आधुनिक बंधुआ मजदूरी का नया चेहरा: “शॉर्ट अटेंडेंस” की आड़ में 400 श्रमिकों की मजदूरी की संगठित डकैती
कोरबा/दीपका (पब्लिक फोरम)। आजादी के सात दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी देश की ऊर्जाधानी कोरबा (छत्तीसगढ़) में मजदूर शोषण ने एक नया और भयावह रूप धारण कर लिया है। SECL के दीपका क्षेत्र स्थित कोल हैंडलिंग प्लांट (CHP) में ठेका आधार पर कार्यरत आउटसोर्सिंग कंपनी “हेम्स कॉरपोरेशन” पर लगभग 400 श्रमिकों के साथ व्यवस्थित आर्थिक छल का गंभीर और दस्तावेजी आरोप सामने आया है।
मामले की गहराई यह है कि यह कोई साधारण वेतन विवाद नहीं, बल्कि निजी कंपनी, भ्रष्ट अधिकारियों और स्थानीय दलालों की मिलीभगत से बुना गया एक “संगठित वित्तीय षड्यंत्र” है – जिसमें “शॉर्ट अटेंडेंस” नामक डिजिटल हथियार का इस्तेमाल करोड़ों रुपये की मजदूरी हड़पने के लिए किया जा रहा है।
शॉर्ट अटेंडेंस: डिजिटल युग की नई डकैती
पीड़ित श्रमिकों की लिखित शिकायत के अनुसार, कोल हैंडलिंग प्लांट में तैनात करीब 400 मजदूर प्रतिमाह 26 से 30 दिन अपनी जान जोखिम में डालकर काम करते हैं। लेकिन जब वेतन आता है, तो कागजों पर उनकी उपस्थिति महज 10 से 12 दिनों की दर्ज होती है – और इसी के आधार पर उनकी तनख्वाह काट ली जाती है। यानी महीने के आधे से अधिक दिनों का श्रम सीधे कंपनी के खजाने में समा जाता है।
इस वित्तीय अपराध को छिपाने की नीयत से कंपनी श्रमिकों को उनकी “वेतन पर्ची (Pay Slip)” तक देने से इनकार कर रही है – जो कि भारतीय श्रम कानूनों का खुला उल्लंघन है। शिकायत में श्रमिकों ने इसे विशेष रूप से रेखांकित करते हुए तत्काल पारदर्शिता की मांग की है।

SECL के अधिकारी भी कठघरे में
इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि SECL का “कार्मिक (Personnel) एवं ई एंड एम (E&M) विभाग” वर्षों से इस खेल का मूक दर्शक बना हुआ है। अनुसंधान यह संकेत देता है कि संबंधित विभागों ने जानबूझकर यह मान लिया कि कोल हैंडलिंग जैसे 24×7 चलने वाले प्लांट में मजदूर महीने में केवल 12 से 15 दिन ही काम करते हैं – जो न केवल हास्यास्पद है, बल्कि संगठित मिलीभगत का साफ संकेत भी है।
पीड़ित श्रमिकों ने साहस जुटाकर SECL के महाप्रबंधक (GM) सहित तमाम सक्षम अधिकारियों को लिखित शिकायत सौंपी है और न्याय की मांग की है।
मलगांव घोटाले से भी बड़े महाघोटाले की आशंका
पर्यावरण एवं SECL मामलों के जानकार शेत मसीह ने इस घोटाले को और व्यापक संदर्भ में रखते हुए एक गंभीर चेतावनी दी है। उनका कहना है कि दीपका क्षेत्र में मलगांव मुआवजा घोटाले की जांच CBI पहले से ही कर रही है। लेकिन कोल हैंडलिंग प्लांट में 400 मजदूरों के वेतन की यह संगठित लूट, वित्तीय आकार की दृष्टि से मलगांव घोटाले को भी पीछे छोड़ सकती है।
शेत मसीह के अनुसार, यह किसी एक व्यक्ति या कंपनी का अपराध नहीं – यह “निजी कंपनी, भ्रष्ट अधिकारियों और स्थानीय छुटभैया नेताओं की त्रिकोणीय जुगलबंदी” है, जो सुनियोजित तरीके से सार्वजनिक क्षेत्र के कोयला संस्थान को अपना अड्डा बनाए हुए है।
कोयला संपदा की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल
इस शिकायत ने एक और बड़ा और राष्ट्रीय महत्व का प्रश्न उठाया है – जो कंपनियाँ अपने श्रमिकों की गाढ़े पसीने की कमाई चुराने से बाज नहीं आतीं, उनके हाथों में देश की बेशकीमती कोयला संपदा और उसके परिवहन की संवेदनशील जिम्मेदारी कितनी सुरक्षित है? विशेषज्ञों का मानना है कि जब मानवीय ईमानदारी ही दांव पर हो, तो रात के अंधेरे में कोयले की अवैध खपत और परिवहन की आशंका को भी नकारा नहीं जा सकता।
अब गेंद प्रशासन के पाले में
ऊर्जाधानी भू-विस्थापित किसान कल्याण समिति, किसान सभा और छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना जैसे संगठनों के लंबे संघर्ष के बावजूद निजी कंपनियाँ शोषण के नए-नए रास्ते निकालती जा रही हैं। अब जबकि श्रमिकों ने विधिवत लिखित शिकायत दर्ज करा दी है, समस्त जिम्मेदारी कोरबा जिला प्रशासन, कलेक्टर और श्रम विभाग के कंधों पर आ गई है।
अब यह देखना शेष है कि प्रशासन समय रहते इस मामले में संज्ञान लेकर दोषी कंपनी और अधिकारियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई करता है – अथवा असहाय श्रमिकों को एक बार फिर “केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) का दरवाजा खटखटाने पर विवश होना पड़ेगा।





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