एक दौर था जब भारतीय पत्रकारिता में महिलाओं की स्वतंत्र आवाज़ के तौर पर मधु किश्वर का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता था। लेकिन अब, अपनी नई किताब ‘मोदी नामा’ के जरिए उन्होंने एक ऐसा सियासी और सामाजिक तूफान खड़ा कर दिया है, जिसने सबको आवाक कर दिया है। 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर वकालत करने वाली मधु किश्वर ने 12 साल बाद अपनी इस किताब में पीएम मोदी के खिलाफ गंभीर चारित्रिक आरोप लगाए हैं। लेखिका और एक्टिविस्ट सुसंस्कृति परिहार के एक हालिया लेख के बाद यह विवाद अब और गहरा गया है, जिसने एक बार फिर सत्ता, चुप्पी और पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक सशक्त आवाज़ से ‘अंधभक्ति’ और फिर मोहभंग तक का सफर
यह कहानी केवल एक किताब की नहीं, बल्कि एक आम पाठक के उस भरोसे के टूटने और जुड़ने की है, जो वह अपने पत्रकारों पर करता है।
स्मार्टफोन और गूगल के शोर से बहुत पहले, मधु किश्वर की पत्रिका ‘मानुषी’ समाज के दबे-कुचले वर्गों और महिलाओं की एक बुलंद आवाज़ हुआ करती थी। लोग स्वतंत्र मीडिया के रूप में उन्हें पढ़ना और सुनना सुकूनदेह मानते थे। उनकी आवाज़ में बेखौफ साहस झलकता था। लेकिन 2014 में चुनाव से ठीक पहले उन्होंने गुजरात दंगों को लेकर एक किताब लिखी, जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट देते हुए उनकी जमकर तारीफ की। इस एक कदम ने उनकी बरसों की कमाई हुई निष्पक्ष छवि को गहरा धक्का पहुंचाया और उन पर ‘अंधभक्त’ होने का ठप्पा लग गया।
अब एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद, जब उनकी नई किताब ‘मोदी नामा’ बाजार में आई, तो लोगों को लगा कि यह भी स्तुति गान ही होगा। लेकिन किताब के पन्ने पलटते ही लोग हैरान रह गए। इसमें कोई तारीफ नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री के खिलाफ खुलकर चारित्रिक और नैतिक आरोप लगाए गए हैं।
किताब में उठाए गए मुख्य बिंदु और पुराने विवादों की गूंज
सुसंस्कृति परिहार के विश्लेषण और किताब के दावों के अनुसार, ‘मोदी नामा’ में जो बातें कही गई हैं, वे भारतीय राजनीति के बंद कमरों में पहले भी फुसफुसाहट का हिस्सा रही हैं:
पुराने आरोपों का नया मंच: किताब में जिन आरोपों का जिक्र है, उनमें से कई बातें दिल्ली विधानसभा में कपिल मिश्रा (जब वे ‘आप’ में थे) उठा चुके हैं। भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी भी वर्षों से ऐसे ही विस्फोटक बयान देते रहे हैं।
नेताओं की पदोन्नति पर सवाल: दावा किया गया है कि जिन नामों और किरदारों को लेकर विवाद रहा है, उन्हें दरकिनार करने के बजाय और ताकतवर बनाया गया। कपिल मिश्रा को भाजपा में शामिल कर लिया गया, जबकि कथित फर्जी डिग्री विवाद के बावजूद स्मृति ईरानी को मानव संसाधन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपे गए।
एप्स्टीन फाइल का जिक्र: सबसे चौंकाने वाला दावा चर्चित ‘एप्स्टीन फाइल’ (Epstein file) को लेकर है। लेख में जिक्र किया गया है कि जब से इस फाइल में कथित तौर पर कुछ भारतीय उद्योगपतियों और नेताओं के नाम सामने आए हैं, तब से कई अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने तो अपने पदों से इस्तीफा दे दिया, लेकिन भारत में इसे लेकर पूरी तरह से चुप्पी साधी गई है।
चुप्पी का राजनीतिकरण और एक लेखिका का मानसिक अवसाद
इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा मानवीय पहलू भी है। एक आम नागरिक यह सोचने पर मजबूर है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग गंभीर आरोपों पर मौन क्यों धारण कर लेते हैं? क्या खामोशी को निर्दोष होने का प्रमाण मान लिया जाना चाहिए?
दूसरी तरफ, मधु किश्वर की स्थिति भी एक बड़ी बहस का विषय है। एक महिला लेखिका के तौर पर अगर उन्हें किसी सच्चाई का पता था, तो उन्होंने 2014 में ही उसे उजागर क्यों नहीं किया? यदि वे उस समय अपने सच पर अडिग रहतीं, तो शायद उन्हें वह मानसिक घुटन और अवसाद नहीं झेलना पड़ता, जिसका सामना उन्होंने इस ‘यू-टर्न’ से पहले किया। अगर यह प्रतिरोध एक दशक पहले होता, तो शायद देश की राजनीति की दिशा कुछ और होती और उनकी किताब महज एक विवादित पर्चा न होकर एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन जाती।
आगे क्या? क्या लौटेगा पुराना जलवा?
राजनीतिक पंडितों और आलोचकों का मानना है कि समय अब बहुत बदल चुका है। कई लोग कह रहे हैं कि लेखिका यह यू-टर्न इसलिए ले रही हैं क्योंकि उन्हें राजनीतिक हवा का रुख बदलता दिख रहा है।
लेकिन एक संपादक के नज़रिए से देखें, तो सवाल नीयत से ज्यादा तथ्यों का है। महिला शोषण और सत्ता के दुरुपयोग पर केंद्रित यह किताब इतिहास के पन्नों में एक दर्ज शिकायत तो बन जाएगी, लेकिन क्या यह कोई बदलाव ला पाएगी? अगर मधु किश्वर के पास अपने आरोपों को साबित करने के लिए पुख्ता और प्रामाणिक दस्तावेज हैं, तो उन्हें सिर्फ पन्नों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें इन्हें प्रेस के सामने रखकर अदालत का दरवाज़ा खटखटाना चाहिए।
एक सच्चे पत्रकार की असली जीत सत्ता से सवाल पूछने में ही नहीं, बल्कि उस सवाल को अंजाम तक पहुंचाने में है। यदि वे कानूनी रास्ता अपनाती हैं, तो शायद ‘मानुषी’ वाली वह पुरानी, निडर मधु किश्वर एक बार फिर जीवित हो उठें। वरना, एक मुखर पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उनका यह किरदार हमेशा के लिए संदेहास्पद और सवालों के घेरे में ही रह जाएगा।
(लेखिका और एक्टिविस्ट सुसंस्कृति परिहार के विचारों और मधु किश्वर की किताब ‘मोदी नामा’ के इर्द-गिर्द हो रही चर्चाओं पर आधारित एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट।)





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