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बालको वेदांता में बिगड़ते प्रशासनिक हालात: कर्मचारियों में बढ़ा असंतोष

कोरबा (पब्लिक फोरम)।भारत एल्यूमिनियम कंपनी,  वेदांता  में पिछले कुछ समय से प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर कर्मचारियों के बीच काफी असंतोष और चर्चा का माहौल बना हुआ है। यहां राज्य शासन के कार्यालयों से भी बदतर हो रही कार्यप्रणाली इशारा करती है कि मालिकों की पकड़ या तो कम हो रही है या कम्पनी के अधिकारियों द्वारा उन्हें अंधेरे में रखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, विभिन्न विभागों में  खास तौर पर आईआर , जनसंपर्क, एक्सटरनल अफेयर्स और हस्पताल प्रबंधन जैसे गैरतकनीकी  विभागों में अनुभवी अधिकारियों की अपेक्षा अनुभवहीन जूनियर अधिकारियों को पदोन्नति देकर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ सौंपने की प्रवृत्ति बढ़ी है। खास तौर पर एक्सटर्नल अफेयर्स में जाने क्यों जूनियर अधिकारियों को जिनकी शैक्षणिक योग्यता मात्र बी एस सी, बी कॉम, एम कॉम है वे खुद अपनी नियुक्ति को लेकर होड़ लगाए रहते हैं। यहां योग्यता  उत्कृष्टता और कार्यदक्षता के स्थान पर चापलूसी और दोस्ती निभाने जैसे हथकंडों को ज्यादा तवज्जो दी जा रही है । कर्मचारियों का कहना है कि  ऐसा महसूस होने लगा है कि कंपनी का पूरा प्रबंधन मालिक और उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों के बजाए मंत्री विधायकों और शासन के प्रभावशाली अधिकारियों के दबाव में है।

कई स्थानांतरण और विभागीय नियुक्तियां इन्हीं के दबाव में की गई है।स्थानीय पार्षदों और जनप्रतिनिधियों के अहम मुद्दे दरकिनार किए जा रहे जबकि पूर्व में इनके मुद्दों को प्राथमिकता से लिया जाता था। कई अनुभवी लोगो को हाशिए पे डाल कर मात्र तीन चार साल का अनुभव रखने वाले कर्मचारी को लीड रोल पर नियुक्त कर दिया गया है, और ऐसी परिस्थितियों में उन्हें जिम्मेदारी दी गई है ताकि किसी भी ऊपरी अधिकारी के हटने पर वे आननफानन में उस जगह पर काबिज हो सकें। कंपनी का मानव संसाधन विभाग और आईआर के हालात भी दयनीय है  ये इंटक के एक वरिष्ठ पदाधिकारी जिन्हें स्वयं की यूनियन के कुछ युवा सदस्यों ने न्यायालीन प्रक्रिया में घेर रखा है के दबाव में काम कर रहा है इस पदाधिकारी को पूर्व के अधिकारियों ने काफी समय तक हाशिए पर रखा था और ये आए दिन बालकों के चक्कर लगाते रहता था पर आज ये स्थिति है कि कंपनी के संबंधित विभाग के अधिकारी इसके आगे पीछे मंडराते रहते हैं।

यह जांच का विषय है कि इंटक के इस राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारी के पास कंपनी द्वारा मोटी रकम तो नहीं भेजी जाती है। इंटक के इसी पदाधिकारी द्वारा यूनियन के महासचिव को महज कठपुतली के तौर पर रख छोड़ा है जिनको स्वयं के निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं। वे मात्र दिए गए आदेशों का ही पालन करने की हैसियत रखते हैं जिसके एवज में इन्हें भी उपकृत किया जाता है जिसकी जांच भी आवश्यक है। कंपनी के एचआर पर यह भी आरोप है कि इंटक के अंदरूनी मामलों में जब कोई उनका कर्मचारी सदस्य यूनियन के  वरिष्ठ पदाधिकारी कार्यों पर असंतोष व्यक्त करता है, आवाज उठाता है या शासन-प्रशासन के समक्ष शिकायत करता है, तब बाल्को के एचआर विभाग द्वारा पदाधिकारी के दबाव बनाने पर संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध  गैरकानूनी स्थानांतरण, निलंबन अथवा अन्य प्रशासनिक कार्रवाई कर दी जाती है इस तरह के कई मामले हैं जिन पर न्याय पाने के लिये श्रमिक संघ के कई युवा सदस्य श्रम विभाग और न्यायालय का चक्कर लगा रहे हैं

श्रम विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी कंपनी का मानव संसाधन विभाग अपने संगठन के प्रशासन एवं औद्योगिक संबंधों के प्रति उत्तरदायी होता है। किसी श्रमिक संगठन के आंतरिक मामलों, सदस्यता संबंधी विवादों या पदाधिकारियों से जुड़े मतभेदों में हस्तक्षेप करना उसके अधिकार क्षेत्र का विषय नहीं माना जाता। ऐसे मामलों में कंपनी प्रबंधन से निष्पक्ष एवं तटस्थ भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है।

एक मामले में  तो एचआर ने श्रमिक संघ के एक प्रमुख नेता का  गेट पास महज इसलिए सस्पेंड कर दिया था कि  उसने अमित जोगी के एक कार्यक्रम में हिस्सेदारी की थी फिर मुंह की खाने के बाद उसे वापस लिया गया। इस विषय पर और भी कई तथ्य और रिपोर्ट जनता के बीच साझा की जाएगी। बताया जाता है कुछ दिन पहले देश के बेहद प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार में अपनी सेवा दे चुकी महिला अधिकारी जो  बालकों जनसंपर्क विभाग को बेहतरीन तरीके से सम्भाल रही थी कि नाराज़गी के बाद कंपनी छोड़ देने पर उनके स्थान पर एक युवा महिला अधिकारी की नियुक्ति की गई। और इसी दरमियान जनसंपर्क विभाग में कई वर्षों से काम देख रहे एक  अनुभवी अधिकारी को प्लांट में स्थानांतरित कर दिया गया था।

जिन महिला अधिकारी को यहां लाया गया उन्हें ऐसे अनुभवहीन लोगों के बीच काम करने के लिए रख छोड़ा गया जिन्हें ना तो ज्यादा अनुभव था ना ही वो कोई बेहतर फीड बैक देने में सक्षम थे और ना ही उनके द्वारा कोई सहयोग ही किया गया, बल्कि निजी स्वार्थों के चलते उनकी छवि बिगाड़ने का भरपूर प्रयास किया गया। नतीजा यह रहा कि जनसंपर्क में नियुक्त की गई महिला अधिकारी को सही सहयोग और जानकारी ना मिलने पर कुछ दिन टाउनशिप ला कर अंततः बाहर भेज दिया गया। जनसंपर्क विभाग की लचर व्यवस्था का यह हाल है कि वह अपने कंपनी की उपलब्धियों को भी सही तरीके से प्रचारित प्रसारित नहीं  करवा पाता मात्र अपने कुछ करीबियों को जानकारी दे कर अपने जिम्मेदारी की इतिश्री कर लेता है ऐसा नहीं है कि इस विभाग को नियंत्रित करने वाले प्रशासनिक अधिकारी के पास यह जानकारी नहीं है पर वह भी बेपरवाह भूमिका में हैं।

पिछले सीईओ राजेश कुमार के कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक सुरक्षा एवं एक्सटर्नल अफेयर्स के एक अधिकारी के बीच मतभेदों की जमकर चर्चा रही, और बातें कार्पोरेट ऑफिस तक गई, जिसके बाद उक्त अधिकारी के द्वारा कंपनी छोड़ने की नोटिस भी दी गई। नवीन अग्रवाल के दौरे के दौरान बजाये उनके रिजाइन पे विचार करने उक्त अधिकारी की जिम्मेदारियों में इजाफा कर दिया गया, लेकिन मतभेद तब भी जारी रहे और अंततः परिणाम ये हुआ कि उक्त अधिकारी को नौकरी छोड़नी पड़ी और सीईओ को तरक्की मिली वे एल्यूमिनियम क्षेत्र के सीईओ बना दिए गए। यहाँ यह बताना मुश्किल है कि इस पूरे प्रकरण में कौन सही था कौन गलत पर ये पता चला है कि जाते वक़्त अधिकारी ने एडमिन और एक्सटरनल अफेयर्स के हालात पे गिरावट आने के लिए चेताया था जो अब दिखाई दे रहा है आज सबसे ज्यादा यही विभाग कंपनी की साख पर पलीता लगाने युद्ध स्तर पर लगा हुआ है।

एक्सटर्नल अफेयर्स और प्रशासनिक कार्यों को संभालने के लिए कंपनी ने भूतपूर्व सैनिक कैप्टन धनंजय मिश्रा की नियुक्ति की चर्चाओं में इन्हें तत्कालीन सीईओ राजेश कुमार की पसंद बताया गया चर्चा रही कि इनकी नियुक्ति उन्होंने यह सोच कर कराई गई कि मिश्रा जी कंपनी के काम बगैर किसी विरोधों के बेहतरीन और सुचारू रूप से कराएंगे लेकिन इनके आते ही बालकों की स्थितियां बिगड़ने लगी ,और कई दिनों से शांत रहे विरोध के स्वर फिर उठने लगे।निर्माण कार्य से लेकर अतिक्रमण हटाने, जी 9 , बाउंड्रीवाल, फेंसिंग जैसे कामों में भी लोगों की नाराजगी दिखने लगी। इन अधिकारी द्वारा कंपनी के मकान खाली करने ऐसे ऐसे हथकंडे अपनाये गए जो कभी बालको क्या  पूरे जिले में देखने को नहीं मिले। रह रहे लोगों को संवैधानिक अधिकारों के बावजूद मूलभूत सुविधाओं से वंचित किया गया। जिसमे पानी , बिजली बंद करना, टॉयलेट जाम करना यहां तक कि बुजुर्ग महिलाओं तक को प्रताड़ित किया जाने लगा। इनकी सबसे बड़ी नाकामी शांति नगर के मुद्दे पर रही जहां विस्थापन का काम कई वर्षों से लंबित है। जिसका आज तक हल नहीं निकला है आज नही तो कल ये मुद्दा बहुत बड़ा रूप ले सकता है।

इनकी नियुक्ति से लेकर आज तक इनके द्वारा कोई भी ऐसे काम नहीं किए गए जो कंपनी के लिए लाभदायक हो और लोगों में तारीफ पा सके। पिछले सीईओ के कार्यकाल के दौरान जो कार्य कराए जा रहे थे उन्हीं पर श्रेय लेने का काम चल रहा है। हां ये जरूर है कि इनकी कार्यप्रणाली और अड़ियल रवैए को लेकर कर्मचारियों, अधिकारियों के साथ साथ स्थानीय व्यवसायियों और आम लोगों में भी नाराजगी है।  इनके द्वारा शासन प्रशासन सत्ता, विपक्ष के जनप्रतिनिधियों और जनता की बीच संतुलित व्यवहार बनाने अपने अधीनस्थों की सलाह को दरकिनार कर अधिनस्थों को स्थानांतरित कर दिया गया जो आज स्वयं को भारी पड़ रहा है।  टाउनशिप में वर्षों से स्थापित ठेले, खोमचे वालों पर अतिक्रमण हटाने का जोर चल रहा है जबकि नगर के भीतर कई जगह ऐसे अतिक्रमण हैं जो स्थायी रूप से कर लिए गए हैं।

जिन पर कार्रवाई करने इनके हाथ कांपते हैं  जानकारी मिली है कि इन अतिक्रमणों की एक लिस्ट सीधे अनिल अग्रवाल , प्रिया अग्रवाल सहित कम्पनी की सीईओ देशनी नायडू तक भेजने की तैयारी चल रही है।  आजकल एक्सटर्नल अफेयर्स का विरोधियों को नियंत्रित करने का एक नया तरीका काफी चर्चा में है विभाग विरोध करने वाले लोगों के सयंत्र में।कार्यरत परिजनों रिश्तेदारों की खोज करते हैं और फिर उनका गेट पास ब्लॉक करना काम में प्रताड़ित करने और संयंत्र पर काम मिलने पर क्लियरेंस ना देने जैसे हथकंडे अपनाए जाते हैं।

अपनी कार्यशैली को लेकर चर्चित हो रहे उक्त अधिकारी कंपनी में अपनी नाकामी के बाद अब कही अन्यत्र जाने की चाह रखते हैं ऐसी भी चर्चाएं है।

माना ये जाता है कि वर्तमान सीईओ राजेश कुमार सिंह जो काफी लंबे समय से बालकों में रह कर सेवाएं दे रहे हैं, वे प्लांट एंड मशीनरीज के विशेषज्ञ हैं,  और प्लांट पर काबिले तारीफ पकड़ भी रखते हैं, लेकिन उन्हें तकनीकी विशेषज्ञ होने के कारण नगर में हो रही बाहरी गतिविधियों और असंतोष की ज्यादा जानकारी नहीं है। वे अपने अधीनस्थों द्वारा दी जा रही जानकारी पर ही निर्भर हैं

देखना ये है कि सीईओ मिल रही जानकारियों पर ही काम करते हैं या फिर उन्हें बाहर पनप रहे विरोध की तब खबर होगी जब उसकी शक्ल आंदोलन या प्रदर्शन का रूप ले ले। हाल ही में बालको के कांट्रेक्टर एसोसिएशन का पूर्व मंत्री से मिलना भी असंतोष की गंभीरत को दर्शाता है। यहां ये बताना भी लाजिमी है कि समय रहते शांति नगर वासियों की समस्या का हल नहीं निकाला गया तो यहां पनप रहा आक्रोश देर सबेर प्रबंधन के लिए सरदर्द का सबब बन सकता है वहीं हाल ही में  किए गए  कई गैरकानूनी निर्माण,अतिक्रमण और पर्यावरण विरोधी मुद्दे  संसद और विधानसभा में भी गूंज सकते हैं।

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