देश में इन दिनों विकास और निजीकरण (Privatization) की एक नई बहस छिड़ी हुई है।
वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने हाल ही में सोशल मीडिया और उद्योग मंचों के जरिए सरकार से एक बड़ी मांग की है। उनका कहना है कि देश की 24 सरकारी कंपनियों (PSU) को निजी हाथों में सौंप दिया जाए। इसके साथ ही, उन्होंने बालको (BALCO) में सरकार की बची हुई 49% और हिंदुस्तान जिंक में 26% हिस्सेदारी भी वेदांता को देने की वकालत की है। तर्क दिया जा रहा है कि “इससे उत्पादन बढ़ेगा, रोजगार बढ़ेगा और देश आत्मनिर्भर बनेगा।”
सुनने में यह बातें किसी सुनहरे भविष्य के सपने जैसी लगती हैं। लेकिन, कॉर्पोरेटी गलियारों की इस चकाचौंध से दूर, छत्तीसगढ़ के कोरबा और सक्ती में मजदूरों के आंसू और उनके उजड़े हुए घर एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं।
‘पहले सस्ते में खरीदा, अब पूरी थाली चाहिए’
बालको (भारत एल्युमिनियम कंपनी) की कहानी हमें दो दशक पीछे ले जाती है। साल 2001 में तत्कालीन सरकार के निजीकरण कार्यक्रम के तहत बालको को महज 551 करोड़ रुपये में वेदांता की पूर्ववर्ती कंपनी ‘स्टरलाइट’ को बेच दिया गया था। उस समय भी इस सौदे ने पूरे देश में भूचाल ला दिया था। संसद से लेकर सड़क तक हंगामा हुआ, मजदूरों ने महीनों हड़ताल की और आरोप लगे कि देश की अनमोल संपत्ति कौड़ियों के भाव बेची जा रही है।
आज वही बालको हजारों करोड़ का मुनाफा कमा रही है। अब अनिल अग्रवाल की मांग है कि सरकार अपनी बची हुई 49% हिस्सेदारी भी उन्हें दे दे। इसे सीधे शब्दों में कहें तो- “पहले आधी थाली सस्ते में ली, अब पूरी थाली चाहिए।”
निजीकरण के बाद बालको में क्या-क्या बदला?
आंकड़े और दावे अपनी जगह हैं, लेकिन एक आम मजदूर की जिंदगी में निजीकरण ने क्या असर डाला, यह जानना बेहद जरूरी है:
– स्थायी नौकरियों का अंत: बालको में धीरे-धीरे स्थायी मजदूरों की संख्या कम कर दी गई और उनकी जगह ठेका मजदूरी (Contract Labor) का विस्तार किया गया। ठेका मजदूरों को न तो नौकरी की सुरक्षा मिलती है और न ही उचित वेतन।
– पेंशन के लिए दर-दर की ठोकरें: कोरबा के सेवानिवृत्त बालको कर्मचारी आज भी अपनी पेंशन, बकाया हिसाब और चिकित्सा सुविधाओं के लिए त्रिपक्षीय बैठकों में संघर्ष कर रहे हैं। जिन हाथों ने कंपनी की नींव रखी, वे बुढ़ापे में अपने ही हक के लिए मोहताज हैं।
– सुरक्षा से समझौता और हादसों की सूची: मुनाफा बढ़ाने की होड़ में मजदूरों की सुरक्षा को ताक पर रख दिया गया, जिसका नतीजा भयानक हादसों के रूप में सामने आया।
‘निगरानी हटाओ, हम पर भरोसा करो’ – लेकिन किस कीमत पर?
कंपनियां बेचने के साथ-साथ वेदांता चेयरमैन की एक और मांग है- ‘सेल्फ-सर्टिफिकेशन’
(Self-Certification) लागू करना। इसका मतलब है कि कंपनी खुद यह तय करेगी कि वह सुरक्षा नियमों का पालन कर रही है या नहीं। सरकारी इंस्पेक्टरों की कोई जरूरत नहीं। उनका कहना है, “हम पर भरोसा करो।”
लेकिन यह ‘भरोसा’ मांगने वालों का इतिहास क्या है? हाल ही में छत्तीसगढ़ के सक्ती स्थित वेदांता के पावर प्लांट में एक भयानक हादसा हुआ। बॉयलर फटने से 25 से अधिक मजदूर काल के गाल में समा गए। जो मजदूर जिंदा बचे, वे जिंदगी भर का अपंगता का घाव लेकर घर लौटे। इतने बड़े हादसे के बाद भी किसी बड़े अधिकारी पर कोई भी ठोस कार्रवाई नहीं हुई। पीड़ित परिवारों को अपने बच्चों और पतियों की मौत का मुआवजा मांगने के लिए भी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।
इससे पहले, 23 सितंबर 2009 को कोरबा में बालको की निर्माणाधीन चिमनी ढह गई थी, जिसमें 56 से अधिक मजदूर मलबे में दबकर मर गए थे। आज 15 साल बीत जाने के बाद भी वह मुकदमा अदालत की फाइलों में धूल फांक रहा है। गवाहों पर दबाव बनाने के आरोप लगते रहे हैं और न्याय आज भी अधूरा है।
अब देश के सामने असली सवाल
अनिल अग्रवाल अक्सर यह दावा करते हैं कि उन्होंने सरकारी खजाने में 4,500 अरब रुपये का योगदान दिया है। यह एक बड़ा आंकड़ा है, लेकिन क्या इस दौलत की नींव उन मजदूरों की चिताओं पर रखी जा सकती है जिनकी जान काम के दौरान चली गई?
निजीकरण देश की अर्थव्यवस्था के लिए सही है या गलत, यह देश के अर्थशास्त्रियों की लंबी बहस का विषय हो सकता है। लेकिन एक इंसान और एक नागरिक के तौर पर सवाल बिल्कुल सीधा है-
जो कंपनी अपने मजदूरों की जान की हिफाजत नहीं कर सकती, जो बड़े हादसों के बाद जिम्मेदारी लेने से बचती है, और जिसके राज में रिटायर्ड कर्मचारी अपनी पेंशन के लिए तरसते हैं… क्या ऐसी कंपनी पर “भरोसा” करके सरकारी निगरानी हटा लेना सही है?
यह मांग किसके हित में है? उस मजदूर के हित में जो चंद रुपयों के लिए अपनी जान जोखिम में डालता है, या उस अकूत मुनाफे के हित में जिसकी कोई सीमा नहीं है?
“इसका जवाब देश की जनता और सरकार, दोनों को खुद तय करना होगा।”





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