्र की भाषा में ‘श्रिंकफ्लेशन’ कहते हैं, यानी दाम वही रहेगा लेकिन सामान का वजन या मात्रा कम कर दी जाएगी। भारत में आज का आम उपभोक्ता और खासकर रोजाना कुआं खोदकर पानी पीने वाला दिहाड़ी मजदूर इसी अदृश्य महंगाई की मार झेल रहा है।
एक तरफ सरकार की मुफ्त या बेहद सस्ती राशन योजना के तहत बीपीएल परिवारों को प्रति व्यक्ति 5 किलो अनाज मिल जाता है। यह योजना गरीब परिवारों का पेट भरने में बहुत मददगार साबित होती है, लेकिन केवल गेहूं और चावल से जिंदगी नहीं चलती। इंसान को खाना पकाने के लिए तेल, नमक, मिर्च-मसाले, कपड़े धोने का पाउडर, नहाने का साबुन, चायपत्ती और माचिस जैसी चीजें भी चाहिए होती हैं, जिन्हें बाजार से नकद पैसे देकर ही खरीदना पड़ता है।
यहाँ सबसे बड़ा संकट उस दिहाड़ी मजदूर के सामने खड़ा होता है जिसकी औसतन दैनिक कमाई महज 250 रुपये है। अगर मान लिया जाए कि उस मजदूर को महीने में पूरे 24 से 25 दिन काम मिलता है, तब भी उसकी कुल मासिक आय 6000 से 6250 रुपये के आसपास ही बन पाती है। इतने सीमित बजट में एक बार में 1 लीटर तेल का डिब्बा या 1 किलो सर्फ का पैकेट खरीदना उसके लिए नामुमकिन होता है। यही वजह है कि ऐसे परिवार 5 रुपये, 10 रुपये या 20 रुपये वाले छोटे सैशे और छोटे पैकेट पर निर्भर रहने को मजबूर हैं।
FMCG (Fast-Moving Consumer Goods) यानी रोजमर्रा का सामान बनाने वाली कंपनियां ग्राहकों को अचानक मिलने वाले ‘प्राइस शॉक’ से बचाने के लिए एक खास रणनीति अपनाती हैं। वे 10 रुपये के पैकेट का दाम सीधे 12 या 15 रुपये नहीं करतीं, क्योंकि इससे ग्राहक छिटक सकता है। इसकी बजाय वे पैकेट की मात्रा या वजन चुपचाप घटा देती हैं। उदाहरण के तौर पर, जहाँ पहले 1000 ग्राम यानी 1 लीटर का सोयाबीन तेल मुख्य बजट का हिस्सा हुआ करता था, वहीं अब बाजार में 650 ग्राम का पैकेट 120 रुपये में बिक रहा है। पहली नजर में ग्राहक को लगता है कि तेल सस्ता मिल रहा है, लेकिन अगर प्रति ग्राम के हिसाब से हिसाब लगाया जाए तो कीमत काफी बढ़ चुकी होती है।
यही खेल कपड़े धोने के साबुन से लेकर मसालों तक में चल रहा है। 10 रुपये वाले कपड़े धोने के साबुन का पैकेट जो पहले 100 ग्राम का होता था, अब घटकर 65 से 70 ग्राम रह गया है। 10 रुपये वाले नहाने के साबुन का वजन 100 ग्राम से घटाकर 70-75 ग्राम कर दिया गया है और साथ ही उसकी गुणवत्ता यानी टीएफएम में भी कटौती कर दी गई है। 5 रुपये वाले बिस्कुट के पैकेट में अब 75 ग्राम की जगह सिर्फ 45 से 50 ग्राम बिस्कुट मिलते हैं। वहीं मसालों के मामले में तो वजन घटाने के साथ-साथ दाम भी बढ़ा दिए गए हैं।
इस पूरी प्रक्रिया के पीछे एक बड़ी वजह पेट्रोल और डीजल की लगातार ऊंची बनी हुई दरें भी हैं। देश में पेट्रोल की कीमतें 102 से 115 रुपये प्रति लीटर के आसपास बनी हुई हैं। जब ईंधन महंगा होता है तो कारखानों तक कच्चा माल लाने और तैयार सामान को गांव-देहात की छोटी दुकानों तक पहुंचाने का भाड़ा यानी लॉजिस्टिक्स कॉस्ट काफी बढ़ जाती है। कंपनियां इस बढ़े हुए खर्च का बोझ खुद उठाने के बजाय चुपके से सामान का वजन कम करके उपभोक्ताओं की जेब पर डाल देती हैं।
नतीजतन, सरकार द्वारा दिया जाने वाला अनाज भुखमरी को तो रोक लेता है, लेकिन एक सम्मानजनक, पोषक और स्वस्थ जीवन जीने के लिए जरूरी सामान आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है। जब 250 रुपये कमाने वाला मजदूर 120 रुपये में केवल 650 ग्राम तेल खरीद पाता है और 10 रुपये के साबुन में 35 ग्राम वजन गायब पाता है, तो उसकी वास्तविक क्रय शक्ति बुरी तरह प्रभावित होती है। श्रिंकफ्लेशन का यह अदृश्य थप्पड़ सबसे ज्यादा उसी वर्ग को जख्मी कर रहा है जो रोज कमाता है और रोज खाता है।
इस पूरे मुद्दे पर आपकी क्या राय है? क्या आपने भी हाल के दिनों में अपने राशन के सामान में इस बदलाव और घटते हुए पैकेटों के आकार को महसूस किया है? आपको क्या लगता है कि इस अदृश्य महंगाई यानी श्रिंकफ्लेशन से आम जनता को राहत दिलाने के लिए सरकार और उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय को क्या सख्त कदम उठाने चाहिए?
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