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दिल्ली के साकेत थाने में महिला पत्रकारों से मारपीट: भाकपा ने की निंदा

मुस्लिम पहचान बताने पर बढ़ी बर्बरता, आरोप – दिल्ली पुलिस विवादों में
पत्रकार शाहीन खान प्रकरण: भाकपा कोरबा ने की न्यायिक जांच की मांग

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कोरबा (पब्लिक फोरम)। दिल्ली के साकेत थाने में महिला पत्रकार शाहीन खान और नफीसा खान के साथ हुई कथित मारपीट के मामले ने तूल पकड़ लिया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), जिला कोरबा के जिला सचिव पवन कुमार वर्मा ने प्रेस बयान जारी कर इस घटना की कड़ी निंदा की और इसे प्रेस की स्वतंत्रता तथा संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला बताया।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के अनुसार, पत्रकार शाहीन खान का आरोप है कि थाने के भीतर उनकी मुस्लिम पहचान सामने आने के बाद उनके साथ मारपीट और अधिक क्रूर हो गई। यदि यह आरोप सही पाया जाता है, तो यह मामला केवल एक पुलिसिया ज़्यादती तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि धार्मिक पहचान के आधार पर भेदभाव का गंभीर सवाल खड़ा करता है। भाकपा नेता ने कहा कि थाने के भीतर धार्मिक पहचान के आधार पर महिला पत्रकारों को निशाना बनाना और उनके साथ शारीरिक दुर्व्यवहार करना दिल्ली पुलिस के आचरण पर गंभीर सवाल उठाता है, और इसकी तत्काल, स्वतंत्र तथा समयबद्ध जांच की मांग की गई है।

एकजुटता में उतरे राष्ट्रीय नेता
इस घटना के विरोध में पार्टी के राष्ट्रीय सचिवालय के सदस्य रमा कृष्ण पांडा और एनी राजा, नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन विमेन (NFIW) की महासचिव निशा सिद्धू, ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन (AIYF) के अध्यक्ष रौशन कुमार सिन्हा और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF) के महासचिव दिनेश सीरंगराज ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया पहुंचकर पीड़ित पत्रकार शाहीन खान से मुलाकात की और उनके साथ एकजुटता व्यक्त की। यह मुलाकात दर्शाती है कि यह मामला अब केवल स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकार और नागरिक अधिकार संगठनों के ध्यान का विषय बन चुका है।

पहले भी उठे सवाल
जिला सचिव वर्मा ने इस घटना को अकेली नहीं, बल्कि एक बड़े पैटर्न का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में दिल्ली पुलिस एक बेलगाम ताकत बनती जा रही है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने 20 जुलाई के छात्र आंदोलन का ज़िक्र किया, जिसमें छात्रों पर हमला हुआ और पैलेट गन (छर्रे वाली बंदूक) का इस्तेमाल किया गया, जबकि कैमरे के सामने अपराध कबूल करने वाले दक्षिणपंथी युवकों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने से इनकार किया गया। पार्टी का कहना है कि एक तरफ छात्रों, पत्रकारों और असहमति की आवाज़ों का दमन, और दूसरी तरफ राजनीतिक संरक्षण प्राप्त गुंडों को छूट – यह दोहरा रवैया बर्दाश्त के लायक नहीं है।

आम पत्रकार और नागरिक पर असर
यह घटना सिर्फ दो पत्रकारों तक सीमित नहीं है। जब किसी थाने के भीतर, जो कि सुरक्षा और न्याय का प्रतीक माना जाता है, महिला पत्रकारों के साथ ऐसा बर्ताव होता है, तो यह हर उस पत्रकार के मन में डर पैदा करता है जो सच लिखने या सवाल पूछने की कोशिश करता है। ख़ासकर महिला पत्रकारों और अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े रिपोर्टरों के लिए यह घटना एक चेतावनी की तरह देखी जा रही है कि मैदान पर काम करना कितना असुरक्षित हो सकता है।

पार्टी की मांग और आगे की राह
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, जिला परिषद कोरबा ने स्पष्ट मांग रखी है कि —
🔹दिल्ली पुलिस के इस पूरे आचरण की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच हो।
🔹दोषी पुलिसकर्मियों को चिन्हित कर उन्हें जवाबदेह ठहराया जाए।
🔹पीड़ित पत्रकारों शाहीन खान और नफीसा खान को न्याय दिलाया जाए।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का कहना है कि यदि समय रहते जवाबदेही तय नहीं की गई, तो यह घटना प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के लिए एक खतरनाक मिसाल बन सकती है।
(यह रिपोर्ट भाकपा जिला कोरबा के आधिकारिक प्रेस बयान पर आधारित है। घटना से जुड़े स्वतंत्र सत्यापन हेतु दिल्ली पुलिस और संबंधित पक्षों का पक्ष जानने का प्रयास जारी है।)

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