दुर्ग (पब्लिक फोरम)। केंद्रीय गोंड महासभा धमधागढ़ के अध्यक्ष एम.डी. ठाकुर के नेतृत्व में समाज के सैकड़ों पदाधिकारियों और सदस्यों ने सोमवार को दुर्ग कलेक्टर कार्यालय के सामने धरना-प्रदर्शन किया। विरोध की वजह बनी – हाई कोर्ट और उप सचिव स्तर के स्पष्ट आदेशों के बावजूद उनके संगठन का “कचना धुरवा देवालय” भवन विरोधी गुट को सौंप दिया जाना। समाज के लोगों ने कमलेश ध्रुव, जीवराखन मरई, संगीता शोरी, मनहरण ठाकुर, दिपेश मंडावी और जशपाल मंडावी के पुतले जलाकर अपना आक्रोश व्यक्त किया और मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजने की घोषणा की।
क्या है पूरा विवाद?
यह मामला केंद्रीय गोंड महासभा धमधागढ़ की आंतरिक नेतृत्व लड़ाई और उससे जुड़े भवन विवाद का है। मामला अदालत तक पहुंचा और उसमें फैसला भी आया – लेकिन प्रशासन ने उस फैसले को ज़मीन पर लागू नहीं किया। यही चिंगारी आज के विरोध का कारण बनी।
न्यायालय का रुख साफ था:
– 17 अप्रैल 2026 को उप सचिव, वाणिज्य एवं उद्योग विभाग ने आदेश दिया था जिसमें 17 फरवरी 2026 के केंद्रीय गोंड महासभा के आंतरिक निर्वाचन को वैध मानते हुए एम.डी. ठाकुर को अध्यक्ष घोषित किया गया था।
– 4 मई 2026 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने रजिस्ट्रार फर्म एवं संस्थाओं के आदेश पर स्थगन देते हुए उप सचिव के उक्त आदेश को यथावत बनाए रखा।
– उसी दिन हाई कोर्ट ने कलेक्टर को धारा 33 (ग) के तहत नया चुनाव कराने हेतु प्राधिकृत अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया।
लेकिन फिर क्या हुआ?
– 6 मई 2026 को कलेक्टर ने एमडी ठाकुर द्वारा कराए गए निर्वाचन को अमान्य कर दिया और प्रफुल्ल कुमार गुप्ता को निर्वाचन अधिकारी नियुक्त कर दिया।
– 7 मई 2026 को रजिस्ट्रार फर्म एवं सोसायटी ने “कचना धुरवा गोंडवाना भवन” को विरोधी गुट को सौंपने का आदेश जारी कर दिया।
एम.डी. ठाकुर का कहना है कि उन्होंने 17 अप्रैल के आदेश के पालन में भवन का कब्जा सौंपे जाने का बार-बार निवेदन किया, लेकिन प्रशासन ने कोई सुनवाई न करते हुए भवन को विरोधी पक्ष को दे दिया – जो उनकी नजर में न्यायालय की सीधी अवमानना है।
धरने पर उतरा समाज
इस निर्णय के बाद गोंड समाज में आक्रोश की लहर दौड़ गई। पदाधिकारियों ने 18 मई को दुर्ग कलेक्टर कार्यालय के सामने सामूहिक रूप से धरने पर बैठने का निर्णय लिया। प्रदर्शनकारियों ने:
– संगठन के छह “विरोधी नेताओं के पुतले जलाए”
– “मुख्यमंत्री को ज्ञापन” सौंपने की घोषणा की
– धरने के बाद “कचना धुरवा देवालय परिसर पर पुनः अपना कार्यालय स्थापित” करने और समाज का संचालन अपने हाथ में लेने का ऐलान किया
समाज की पीड़ा: सिर्फ भवन नहीं, अस्तित्व का सवाल
यह विवाद सिर्फ ईंट-पत्थर का नहीं है। कचना धुरवा देवालय केंद्रीय गोंड महासभा धमधागढ़ का वह केंद्र है जहां से समाज के सांस्कृतिक, सामाजिक और संगठनात्मक कार्य संचालित होते हैं। जब यह भवन किसी अन्य के कब्जे में चला जाता है, तो समाज के बड़े-बुजुर्गों को लगता है जैसे उनकी पहचान पर ताला लग गया हो। एमडी ठाकुर जैसे पदाधिकारियों की पीड़ा यह है कि वे न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाते हैं, जीतते हैं – फिर भी न्याय नहीं मिलता। कागज़ पर आदेश होता है, ज़मीन पर कुछ और।
अबआगे क्या?
समाज के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यदि प्रशासन ने न्यायालय के आदेश का सम्मान करते हुए भवन वापस नहीं किया, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। मुख्यमंत्री को दिए जाने वाले ज्ञापन में उच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना का उल्लेख करते हुए प्रशासनिक कार्रवाई की मांग की जाएगी।
यह प्रकरण एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है ” जब न्यायालय बोल चुका हो, तो प्रशासन की चुप्पी किसके हित में है?”





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