लोकतंत्र की आत्मा मानी जाने वाली प्रेस स्वतंत्रता आज विश्वभर में अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रही है। इसी गंभीर वैश्विक परिदृश्य के बीच 4-5 मई, 2026 को ज़ाम्बिया की राजधानी लुसाका में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस (डब्ल्यूपीएफडी) वैश्विक सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। “शांतिपूर्ण भविष्य का निर्माण: मानवाधिकार, विकास और सुरक्षा के लिए प्रेस की स्वतंत्रता को बढ़ावा देना” विषय पर केंद्रित यह सम्मेलन स्वतंत्र पत्रकारिता के समक्ष खड़ी चुनौतियों और संभावनाओं पर वैश्विक विमर्श का महत्वपूर्ण मंच बनेगा।
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस प्रतिवर्ष 3 मई को मनाया जाता है। इसकी घोषणा दिसंबर 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने यूनेस्को की सिफारिश पर की थी। यह दिवस 1991 की ऐतिहासिक विंडहोक घोषणा की वर्षगांठ का स्मरण कराता है, जिसने अफ्रीका सहित पूरी दुनिया में स्वतंत्र और बहुलतावादी प्रेस की आवश्यकता को वैश्विक मान्यता दिलाई थी।
यह दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि सरकारों को प्रेस स्वतंत्रता के प्रति अपनी संवैधानिक और नैतिक प्रतिबद्धताओं की याद दिलाने वाला वैश्विक अवसर है। साथ ही यह मीडिया जगत को पेशेवर नैतिकता, जवाबदेही और पत्रकारों की सुरक्षा जैसे मूलभूत प्रश्नों पर आत्ममंथन का अवसर भी प्रदान करता है।
वैश्विक संकट के दौर में प्रेस स्वतंत्रता
यूनेस्को की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया विकास पर विश्व रुझान रिपोर्ट (2022-2025) दुनिया के सामने चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012 से अब तक वैश्विक स्तर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
इसके पीछे कई गंभीर कारण हैं- दुनिया भर में जारी 61 सक्रिय सशस्त्र संघर्ष, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सूचना हेरफेर, मीडिया प्रतिबंधों में 48 प्रतिशत वृद्धि, पत्रकारों के खिलाफ लगातार हिंसा तथा 85 प्रतिशत पत्रकार हत्याओं में दण्डमुक्ति की स्थिति। डिजिटल प्लेटफॉर्मों के बढ़ते प्रभुत्व ने भी स्वतंत्र मीडिया की आर्थिक स्थिरता को कमजोर किया है। वैश्विक विज्ञापन राजस्व का 54 प्रतिशत से अधिक हिस्सा डिजिटल मंचों के पास केंद्रित होने से पारंपरिक मीडिया संस्थान संकट में हैं।
रिपोर्ट बताती है कि बढ़ते राजनीतिक और आर्थिक दबावों के कारण स्व-सेंसरशिप में 63 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह स्थिति लोकतांत्रिक संवाद, सामाजिक विश्वास और जवाबदेही की संरचना को कमजोर कर रही है।
लुसाका सम्मेलन: निदान से समाधान की ओर
जाम्बिया के लुसाका में आयोजित होने वाला 2026 का वैश्विक सम्मेलन केवल समस्याओं की पहचान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सूचना पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए ठोस और व्यावहारिक समाधान विकसित करने पर केंद्रित होगा।

इस सम्मेलन में पत्रकारों, डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं, तकनीकी विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं, नागरिक समाज प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों, युवाओं और कंटेंट क्रिएटर्स की भागीदारी होगी। उद्देश्य है- पत्रकारिता, तकनीक, मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच उभरते जटिल संबंधों पर बहु-क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना।
मुख्य चुनौतियां जो सम्मेलन के केंद्र में होंगी
सम्मेलन में जिन गंभीर मुद्दों पर चर्चा होगी, उनमें प्रमुख हैं-
🔸कृत्रिम बुद्धिमत्ता और दुर्भावनापूर्ण तत्वों द्वारा बढ़ता सूचना हेरफेर और दुष्प्रचार
🔸स्वतंत्र मीडिया की बढ़ती आर्थिक अस्थिरता
🔸ऑनलाइन उत्पीड़न, न्यायिक दबाव, प्रतिशोध और आर्थिक नियंत्रण के कारण बढ़ती स्व-सेंसरशिप
तीन प्रमुख विमर्श स्तंभ
सम्मेलन की चर्चाएं तीन मुख्य स्तंभों पर आधारित होंगी।
🔹पहला, प्रेस स्वतंत्रता, शांति और आर्थिक विकास के बीच संबंध। इसमें संघर्षग्रस्त और पुनर्निर्माणशील समाजों में पत्रकारिता की भूमिका तथा विशेष रूप से महिला पत्रकारों की सुरक्षा पर जोर रहेगा।
🔹दूसरा, डिजिटल परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सूचना अखंडता। इसमें यह विश्लेषण किया जाएगा कि एल्गोरिद्म, प्लेटफॉर्म और एआई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जनविश्वास को किस प्रकार प्रभावित कर रहे हैं।
🔹तीसरा, मीडिया की व्यवहार्यता, बहुलवाद और समावेशन। इसका लक्ष्य स्थानीय और सार्वजनिक हित आधारित मीडिया संस्थानों के लिए टिकाऊ आर्थिक मॉडल विकसित करना है।
“लुसाका कॉल टू एक्शन” से वैश्विक दिशा तय होगी
सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम “पत्रकारिता के भविष्य पर लुसाका कॉल टू एक्शन” के रूप में सामने आने की उम्मीद है। यह दस्तावेज़ उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए नीति, व्यवहार और वैश्विक सहयोग के व्यावहारिक दिशा-निर्देश प्रस्तुत करेगा।
इसके साथ ही सम्मेलन में प्रतिष्ठित यूनेस्को/गुइलेर्मो कानो विश्व प्रेस स्वतंत्रता पुरस्कार भी प्रदान किया जाएगा। यह सम्मान उन व्यक्तियों या संस्थाओं को दिया जाता है जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी प्रेस स्वतंत्रता की रक्षा के लिए असाधारण योगदान दिया हो।
भारत की स्थिति बेहद चिंताजनक
विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है, जो इसे “अत्यंत गंभीर” श्रेणी में रखता है। यह स्थिति दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मीडिया स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के अनुसार, भारत में संवैधानिक सुरक्षा के बावजूद पत्रकारों के खिलाफ हिंसा, राजनीतिक दबाव, कॉरपोरेट केंद्रीकरण और मीडिया स्वामित्व का बढ़ता संकेंद्रण स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
और भी चिंताजनक तथ्य यह है कि भारत इस सूचकांक में अपने कई पड़ोसी देशों से पीछे है- पाकिस्तान 153वें, श्रीलंका 134वें और नेपाल 87वें स्थान पर हैं।
लोकतंत्र की सांस है स्वतंत्र पत्रकारिता
लुसाका सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब विश्वभर में सूचना पर नियंत्रण, दुष्प्रचार और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते दबाव ने स्वतंत्र पत्रकारिता के अस्तित्व को चुनौती दी है। यह सम्मेलन एक स्पष्ट संदेश देता है कि प्रेस स्वतंत्रता केवल पत्रकारों का मुद्दा नहीं, बल्कि मानवाधिकार, सामाजिक न्याय, शांति और लोकतांत्रिक भविष्य की आधारशिला है।
जब पत्रकारिता स्वतंत्र होती है, तभी समाज सच सुन पाता है, सत्ता जवाबदेह बनती है और लोकतंत्र जीवित रहता है। लुसाका से उठने वाली आवाज़ें दुनिया को यह याद दिलाने वाली हैं कि शांतिपूर्ण भविष्य का निर्माण सत्य और स्वतंत्र अभिव्यक्ति की नींव पर ही संभव है।
(आलेख: अखिलेश एडगर)





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