जब से केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) की सरकार बनी है, तब से पटरी-फेरी वालों (स्ट्रीट वेंडर्स — सड़क किनारे सामान बेचने वालों) को लगातार हमलों और वहां से हटाए जाने की धमकियों का सामना करना पड़ रहा है। समाज के सबसे निचले तबके के लोग गहरे संकट से जूझ रहे हैं, जिससे उनके लिए गुज़ारा करना मुश्किल हो गया है। सरकारी तंत्र सीधे तौर पर ऐसी कार्रवाई कर रहा है, जिससे राज्य भर में लगभग 5,50,000 स्ट्रीट वेंडर्स की आजीविका और काम-धंधे खत्म हो रहे हैं।
कुछ इक्का-दुक्का घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करके, सरकारी तंत्र यह धारणा बनाने की कोशिश कर रहा है कि सड़क पर सामान बेचना एक गैर-कानूनी काम है, जिसका मकसद पटरी-फेरी वालों की रोजी-रोटी खत्म करना है। कई स्थानीय निकाय लोगों को हटाने की कार्रवाई करते हैं, जिससे आम लोगों का जीवन मुश्किल हो जाता है।
सड़क किनारे सामान बेचने वालों को उन जगहों से हटाया जा रहा है, जहाँ वे 40 साल से ज़्यादा समय से अपना काम कर रहे हैं। बिना किसी पूर्व सूचना के, खुदाई करने वाली मशीनों (एक्सकेवेटर) का इस्तेमाल करके रातों-रात उनकी रोज़ी-रोटी का ज़रिया खत्म किया जा रहा है और उन्हें ज़बरदस्ती उनकी काम की जगहों से हटाया जा रहा है। पटरी-फेरी वालों को हटाने से पहले 30 दिन का नोटिस देने की कानूनी ज़रूरत का भी पालन नहीं किया जा रहा है। हालाँकि कानून में साफ़ तौर पर उन प्रक्रियाओं के बारे में बताया गया है, जिनका पालन उन्हें हटाने के दौरान किया जाना चाहिए, लेकिन अधिकारियों ने उनमें से किसी भी प्रक्रिया का पालन करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है।

पुलिस और स्थानीय निकाय इन बड़े पैमाने पर बेदखली अभियानों का नेतृत्व कर रहे हैं। भाजपा-शासित तिरुवनंतपुरम नगर निगम, यूडीएफ-नीत कोल्लम और कन्नूर नगर निगम, कई नगर पालिकाओं और मुन्नार जैसी टाउन पंचायतों सहित कई इलाकों से पटरी-फेरी वालों को गैर-कानूनी तरीके से हटाया गया है। इससे पहले कभी भी कामगारों को इतने बेरहम दमन और अमानवीय व्यवहार का सामना नहीं करना पड़ा है।
केरल के कोल्लम में पुलिस अधिकारियों ने 75 साल के लॉटरी बेचने वाले की गर्दन दबाकर उसे ज़मीन पर गिरा दिया, जिससे उसकी साँसें फूलने लगीं, और फिर उसे पुलिस जीप में डाल दिया।
इस तरह की कार्रवाई एक्ट की धारा 3(3) का उल्लंघन है। यह धारा निर्देश देती है कि स्थानीय स्व-शासन निकाय पटरी-फेरी वालों के व्यापारिक क्षेत्र का पता लगाने और उन्हें लाइसेंस जारी करने के लिए सर्वे करने के बाद ही उन्हें उनके काम करने की जगह से हटा सकते हैं या बेदखल कर सकते हैं।
ये हमले और बड़े पैमाने पर लोगों को हटाने की कार्रवाई, 2014 में संसद द्वारा पारित ‘स्ट्रीट वेंडर्स लाइवलीहुड प्रोटेक्शन रेगुलेशन एक्ट’ और इसके आधार पर केरल में सरकार द्वारा शुरू किए गए नियमों और योजनाओं का उल्लंघन करके की जा रही हैं।
इस परिदृश्य में, पटरी-फेरी वालों समेत आम लोगों को 2016 से 2026 तक राज्य में शासन करने वाली एलडीएफ सरकारों द्वारा उठाए गए कल्याणकारी कदमों को याद करने का मौका मिला है। केंद्रीय कानून के आधार पर, केरल ने 2018 में ‘केरल राज्य स्ट्रीट वेंडर्स आजीविका संरक्षण कानून’ लागू किया था। 2019 में, इस कानून के तहत एक योजना भी शुरू की गई थी। पटरी-फेरी वालों का सर्वे करने और उन्हें पहचान पत्र व लाइसेंस जारी करने के लिए सरकार ने विशेष आदेश जारी किए थे। इसके साथ ही, सभी नगर पालिकाओं में शहरी व्यापार समितियां बनाई गईं थीं। सभी नगर पालिकाओं और नगर निगमों ने कामगारों के बीच सर्वे आयोजित किए थे और इसी सर्वे के आधार पर पहचान पत्र और लाइसेंस जारी किए गए थे।
सर्वे सूची में शामिल कामगारों में से शहरी व्यापार समितियों के लिए कामगारों का लोकतांत्रिक चुनाव भी वामपंथी सरकार के ठोस हस्तक्षेप का हिस्सा था। तिरुवनंतपुरम और त्रिशूर नगर निगमों में वेंडिंग मार्केट भी शुरू किए गए थे।
2020 में, सरकार ने इस एक्ट की धारा 20 के तहत ‘शिकायत निवारण और विवाद समाधान समिति’ का गठन किया था। पटरी-फेरी वाले मनमानी प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करने के बजाय, बेदखली, लाइसेंस रद्द होने या अन्य विवादों के मामले में इस समिति के सामने अपील कर सकते हैं।
भारत के ज़्यादातर दूसरे राज्यों के विपरीत, केरल में शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच कोई बड़ा फ़र्क नहीं है। इस खास बात को ध्यान में रखते हुए, केरल की वामपंथी सरकार ने पंचायतों के लिए एक विशेष आदेश जारी किया था। इसमें पंचायतों से कहा गया था कि वे सड़क किनारे सामान बेचने वालों का सर्वे करें और उनकी आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित करें। इस आदेश के आधार पर, पंचायतों ने पूरे राज्य में स्ट्रीट वेंडर्स का सर्वे किया था।
असंगठित कामगार कल्याण कोष बोर्ड ने भी पटरी-फेरी वालों के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए खास पहलकदमी की थीं। वामपंथी सरकार ने पटरी-फेरी वालों के कल्याण और उनकी आजीविका की सुरक्षा के लिए कई ईमानदार और सक्रिय कदम उठाए थे, जिससे उनकी सुरक्षा और भलाई के प्रति सरकार की लगातार प्रतिबद्धता दिखाई दी।

स्ट्रीट वेंडर्स फेडरेशन के राज्य अध्यक्ष डॉ. के.एस. प्रदीप के अनुसार, सड़क किनारे सामान बेचने वाले लोग पुलिस और स्थानीय प्रशासन की मनमानी और ज्यादती का तेज़ी से शिकार हो रहे हैं। इसके विपरित, जब वामपंथी सरकार सत्ता में थी, तो कानून का उल्लंघन करके लोगों को गैर-कानूनी तरीके से हटाने वाले अधिकारियों के खिलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाती थी।
(आलेख: एन एस साजित। अनुवाद: संजय पराते। लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।)





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