होमजन चौपाल4 जून: आक्रामकता की शिकार मासूम बच्चों का अंतरराष्ट्रीय दिवस

4 जून: आक्रामकता की शिकार मासूम बच्चों का अंतरराष्ट्रीय दिवस

हर साल 4 जून को दुनिया उन बच्चों को याद करती है जो किसी जंग में हिस्सेदार नहीं थे – फिर भी उसकी सबसे बड़ी कीमत उन्हीं ने चुकाई। संयुक्त राष्ट्र महासचिव की विशेषज्ञ ग्राका माशेल के शब्दों में – “लाखों बच्चे ऐसे संघर्षों में फँसे हैं जहाँ वे महज दर्शक नहीं, बल्कि निशाना हैं।” यह दिवस एक अनुस्मारक है कि बचपन की सुरक्षा कोई भावनात्मक माँग नहीं, एक वैश्विक जिम्मेदारी है।

स्थापना और उद्देश्य
यह दिवस संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 19 अगस्त 1982 को फिलिस्तीन प्रश्न पर बुलाए गए आपातकालीन विशेष सत्र में स्थापित किया था। उस समय फिलिस्तीनी और लेबनानी बच्चों की बड़ी संख्या में हो रही मौतें और घायल होने की घटनाओं ने महासभा को इस निर्णय तक पहुँचाया।

तब से हर वर्ष 4 जून को यह दिवस उन सभी बच्चों की पीड़ा को रेखांकित करने के लिए मनाया जाता है जो शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक हिंसा के शिकार होते हैं। यह दिन संयुक्त राष्ट्र की उस प्रतिबद्धता की भी पुनःपुष्टि करता है जो बाल अधिकारों पर अभिसमय (Convention on the Rights of the Child) – इतिहास की सर्वाधिक अनुमोदित मानवाधिकार संधि – पर आधारित है।

2024 के आँकड़े: अब तक का सबसे भयावह वर्ष
संयुक्त राष्ट्र महासचिव की वार्षिक रिपोर्ट ‘बच्चे और सशस्त्र संघर्ष’ के अनुसार, वर्ष 2024 में बच्चों के विरुद्ध हिंसा ने अभूतपूर्व स्तर छू लिया। संयुक्त राष्ट्र ने विश्वभर में 22,495 बच्चों को प्रभावित करने वाले 41,370 गंभीर उल्लंघनों को सत्यापित किया।
सर्वाधिक प्रभावित देशों में इजरायल और कब्जे वाला फिलिस्तीनी क्षेत्र (8,554), कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (4,043), सोमालिया (2,568), नाइजीरिया (2,436) और हैती (2,269) शामिल रहे।

किस तरह की हिंसा के शिकार हुए बच्चे

हत्या और अंग-भंग: यह सबसे व्यापक उल्लंघन रहा जिसने 11,967 बच्चों को प्रभावित किया। विस्फोटक हथियार, क्रॉसफायर और आबादी वाले इलाकों में हथियारों का इस्तेमाल इसके प्रमुख कारण रहे।
बच्चों की भर्ती और अपहरण: हजारों बच्चों को सशस्त्र बलों और गुटों ने लड़ाकू या सहयोगी भूमिकाओं के लिए इस्तेमाल किया।
यौन हिंसा: इसमें तीव्र वृद्धि दर्ज की गई। लड़कियाँ अनुपातहीन रूप से प्रभावित रहीं, हालाँकि लड़के भी पीड़ित हुए। कलंक और भय के कारण अधिकांश मामले रिपोर्ट ही नहीं हो पाए।

मानवीय सहायता से वंचित करना: सहायता काफिलों पर हमले, आवाजाही पर प्रतिबंध और नौकरशाही की अड़चनों ने बच्चों को जरूरी सेवाओं से काट दिया।
कूल और अस्पतालों पर हमले: करीब 2,000 ऐसे हमले सत्यापित किए गए जिन्होंने बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को बाधित किया।

वैश्विक प्रतिबद्धता और आगे की राह
युनिसेफ ने इस स्थिति को एक “घातक नई सामान्यता” करार देते हुए इसे समाप्त करने का आह्वान किया है। बाल संरक्षण के लिए संघर्ष की जड़ों को समझना, जवाबदेही सुनिश्चित करना और बच्चों की देखभाल, उनके पुनर्वास तथा समाज में पुनः एकीकरण में निवेश करना अनिवार्य बताया गया है।
यह प्रयास सतत विकास लक्ष्य 16, विशेषतः लक्ष्य 16.2 के अनुरूप है जो बच्चों के विरुद्ध दुर्व्यवहार, शोषण, तस्करी और हर तरह की हिंसा को समाप्त करने का संकल्प लेता है। 2030 का एजेंडा एक ढाँचा तो देता है, लेकिन संघर्षग्रस्त क्षेत्रों के लाखों बच्चों की सुरक्षा के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और क्रियान्वयन की दरकार है।

4 जून का यह दिवस केवल एक तारीख नहीं है – यह हर उस बच्चे की याद है जिसकी तस्वीर में कोई खिलौना नहीं, कोई पाठशाला नहीं, केवल मलबा और चुप्पी है। जब तक दुनिया के किसी भी कोने में एक भी बच्चा युद्ध का निशाना बनता है, तब तक इस दिवस की प्रासंगिकता बनी रहेगी। सवाल यह नहीं कि आँकड़े कितने बड़े हैं – सवाल यह है कि हम उन्हें देखकर भी कब तक चुप रहेंगे।
(आलेख: अखिलेश एडगर)

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