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वट सावित्री व्रत – सुहाग का सबसे बड़ा त्योहार

खरसिया(पब्लिक फोरम)। आज खरसिया के बरगढ़ श्री सिद्धेश्वरनाथ मंदिर प्रांगण मे वही आस्था और श्रद्धा का नज़ारा देखने को मिला। सुहागिनों ने सोलह शृंगार कर वटवृक्ष के नीचे बैठकर पूरे विधि-विधान से पूजा की।

व्रत की मान्यता
हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। मान्यता है कि सावित्री ने अपने तप और पतिव्रत धर्म से यमराज से सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे। तभी से सुहागिनें अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी दांपत्य जीवन के लिए ये व्रत रखती हैं।

खरसिया में कैसे मना

सुबह स्नान कर लाल-पीली साड़ी और सोलह शृंगार में महिलाएं मंदिर पहुंचीं।
वटवृक्ष को जल, रोली, अक्षत, फूल चढ़ाए। कच्चा सूत लेकर वटवृक्ष की 7 या 108 परिक्रमा की।
सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी। पंडित जी ने कथा सुनाई कि कैसे सावित्री ने यमराज को भी हरा दिया ,भीगे चने, फल, मिष्ठान का भोग लगाया और पति की दीर्घायु के लिए प्रार्थना की।
बड़ों से आशीर्वाद लेकर निर्जला व्रत रखा। शाम को कथा के बाद फलाहार से व्रत खोला जाएगा।
वटवृक्ष को अक्षयवट भी कहते हैं। इसका कभी नाश नहीं होता, इसलिए इसे अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। बरगद की लंबी उम्र की तरह ही पति की उम्र भी लंबी हो, यही कामना हर सुहागिन ने वटवृक्ष से की।
आज पूरे देश के साथ खरसिया की धरती भी “सौभाग्यवती भव” के आशीर्वाद से गूंज उठी।

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