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कब्र पर खड़ी दुकान

— एक कविता अधमरी सी —

बालको थी कभी देश की शान,
मजदूरों के पसीने से बना अरमान,
आज वो सिर्फ एक दुकान है,
सिर्फ एक कारोबारी वेदांता का निशान है।

चिमनियों से उगलता ज़हर,
हवा में घुला हर सांस का कहर है।
आम आदमी खांसता है, तड़पता है,
पर अखबार की सुर्खी नहीं बनता, शायद विज्ञापनों का कुछ ज्यादा ही असर है।

सड़कें? वो अब सड़कें नहीं, फ़रेब हैं,
गड्ढों में छिपे मौत के सैलाब हैं,
हर मोड़ पर एक कब्र खुदी पड़ी है,
और सरकार की सड़क सुरक्षा योजना फाइलों में कैद धूल-धक्कड़ से अटी पड़ी है।

एक युवा की अब सुनो कहानी,
जिसकी आंखों में सपनों का पानी,
डिग्री लेकर निकला था घर से,
सोचा था बदलेगा अपना कल इस शहर से।

पहले साल दिया इंटरव्यू, फिर वेटिंग लिस्ट,
फिर एक फॉर्म, फिर एक और टेस्ट,
हर बार कहा गया – “थोड़ा और इंतज़ार”,
इंतज़ार करते-करते बीत गए बरसों के हज़ार।

कंपनी के गेट पर लगी है भीड़,
अंदर मशीनें हैं, बाहर उम्मीद,
ठेके पर मजदूर, ठेके पर जान,
स्थायी नौकरी अब सिर्फ एक अफ़साना, एक निशान।

बालको के बच्चे बालको में मांगे नौकरी,
पर बाहर से आती है हर बड़ी चौकरी,
स्थानीय युवा दर-दर भटकता है,
और कंपनी का मुनाफा दिल्ली-मुंबई से लंदन तक पहुंचता है।

नशे की गिरफ्त में डूबते सपने,
बेरोज़गारी ने बदल दिए हैं अपने,
जो कभी क्रिकेटर, इंजीनियर बनना चाहता था,
आज वो सड़क किनारे बेबस खड़ा रहता है।
और सिस्टम? वो सिस्टम नहीं रहा अब,
वो एक गुलाम है, जंजीरों में जकड़ा,
जिसकी जुबान वेदांता की भाषा बोलती है,
जिसकी कलम पूंजी के इशारे पर डोलती है।

और सिस्टम? वो सिस्टम नहीं रहा अब,
वो एक गुलाम है, जंजीरों में जकड़ा,
जिसकी जुबान वेदांता की भाषा बोलती है,
जिसकी कलम पूंजी के इशारे पर डोलती है।

कलेक्टर की मेज पर कंपनी की फाइल पहले,
मजदूर की अर्ज़ी बरसों तक धूल में मैले,
थाने में रिपोर्ट लिखी नहीं जाती उसकी,
जो अफसर बन बैठा है कंपनी का पिट्ठू, बंदी।

विधायक वोट मांगे “रोज़गार” के नाम पर,
जीत के बाद बैठे कंपनी के इनाम पर,
मंत्री के रिश्तेदार करें नौकरी शहर में,
और यहां का बेटा तरसे एक पहर में।

ये गुलामी जंजीर की नहीं, ये गुलामी दिमाग की है,
हर फाइल, हर फैसला अब सिर्फ मुनाफ़े के हिसाब की है।
जनता चुनती है सरकार, सरकार चुनती है कंपनी,
और बीच में पिसती रहती है मजदूर की जवानी, और बनती है युवाओं के बेरोजगारी की ज़हरीली कहानी।

पर जो सच बोलेगा,
जो आईना दिखाएगा,
जो पूछेगा – “मेरी नौकरी कहां है?”
उसके लिए यहां एक खास इंतज़ाम है –
कभी मुकदमा, कभी धमकी, कभी तबादला, निलंबन से बर्खास्तगी तक
नौकरी के नाम पर सिर्फ़ सुनसान गली में उसके लिए काम है।

फिर भी लोग तो बोलेंगे, फिर भी लोग तो लिखेंगे,
हर दुकान बनी कंपनी से हिसाब मांगेंगे,
ये धरती किसी की जागीर नहीं।
ये मजदूरी, ये बेरोज़गारी, अब जनता की तक़दीर सही।

अब तो उठो युवाओं, ये गुलामी तोड़नी है,
हर ज़ुल्म का हिसाब आज फिर से मांगना है।
सोच से सच तक, यही हमारा रास्ता है,
हर बेरोज़गार जवानी को न्याय और संघर्ष का वास्ता है।
सोच से सच तक…

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