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कब्र पर खड़ी दुकान

— एक कविता अधमरी सी —

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बालको थी कभी देश की शान,
मजदूरों की लहू-पसीने से सींचा गया
एक उन्नत अरमान।
आजादी के बाद की छत्तीसगढ़िया निशानी
युवाओं के मजबूत सपने,
अंचल का गर्व
एक भरोसा, एक सम्मान।
आज वो सिर्फ एक दुकान है,
और एक कारोबारी वेदांता के मुनाफे का बुलंद निशान है।
अब मत पूछिए कि यह सब हुआ कैसे
यह इतिहास तो और भी महान है।

देखिए, चिमनियों से उगलता ज़हर,
हवा में घुला हर सांस का कहर है।
आम आदमी खांसता है, तड़पता है,
पर अखबार की सुर्खी नहीं बनता, शायद विज्ञापनों का कुछ ज्यादा ही असर है।

सड़कें? वो अब सड़कें नहीं, फ़रेब हैं,
गड्ढों में छिपे मौत के सैलाब हैं,
हर मोड़ पर एक कब्र खुदी पड़ी है,
और सरकार की सड़क सुरक्षा योजना फाइलों में कैद धूल-धक्कड़ों से ढंकी पड़ी है।

एक युवा की अब सुनो कहानी,
जिसकी आंखों में सपनों का पानी,
डिग्री लेकर निकला था घर से,
सोचा था बदलेगा अपना कल इस शहर से।

पहले साल दिया इंटरव्यू, फिर वेटिंग लिस्ट,
फिर एक फॉर्म, फिर एक और टेस्ट,
हर बार कहा गया – थोड़ा और इंतज़ार।
इंतज़ार करते-करते नौकरी की उम्र हो गया कब का पार, अब क्या करें यार।

कंपनी के गेट पर लगी है भीड़,
अंदर मशीनें हैं, बाहर उम्मीदें,
ठेके पर मजदूर, ठेकेदारों के मूड पर पर टिकी मजदूरों की जान, फेसबुक पर अक्सर खिलते हैं, मालिक की मुस्कान। मासूम, वात्सल्यमयी, माटी की खुशबू और देश की अदभुत मनमोहक बातें, संपत्ति का दान। कितना अपनापन।
स्थायी नौकरी अब सिर्फ एक अफ़साना है, एक विज्ञापन।

बालको के बच्चे बालको में, बालको से मांगे नौकरी,
पर बाहर से आती है हर बार एक बड़ी चंडाल-चौकड़ी।
स्थानीय युवा दर-दर भटकता है,
और कंपनी का मुनाफा दिल्ली-मुंबई से लंदन तक सरकता है।

नशे की गिरफ्त में डूबते सपने,
बेरोज़गारी ने बदल दिए हैं उनके ‘मेरे-अपने’। जो कभी क्रिकेटर, इंजीनियर बनकर कुछ करना चाहता था,
आज वो सड़क किनारे बेबस खड़ा रहता है।
और सिस्टम? वो सिस्टम नहीं रहा अब,
वह एक गुलाम है, जंजीरों में जकड़ा,
जिसकी जुबान वेदांता की भाषा बोलती है,
जिसकी कलम अक्सर पूंजी के इशारे पर ही डोलती है।

कलेक्टर की मेज पर कंपनी की फाइल पहले,
मजदूर की अर्ज़ी बरसों तक धूल में हुए मैले,
थाने में रिपोर्ट लिखी जाती नहीं उसकी,
और अफसर बन जाता है कंपनी का पिट्ठू। हाय रे निखट्टू।

वोट मांगे विधायक “स्थानीय रोज़गार” के नाम पर,
जीत के बाद बैठे कंपनी के इनाम पर।
मंत्री के रिश्तेदार करें नौकरी यहीं पर, इसी शहर,
और यहां का बेटा तरसे रोटी-रोज़ी को आठों पहर।

ये गुलामी केवल जंजीर की नहीं, यह गुलामी सिर्फ़ दिमाग की है।
हर फाइल, हर फैसला अब सिर्फ मुनाफ़े के हिसाब की है।
जनता चुनती है सरकार, सरकार चुनती है कंपनी,
और बीच में पिसती रहती है मजदूर की जवानी, और बन जाती है युवाओं के बेरोजगारी की कई ज़हरीली कहानी।

पर जो सच बोलेगा,
और जो दिखाएगा आईना,
जो मज़दूर पूछेगा – मेरी नौकरी कहां है?
उसके लिए यहां एक खास इंतज़ाम है।
कभी मुकदमा, कभी धमकी, कभी तबादला, निलंबन से बर्खास्तगी तक
नौकरी के नाम पर सिर्फ़ सुनसान गली में ही उसके लिए अब बचा कुछ काम है।

फिर भी लोग तो बोलेंगे, फिर भी लोग तो लिखेंगे,
हर दुकान बनी कंपनी से हिसाब मांगेंगे,
ये मजदूरी, ये बेरोज़गारी, लाचारी और मजबूरी, अब जनता की तक़दीर सही। मगर, यह ममतामयी   माटी किसी की जागीर नहीं।

अब तो उठो युवाओं, ये गुलामी तोड़नी है,
हर ज़ुल्म का हिसाब आज फिर से मांगना है।
सोच से सच तक, यही हमारा रास्ता है,
हर बेरोज़गार जवानी को न्याय और संघर्ष का वास्ता है।
सोच से सच तक…

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