बिलासपुर (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में जातिवादी भेदभाव, धार्मिक आडंबर और फिजूलखर्ची को दरकिनार कर एक अनोखे विवाह का आयोजन किया गया। यहाँ एक नवदंपत्ति ने पारंपरिक रीति-रिवाजों और सामाजिक दिखावे के बजाय भारत के संविधान को साक्षी मानकर वैवाहिक शपथ ली। ‘लोक समता शिक्षण समिति’ (LS3) द्वारा आयोजित यह विवाह नागरिक स्वतंत्रता, समानता और संवैधानिक मूल्यों को सामाजिक जीवन में उतारने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
सादगी और संवैधानिक आदर्शों की मिसाल
यह विवाह बिलासपुर के भारतीय नगर (वार्ड क्रमांक-21) स्थित नगर निगम कॉलोनी की गली नंबर 2 में स्थित ‘लोक समता शिक्षण समिति’ (LS3) के कार्यालय में संपन्न हुआ। सुश्री प्रिया महिलांगे और वंश कुमार टंडन ने इस संवैधानिक आदर्श विवाह के लिए संस्था में आवेदन किया था। 12 जून 2026 को आयोजित इस सादे समारोह में ‘गुरुघासीदास सेवादार संघ’ (GSS) के केंद्रीय संयोजक और LS3 के संरक्षक श्री लखन सुबोध ने भारतीय संविधान ग्रंथ को साक्षी मानकर दोनों को वैवाहिक प्रतिज्ञा दिलाई और संवैधानिक अधिकारों व कर्तव्यों की शपथ दिलाई।
लोक समता शिक्षण समिति (LS3) पिछले कुछ वर्षों से इस तरह के प्रगतिशील और मानवतावादी विवाह अभियानों का संचालन कर रही है। संस्था के अनुसार, उनके माध्यम से अब तक कई शादियां कराई जा चुकी हैं, जिनमें से अधिकांश अंतर्जातीय थीं। इसके अलावा कुछ अंतरधार्मिक और सजातीय विवाह भी इस संवैधानिक और आदर्श पद्धति से संपन्न हुए हैं। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य समाज में फैली सामंती सोच, जातिगत ऊंच-नीच और विवाह के नाम पर होने वाले भारी खर्च व दिखावे को रोकना है।

नागरिक स्वतंत्रता और समकालीन वैधानिक बहस
इस आयोजन के दौरान सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर एक गंभीर वैचारिक बहस भी सामने आई। संस्था के प्रतिनिधियों ने इस बात पर चिंता जताई कि आज भी समाज के एक हिस्से में सामंती सोच हावी है, जिसके कारण अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने वाले युवाओं की इच्छाओं का दमन किया जाता है। कई मामलों में यह दमन हत्या या आत्महत्या जैसी दुखद घटनाओं में बदल जाता है।
इस संदर्भ में, देश के कुछ हिस्सों में विवाह के लिए माता-पिता की कानूनी मंजूरी को अनिवार्य बनाने की चल रही चर्चाओं पर भी बात की गई। संस्था का मानना है कि ऐसे कानून नागरिकों की व्यक्तिगत आजादी और वयस्कों के संवैधानिक अधिकारों को सीमित कर सकते हैं। इसके विपरीत, सरकार का सर्वोपरि कर्तव्य यह होना चाहिए कि वह समाज में एक ऐसा आधुनिक और प्रगतिशील वातावरण तैयार करे, जहाँ युवाओं को शिक्षा, रोजगार, संस्कार और अभिव्यक्ति की बेहतर आजादी मिल सके।
सामाजिक सुरक्षा का भरोसा और एकजुटता
इस वैचारिक विवाह के गवाह के रूप में कानूनी और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े कई गणमान्य नागरिक मौजूद थे, जिनमें एडवोकेट महेश कुमार आर्य, वीरेंद्र भारद्वाज और एडवोकेट अंजना बंजारे शामिल हैं। साथ ही वर-वधु पक्ष की ओर से सुरेश गेंदले, नरेंद्र रात्रे, रामनारायण खूंटे, प्रमोद गेंदले, गीता प्रसाद टंडन, जुगा बाई, अमरौतिन गेंदले, गुलशन टंडन और सूरज टंडन ने उपस्थित रहकर इस पहल का समर्थन किया। समारोह के समापन पर श्री लखन सुबोध ने नवविवाहित जोड़े को सुरक्षा का भरोसा देते हुए कहा:
“यदि भविष्य में जातिगत ठेकेदारों या सामाजिक रूढ़िवादियों द्वारा इस दंपत्ति या उनके परिवार का किसी भी तरह से सामाजिक बहिष्कार या प्रताड़ना की जाती है, तो संस्था उनके साथ खड़ी रहेगी। हम संवैधानिक समता और स्वतंत्रता के सिद्धांत के तहत न्याय की इस लड़ाई को मजबूती से लड़ेंगे।”
बिलासपुर में संपन्न हुआ यह विवाह केवल दो परिवारों का मिलन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का एक जीवंत उदाहरण है। जब देश में विवाह जैसी संस्थाएं भारी कर्ज, दिखावे और जातिगत सीमाओं में जकड़ी हुई हैं, तब संविधान को साक्षी मानकर जीवन की नई शुरुआत करना एक साहसिक और अनुकरणीय कदम है। यह आयोजन हमें याद दिलाता है कि एक समतामूलक और आधुनिक समाज का निर्माण कानून की किताबों से निकलकर जब तक हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक निर्णयों का हिस्सा नहीं बनेगा, तब तक वास्तविक सामाजिक सुधार की कल्पना अधूरी है।





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