नई दिल्ली (पब्लिक फोरम)। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ग्रेट निकोबार द्वीप का व्यक्तिगत दौरा करने के बाद केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी विकास परियोजना पर कड़ा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि इस द्वीप पर जो कुछ हो रहा है, वह ‘विकास’ नहीं, बल्कि विकास की आड़ में छिपाया गया ‘विनाश’ है – एक ऐसा विनाश जो देश की अमूल्य प्राकृतिक विरासत और आदिवासी अस्मिता दोनों को एक साथ मिटा देगा।
जंगल जो स्मृतियों से भी पुराने हैं
राहुल गांधी ने द्वीप के घने वर्षावनों के बारे में कहा कि उन्होंने अपने जीवन में इतने अद्भुत और अछूते जंगल पहले कभी नहीं देखे। उन्होंने भावुक होते हुए कहा –
“यहां ऐसे पेड़ हैं जो हमारी स्मृतियों से भी पुराने हैं। इन जंगलों को यहां तक पहुंचने में कई पीढ़ियां लगी हैं।”
यह कोई महज राजनीतिक बयान नहीं था। यह उस इंसान की पीड़ा थी जिसने उन पेड़ों को देखा था जो सैकड़ों वर्षों से चुपचाप खड़े हैं – और जो अब कटाई की कगार पर हैं।

क्या है ग्रेट निकोबार परियोजना?
केंद्र सरकार ने ग्रेट निकोबार द्वीप पर एक विशाल बुनियादी ढांचा परियोजना प्रस्तावित की है, जिसमें एक अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह, हवाई अड्डा, टाउनशिप और पर्यटन केंद्र शामिल हैं। सरकार इसे सामरिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बताती है, विशेष रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की स्थिति मजबूत करने के लिए।
लेकिन इस चमकदार योजना की कीमत क्या है?
– “लाखों पेड़ों की कटाई” होगी
– “करीब 160 वर्ग किलोमीटर” का घना उष्णकटिबंधीय वर्षावन नष्ट हो जाएगा
– “स्थानीय आदिवासी समुदाय” और उनके साथ बसे हुए निवासी अपने घरों और अधिकारों से वंचित हो जाएंगे।

आदिवासियों के साथ अमानवीय अन्याय – राहुल का सीधा आरोप
राहुल गांधी ने कहा कि इस द्वीप पर सदियों से रह रहे आदिवासी समुदायों और बसे हुए लोगों के साथ गहरा अन्याय हो रहा है। उनसे उनकी ज़मीन, उनका आसमान और उनका अस्तित्व – सब कुछ छीना जा रहा है।
उन्होंने इस पूरी परियोजना को देश की प्राकृतिक और आदिवासी धरोहर के खिलाफ “सबसे बड़े घोटालों और गंभीर अपराधों में से एक” करार दिया है।
“इसे किसी भी सूरत में रोका जाना चाहिए”
राहुल गांधी ने देशवासियों से अपील की कि वे ग्रेट निकोबार की वास्तविक स्थिति को खुद देखें और समझें। उन्होंने कहा कि यह मामला किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे देश की आने वाली पीढ़ियों का है।
“यह विकास की भाषा में छिपाया गया विनाश है – और इसे हर हाल में रोका जाना चाहिए।”

विवाद पुराना, लेकिन लड़ाई जारी
ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर पर्यावरणविदों, वन्यजीव विशेषज्ञों और आदिवासी अधिकार संगठनों ने पहले से ही गहरी आपत्तियां जताई हैं। यह द्वीप न केवल जैव विविधता का अनमोल केंद्र है, बल्कि यहां शोम्पेन और निकोबारी जैसे आदिम, दुर्लभ आदिवासी समुदाय भी निवास करते हैं।
वहीं केंद्र सरकार अपने रुख पर कायम है और इसे राष्ट्रीय हित में बताती है। लेकिन जिस धरती पर पेड़ पीढ़ियों पुराने हों और जिन जंगलों में आदिवासियों की सांसें बसती हों – वहां ‘विकास’ और ‘विनाश’ के बीच जिंदगी की रेखा बेहद महीन और बेहद संवेदनशील हो जाती है।
अब देखना यह है कि इस बहस का अंत विकास के नाम पर “जय” से होता है – या सदियों पुरानी प्रकृति की “पराजय” से।





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