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कोरबा: पत्रकारों के हक पर गैर-पत्रकारों का कब्जा? प्रेस कॉम्प्लेक्स की जांच की मांग, केदारनाथ अग्रवाल ने उठाया बड़ा मुद्दा

कोरबा (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ के कोरबा में नियमों को ताक पर रखकर प्रेस कॉम्प्लेक्स की रियायती दुकानों में चल रहे अवैध व्यावसायिक धंधों के खिलाफ कोयला मजदूर सभा के कार्यकारी केंद्रीय अध्यक्ष केदारनाथ अग्रवाल ने मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने हाल ही में जिला कलेक्टर कुणाल दुदावत को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपकर इस पूरी गड़बड़ी की निष्पक्ष जांच कराने और आवंटन की शर्तों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की पुरजोर मांग की है।

कोरबा के ट्रांसपोर्ट नगर स्थित इस चर्चित प्रेस कॉम्प्लेक्स का निर्माण तत्कालीन विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (Special Area Development Authority – SADA/साडा) द्वारा किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य जिले में पत्रकारिता, जनसंचार और मीडिया संस्थानों को प्रोत्साहित करना तथा उन्हें एक छत के नीचे लाना था।
इसी जनहितैषी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, प्रशासन ने यहां की दुकानों को सामान्य व्यावसायिक परिसरों की तुलना में बेहद रियायती दरों पर आवंटित किया था। मकसद साफ था कि आर्थिक रूप से सीमित संसाधनों वाले समाचार पत्रों और पत्रकारों को कार्यालय संचालन के लिए उपयुक्त और किफायती स्थान मिल सके।

मूल शर्तों की अनदेखी और शासकीय संपत्ति का दुरुपयोग
लेकिन आज इस परिसर की जमीनी हकीकत इसके मूल सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत नजर आती है। केदारनाथ अग्रवाल द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में यह गंभीर दावा किया गया है कि वर्तमान में प्रेस कॉम्प्लेक्स की कई आवंटित दुकानों में कोई भी समाचार पत्र, समाचार माध्यम अथवा मीडिया कार्यालय संचालित नहीं हो रहा है।
इसके विपरीत, इन स्थानों का उपयोग अन्य विशुद्ध रूप से व्यावसायिक गतिविधियों (Commercial activities) के लिए किया जा रहा है। यह स्थिति न केवल साडा के आवंटन नियमों का खुला उल्लंघन है, बल्कि रियायती दर पर मिली शासकीय संपत्ति का निजी लाभ के लिए किया जा रहा अनुचित उपयोग भी है।
मामले की गंभीरता और कॉर्पोरेट जवाबदेही को रेखांकित करते हुए कोयला मजदूर सभा के कार्यकारी केंद्रीय अध्यक्ष केदारनाथ अग्रवाल ने कहा:
“प्रेस कॉम्प्लेक्स की स्थापना के पीछे एक पवित्र सामाजिक उद्देश्य था। रियायती दरों पर सरकारी जमीन और दुकानें इसलिए दी गई थीं ताकि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बिना किसी आर्थिक दबाव के मजबूत हो सके। लेकिन आज वहां रसूखदारों द्वारा नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। हम प्रशासन से मांग करते हैं कि इसकी पारदर्शी जांच हो ताकि वास्तविक और जरूरतमंद मीडिया संस्थानों को उनका खोया हुआ हक वापस मिल सके।”

आम जनता और श्रमजीवियों पर प्रभाव
जब सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का इस तरह विचलन (Diversion) होता है, तो इसका सबसे सीधा और गहरा असर समाज के उस तबके पर पड़ता है जो वास्तव में इसके हकदार हैं। संसाधन विहीन और जमीनी स्तर पर काम करने वाले स्थानीय श्रमजीवी पत्रकारों को आज भी दफ्तर चलाने के लिए भारी-भरकम किराये चुकाने पड़ रहे हैं, जबकि उनके नाम पर बनाई गई जगह पर अन्य व्यवसाय फल-फूल रहे हैं। यह पूरी तरह से प्रशासनिक पारदर्शिता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

प्रशासन से की गई मुख्य मांगें:
सौंपे गए ज्ञापन के माध्यम से मजदूर सभा ने कलेक्टर से निम्नलिखित बिंदुओं पर त्वरित और प्रभावी कार्रवाई का आग्रह किया है:
🔹निष्पक्ष भौतिक सत्यापन (Physical Verification): प्रेस कॉम्प्लेक्स की सभी आवंटित दुकानों की मौके पर जाकर निष्पक्ष जांच की जाए और यह सत्यापित किया जाए कि वहां वास्तव में कौन सी गतिविधियां चल रही हैं।
🔹 आवंटन निरस्तीकरण: जिन आवंटियों ने शर्तों का उल्लंघन किया है और नियमों के विपरीत जाकर दुकानें अन्य व्यवसायों को दे दी हैं, उनका आवंटन नियमानुसार तत्काल निरस्त किया जाए।
🔹 पारदर्शी पुनः आवंटन: खाली कराई गई दुकानों को पूरी पारदर्शिता के साथ वास्तविक समाचार पत्रों, डिजिटल मीडिया माध्यमों और स्थानीय पत्रकारों को प्राथमिकता के आधार पर दोबारा आवंटित किया जाए।

इस संवेदनशील मामले में जिला प्रशासन की त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई से न केवल सरकारी तंत्र में पारदर्शिता और कॉर्पोरेट जवाबदेही तय होगी, बल्कि उन स्थानीय श्रमजीवियों को भी न्याय मिलेगा जो लंबे समय से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब देखना होगा कि कोरबा का जिला प्रशासन इस जनहित से जुड़े मामले पर कितनी जल्दी और कितनी कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करता है।

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