नई दिल्ली (पब्लिक फोरम)। आदिवासी इतिहास और भारतीय संविधान के अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता डॉ. जितेंद्र मीणा ने अपनी नई पुस्तक ‘संविधान सभा में आदिवासी’ के प्रकाशन की घोषणा की है। वर्षों के शोध, संविधान सभा की बहसों, सरकारी दस्तावेज़ों, रिपोर्टों, पुस्तकों और शोध सामग्री के विस्तृत अध्ययन पर आधारित यह पुस्तक संविधान निर्माण की प्रक्रिया में आदिवासी प्रतिनिधियों की भूमिका को सामने लाने का प्रयास करती है। पुस्तक अगले दो-तीन दिनों में ऑनलाइन मंच अमेज़न पर उपलब्ध होने की संभावना है।
वर्षों के शोध के बाद तैयार हुई पुस्तक
डॉ. मीणा ने बताया कि यह पुस्तक लंबे समय तक किए गए अध्ययन और शोध का परिणाम है। उनके अनुसार, संविधान सभा से जुड़े अनेक दस्तावेज़ों, बहसों, रिपोर्टों और ऐतिहासिक स्रोतों का अध्ययन करने के बाद यह पुस्तक तैयार की गई है। उनका कहना है कि इसका उद्देश्य आदिवासी इतिहास के उन पक्षों को सामने लाना है, जिन्हें पर्याप्त महत्व नहीं मिला या जो व्यापक सार्वजनिक विमर्श से बाहर रहे।

संविधान सभा में आदिवासी प्रतिनिधियों की भूमिका पर केंद्रित
लेखक के अनुसार, पुस्तक यह स्थापित करने का प्रयास करती है कि संविधान सभा में आदिवासी प्रतिनिधि केवल औपचारिक उपस्थिति तक सीमित नहीं थे, बल्कि संविधान निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार थे। पुस्तक में लोकतंत्र, स्वशासन, जल-जंगल-जमीन, सांस्कृतिक पहचान, भाषाई अधिकार, आरक्षण, अनुसूचित क्षेत्रों की व्यवस्था तथा संवैधानिक सुरक्षा जैसे विषयों पर आदिवासी प्रतिनिधियों द्वारा रखे गए विचारों और हस्तक्षेपों का विश्लेषण किया गया है।
डॉ. मीणा का कहना है कि संविधान सभा में आदिवासी समुदाय की आवाज़ और योगदान को मुख्यधारा के विमर्श में अपेक्षित स्थान नहीं मिल सका। उनके अनुसार, यह पुस्तक उस ऐतिहासिक रिक्तता को भरने का एक प्रयास है।
शोधार्थियों से लेकर आम पाठकों तक के लिए उपयोगी होने का दावा
लेखक ने उम्मीद जताई है कि यह पुस्तक केवल शोधार्थियों, विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए ही नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और आदिवासी इतिहास में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगी। उनका मानना है कि संविधान निर्माण की प्रक्रिया को समझने के लिए आदिवासी दृष्टिकोण का अध्ययन आवश्यक है।
प्रकाशक और सहयोगियों का जताया आभार
डॉ. मीणा ने पुस्तक के प्रकाशन के लिए अनबाउंड प्रकाशन के प्रकाशक अलिंद माहेश्वरी का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि उनके सहयोग के बिना इस पुस्तक का प्रकाशन संभव नहीं हो पाता। साथ ही संपादक आशीष मिश्र, मित्रों, परिवारजनों और संसद भवन पुस्तकालय के कर्मचारियों के योगदान का भी उल्लेख करते हुए उनका धन्यवाद किया।

पहली पुस्तक से मिली प्रेरणा
डॉ. मीणा ने बताया कि उनकी पहली पुस्तक ‘राष्ट्र निर्माण में आदिवासी’ को देशभर के पाठकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली थी। उनके अनुसार, उसी विश्वास और प्रोत्साहन ने उन्हें इस नए विषय पर विस्तृत शोध करने और दूसरी पुस्तक लिखने की प्रेरणा दी।
ऑनलाइन उपलब्ध होगी पुस्तक
लेखक के अनुसार, ‘संविधान सभा में आदिवासी’ अगले दो से तीन दिनों में अमेज़न पर उपलब्ध होने लगेगी, जिससे देशभर के पाठक इसे प्राप्त कर सकेंगे।
भारतीय संविधान के निर्माण में विभिन्न सामाजिक समूहों की भूमिका पर लगातार नए शोध सामने आ रहे हैं। ऐसे समय में ‘संविधान सभा में आदिवासी’ जैसी पुस्तक संविधान निर्माण में आदिवासी प्रतिनिधियों के योगदान पर नए विमर्श को आगे बढ़ाने का प्रयास करती है। पुस्तक में प्रस्तुत शोध और ऐतिहासिक सामग्री इस विषय पर अध्ययन, चर्चा और आगे के अकादमिक अनुसंधान के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकती है।





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