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खून से लथपथ मुनाफा: सक्ती-सिंघीतराई में 20 मजदूरों की मौत – वेदांता की लापरवाही या सिस्टम की मिलीभगत?

रमन सरकार का MoU, यूपीए की पर्यावरण अनुमति, और भाजपा सरकार में हुई मौतें – किसकी जवाबदेही तय होगी? सक्ती विधायक डॉ. चरणदास महंत मांग रहे हैं न्यायिक जांच और उचित मुआवजा

कोरबा/सक्ती (पब्लिक फोरम) । 14 अप्रैल 2026 की दोपहर जब छत्तीसगढ़ का सक्ती जिला डॉ बाबा साहेब अंबेडकर जयंती की खुशियों में डूबा था, तब सिंघीतराई गांव में वेदांता के थर्मल पावर प्लांट से उठा धुएं का एक गुबार 20 मजदूरों की जिंदगियां हमेशा के लिए निगल गया। बॉयलर स्टीम पाइप का वह विस्फोट महज एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं थी – यह उस पूरी व्यवस्था का विस्फोट था जो वर्षों से कॉर्पोरेट मुनाफे की बलिवेदी पर श्रमिकों की जानें चढ़ाती आई है।

प्लांट का इतिहास: कैसे बना यह ‘मौत का कारखाना’?

यह कहानी शुरू होती है 2009 से, जब हैदराबाद की कंपनी एथेना छत्तीसगढ़ पावर लिमिटेड (ACPL) ने जांजगीर-चांपा जिले के डभरा तहसील के सिंघीतराई, बेनीपाली, ओडेकेरा और निमोही गांवों की जमीन पर 1,200 मेगावाट क्षमता के कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट की नींव रखी। दो यूनिट – प्रत्येक 600 मेगावाट। सुनने में बड़ा सपना लगता था, लेकिन इस सपने के पीछे की सच्चाई बेहद अंधेरी है।

रमन सरकार ने दिया था राज्य अनुमति का ‘वरदान’

तत्कालीन भाजपा मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सरकार के कार्यकाल में एथेना कंपनी ने छत्तीसगढ़ राज्य सरकार से एमओयू (MoU) किया था। राज्य की जमीन, राज्य का पानी, राज्य का कोयला (SECL से कोल लिंकेज) – सब कुछ एक निजी हैदराबादी कंपनी को सौंप दिया गया। इसके अलावा मध्यप्रदेश और नेपाल सरकार के साथ पावर परचेज एग्रीमेंट भी कंपनी ने किया। यानी आदिवासी और किसानों की जमीन पर बना प्लांट, और उसकी बिजली बिकेगी बाहर।

यूपीए/कांग्रेस की केंद्र सरकार ने दी पर्यावरणीय स्वीकृति

2011 में तत्कालीन यूपीए सरकार (कांग्रेस नेतृत्व) के केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय (MoEF) ने इस 2×600 MW परियोजना को पर्यावरणीय स्वीकृति प्रदान की। यह वह दौर था जब पर्यावरण मंजूरी बड़े कॉर्पोरेट घरानों के लिए महज औपचारिकता बन चुकी थी। प्रश्न उठता है – क्या उस समय पर्यावरण और श्रम सुरक्षा मानकों की गहन जांच की गई थी?

2016 से 2022: ‘भ्रष्ट सपने’ का ठप्प पड़ना

2016 में प्लांट का निर्माण अचानक बंद हो गया। यूनिट-1 का मात्र 80 प्रतिशत और यूनिट-2 का केवल 30 प्रतिशत काम पूरा था। अधूरा प्लांट, बर्बाद जमीन, विस्थापित ग्रामीण – और कंपनी दिवालिया घोषित! 2016 से 2022 तक छह साल यह ‘विकास का महल’ खंडहर बना खड़ा रहा। इन छह वर्षों में जिन किसानों और आदिवासियों की जमीन गई, उनका क्या हुआ – इसका कोई जवाब किसी सरकार ने नहीं दिया।

वेदांता का प्रवेश: ‘मसीहा’ या नए शोषक?

2022 में अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता लिमिटेड ने Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) 2016 के तहत दिवालिया कार्यवाही के माध्यम से इस अधूरे प्लांट को औने-पौने दाम में खरीद लिया। जुलाई 2023 में NCLT हैदराबाद के आदेश से इसे वेदांता में विलय कर दिया गया और नया नाम दिया – Vedanta Ltd. Chhattisgarh Thermal Power Plant (VLCTPP)।
जुलाई 2025 में यूनिट-1 (600 MW) का कमीशनिंग हुई। वेदांता ने इसे ‘पुनरुद्धार की मिसाल’ बताया। कंपनी के प्रचार में भव्य टाउनशिप, विविधता अनुपात, और ‘आधुनिक ऊर्जा संयंत्र’ का ढिंढोरा पीटा गया। लेकिन जो नहीं दिखाया गया वह था – श्रमिक सुरक्षा की भयावह उपेक्षा। कमीशनिंग के मात्र नौ महीने बाद हुए विस्फोट ने वेदांता के उस झूठे प्रचार की कलई खोल दी।

14 अप्रैल 2026: जब सिंघीतराई का आसमान खून से रंग गया

दोपहर की पारी चल रही थी। सैकड़ों मजदूर अपनी-अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे थे, तभी बॉयलर से टर्बाइन को उच्च दबाव वाली भाप पहुंचाने वाली स्टील पाइप में भयावह विस्फोट हुआ। अत्यधिक दबाव पर गर्म भाप का यह विस्फोट किसी बम से कम नहीं था – जो मजदूर उस क्षेत्र में थे, वे गंभीर रूप से जल गए। 14 मजदूरों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। बाद में मृतकों की संख्या बढ़कर 20 हो गई। दर्जनों घायल हुए।
सवाल यह है – क्या यह महज ‘दुर्घटना’ थी? जानकार बताते हैं कि उच्च दबाव स्टीम पाइप का विस्फोट तभी होता है जब नियमित रखरखाव, सुरक्षा ऑडिट और मेंटेनेंस प्रोटोकॉल की घोर उपेक्षा हो। कमीशनिंग के नौ महीने के भीतर ऐसी घटना का होना इस बात का प्रमाण है कि वेदांता ने उत्पादन की होड़ में सुरक्षा को ताक पर रख दिया था।

मुआवजे का ऐलान – पर्याप्त है या अपमानजनक?

राज्य सरकार (CM विष्णुदेव साय): प्रत्येक मृतक परिवार को 5 लाख रुपए, घायलों को 50,000 रुपए। वेदांता कंपनी: प्रत्येक मृतक को 35 लाख रुपए, घायलों को 15 लाख रुपए, वेतन जारी रखने और रोजगार सहायता का वादा। सवाल: जब एक निजी कंपनी वेदांता 35 लाख रुपए दे सकती है, तो सरकार मात्र 5 लाख रुपए पर क्यों अटक गई? क्या एक मजदूर की जान की कीमत सिर्फ 5 लाख रुपए है?

राजनीतिक जवाबदेही: सवालों के कटघरे में कौन-कौन?

इस हादसे ने एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है – आखिर इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार कौन है? प्लांट की जमीन से लेकर इसके संचालन तक कई सरकारों और नीतियों की भूमिका रही है।
रमन सिंह सरकार (भाजपा, 2009): राज्य MoU के तहत आदिवासी क्षेत्र की जमीन, पानी और कोयला एक निजी कंपनी को सौंपा। क्या उस समय श्रम सुरक्षा मानकों की शर्तें अनुबंध में शामिल थीं?
यूपीए सरकार/कांग्रेस (2011): केंद्रीय पर्यावरण अनुमति देते समय क्या श्रमिक सुरक्षा और औद्योगिक मानकों का आकलन किया गया था? पर्यावरण स्वीकृति में क्या शर्तें थीं और उनका पालन हुआ?
वर्तमान भाजपा सरकार (2022 से अब तक): वेदांता को अधिग्रहण और संचालन की अनुमति देते समय औद्योगिक सुरक्षा ऑडिट क्यों नहीं कराई गई? श्रम विभाग और पर्यावरण विभाग ने आंखें क्यों मूंदे रखीं?
वेदांता लिमिटेड (2022-2026): IBC प्रक्रिया से सस्ते में प्लांट खरीदा, जुलाई 2025 में कमीशनिंग की, और मात्र 9 महीने में 20 मजदूर मार डाले। क्या मरम्मत और सुरक्षा मानकों में जानबूझकर कटौती की गई?

डॉ. चरणदास महंत की मांग: सिर्फ़ न्याय नहीं, जवाबदेही चाहिए!

सक्ती विधानसभा क्षेत्र के विधायक एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता डॉ. चरणदास महंत ने इस दुर्घटना को ‘कॉर्पोरेट नरसंहार’
करार देते हुए सरकार की विभागीय जांच को नाकाफी बताया है। उनकी प्रमुख मांगें हैं – न्यायिक जांच, उचित मुआवजा, दोषियों पर आपराधिक मुकदमा, और श्रमिक सुरक्षा कानूनों का कड़ाई से पालन। श्री महंत ने यह भी मांग की है कि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हो, ताकि जनता जान सके कि किसकी लापरवाही ने 20 घरों के चिराग बुझाए।

तीन जांचें, एक सवाल – क्या होगा नतीजा?

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बिलासपुर संभागायुक्त से जांच कराने का आदेश दिया है। जिला प्रशासन ने डभरा SDM से मजिस्ट्रियल जांच कराने का फैसला किया है – रिपोर्ट 30 दिनों में देनी होगी। खुद वेदांता ने भी आंतरिक जांच बिठाई है। लेकिन इतिहास गवाह है – छत्तीसगढ़ के बड़े औद्योगिक हादसों में सरकारी और कंपनी जांचें प्रायः ‘क्लीन चिट’ देकर फाइल बंद कर देती हैं। डॉ. चरणदास महंत सहित मजदूर संगठन ऐक्टू एवं अन्य, और विपक्ष की मांग सही है – इस मामले में हाईकोर्ट की निगरानी में न्यायिक जांच हो।

मजदूर की जान – कॉर्पोरेट का ‘बाय-प्रोडक्ट’ कब तक?

सिंघीतराई का यह हादसा अकेला नहीं है। यह उस दुष्चक्र का हिस्सा है जिसमें सरकारें – चाहे किसी भी दल की हों – कॉर्पोरेट पूंजी के सामने श्रमिकों की जान को ‘स्वीकार्य जोखिम’ मान लेती हैं। रमन सरकार ने जमीन दी, यूपीए ने मंजूरी दी, भाजपा सरकार ने वेदांता को खुली छूट दी – और अपनी जान देकर कीमत चुकाई 20 मजदूर परिवारों ने।
जब तक छत्तीसगढ़ में औद्योगिक सुरक्षा को लेकर कोई ठोस, पारदर्शी और दलगत राजनीति से परे जवाबदेही तय नहीं होती – तब तक सिंघीतराई जैसे हादसे होते रहेंगे, जांचें बैठती रहेंगी, मुआवजे मिलते रहेंगे, और मजदूर मरते रहेंगे।

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