— एक कविता अधमरी सी — बालको थी कभी देश की शान,मजदूरों के पसीने से बना अरमान,आज वो सिर्फ एक दुकान है,सिर्फ एक कारोबारी वेदांता का निशान है। चिमनियों से उगलता ज़हर,हवा में घुला हर सांस का कहर है।आम आदमी खांसता है, तड़पता है,पर अखबार की सुर्खी नहीं बनता, शायद विज्ञापनों का कुछ ज्यादा ही […]