कोरबा (पब्लिक फोरम)। कोरबा की ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति ने दक्षिण पूर्वी कोयला क्षेत्र (एसईसीएल) प्रबंधन से भूविस्थापित परिवारों के लिए वैकल्पिक रोजगार के अवसर बढ़ाने की मांग की है। समिति ने निविदा प्रक्रिया में संशोधन की मांग करते हुए टेंडर की सीमा बढ़ाने और आउटसोर्सिंग कार्यों में स्थानीय आरक्षण तय करने की बात कही है। समिति का कहना है कि मौजूदा नियमों में बड़ी संख्या में प्रभावित परिवार रोजगार से वंचित रह जाते हैं, जिसके कारण समय-समय पर आंदोलन और खदान बंदी जैसी स्थितियां बनती हैं।
समिति के अध्यक्ष सपुरन कुलदीप ने कहा कि कोयला खनन परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में परिवारों ने अपनी कृषि भूमि और अन्य संपत्तियां गंवाई हैं। मौजूदा व्यवस्था में भूमि अधिग्रहण के बदले मिलने वाला स्थायी रोजगार सीमित परिवारों तक ही पहुंच पाता है, जबकि अधिकांश प्रभावित परिवार रोजगार और आजीविका के साधनों से वंचित रह जाते हैं। यही स्थिति समय-समय पर रोजगार की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन और खदान बंदी जैसी परिस्थितियां पैदा करती है, जिसका असर उत्पादन के साथ-साथ कंपनी के राजस्व पर भी पड़ता है।
समिति ने बताया कि इस समस्या को लेकर एसईसीएल पहले भी कुछ सकारात्मक कदम उठा चुका है। गेवरा, दीपका और कुसमुंडा जैसे बड़े प्रोजेक्टों में ठेका कार्यों में भूविस्थापितों के लिए तय सीमा तक आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। समिति का कहना है कि अब इन प्रावधानों की सीमा बढ़ाकर भूविस्थापित परिवारों को अधिक व्यापक रोजगार अवसर देने की जरूरत है।

समिति की प्रमुख मांगें
समिति ने भूविस्थापित फर्मों और सहकारी समितियों के लिए तय टेंडर सीमा ₹5 लाख से बढ़ाकर न्यूनतम ₹20 लाख करने की मांग की है। साथ ही एक वित्तीय वर्ष में मिलने वाली वार्षिक टेंडर सीमा को ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹5 करोड़ करने की मांग रखी गई है, ताकि सक्षम भूविस्थापित संस्थाएं बड़े स्तर पर काम कर सकें और स्थानीय स्तर पर रोजगार का दायरा बढ़े।
आउटसोर्सिंग और स्थानीय रोजगार
समिति के मुताबिक मौजूदा समय में खनन और उत्पादन से जुड़े अधिकांश कार्य आउटसोर्सिंग के जरिए कराए जा रहे हैं। समिति ने मांग की है कि मिट्टी और कोयला उत्खनन, उत्पादन, परिवहन जैसे कार्यों की निविदा शर्तों में यह अनिवार्य किया जाए कि संबंधित परियोजना से प्रभावित गांवों और खदान क्षेत्रों के बेरोजगारों को कम से कम 80 प्रतिशत रोजगार दिया जाए। इसके अलावा चार पहिया वाहनों से जुड़े कार्यों और टेंडरों में भी भूविस्थापित परिवारों और उनकी संस्थाओं को प्राथमिकता देने की मांग की गई है।
पुरानी व्यवस्थाओं को फिर लागू करने की मांग
समिति ने 30 मई 2018 के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा कि कोल ट्रांसपोर्टेशन के 20 प्रतिशत कार्य स्थानीय भूविस्थापित सहकारी समितियों के जरिए कराए जाने की व्यवस्था थी, जिसे प्रभावी ढंग से फिर लागू किया जाए। समिति ने सीएसआर मद से भी भूविस्थापित परिवारों और उनकी सहकारी समितियों को आजीविका और स्वरोजगार से जुड़े कार्य देने की मांग की है, साथ ही कंपनी की कॉलोनियों, कार्यालयों और अन्य संस्थानों में सेवा कार्यों में स्थानीय भूविस्थापितों को प्राथमिकता देने को कहा है।
पात्रता सत्यापन और निगरानी पर जोर
समिति ने निविदा प्रक्रिया में परियोजना प्रभावित प्रमाण-पत्र के दुरुपयोग को रोकने के लिए पात्रता का कड़ाई से सत्यापन करने की मांग की है। समिति का कहना है कि अगर कोई गैर-प्रभावित व्यक्ति भूविस्थापितों की पात्रता का गलत फायदा उठाता है, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि वास्तविक प्रभावित परिवारों का हक सुरक्षित रहे। इसके साथ ही समिति ने गेवरा क्षेत्र में एस्टीमेट राशि से बेहद कम दर पर स्वीकृत कार्यों की निष्पक्ष जांच की भी मांग की है, जिसमें काम की गुणवत्ता, श्रमिकों को भुगतान और तय मानकों के पालन की पड़ताल शामिल हो।

लंबित मांगों पर फैसले की मांग
समिति ने 8 अगस्त 2022 के आदेश सहित भूविस्थापितों के हित में पहले लिए गए फैसलों के क्रियान्वयन की समीक्षा करने को कहा है, ताकि उनका वास्तविक लाभ प्रभावित परिवारों तक पहुंचे। समिति ने यह भी मांग की है कि पूर्व में सौंपे गए मांग-पत्रों और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों के पत्राचार पर हुई कार्रवाई की जानकारी दी जाए तथा लंबित मांगों पर समयबद्ध निर्णय लिया जाए।
समिति अध्यक्ष सपुरन कुलदीप ने कहा कि भूविस्थापितों को केवल मुआवजा देकर उनकी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। उनका कहना है कि जिन परिवारों ने देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी करने वाली कोयला परियोजनाओं के लिए अपनी जमीन दी है, उनके लिए स्थायी रोजगार, स्वरोजगार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि अगर भूविस्थापितों को निविदाओं, परिवहन, आउटसोर्सिंग और स्वरोजगार में पर्याप्त अवसर मिलते हैं, तो इससे प्रभावित क्षेत्रों में रोजगार बढ़ेगा, स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और रोजगार को लेकर होने वाले विवाद व आंदोलन भी कम होंगे। समिति के मुताबिक इसका सकारात्मक असर एसईसीएल के उत्पादन और कामकाज पर भी पड़ेगा।
ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति ने एसईसीएल के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक और संबंधित क्षेत्रीय प्रबंधन से मांग की है कि भूविस्थापित परिवारों की मौजूदा जरूरतों को देखते हुए प्रचलित नियमों में जरूरी संशोधन कर जल्द आदेश जारी किए जाएं और पहले लिए गए फैसलों को असरदार तरीके से लागू किया जाए।
भूविस्थापितों के रोजगार का सवाल केवल मुआवजे या नियमों की बहस तक सीमित नहीं है, यह उन परिवारों के भविष्य से जुड़ा मसला है जिन्होंने अपनी जमीन देकर देश की ऊर्जा जरूरतों में योगदान दिया। निविदा नीति में संशोधन की यह मांग बताती है कि कोयलांचल में विकास और विस्थापन के बीच संतुलन अब भी अधूरा है। इस पर प्रबंधन का रुख आने वाले समय में कोरबा के भूविस्थापित समुदाय और एसईसीएल के रिश्तों की दिशा तय करेगा।





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