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80% राजस्व देने वाले कोरबा के हिस्से में सिर्फ मालगाड़ियों का धुआं क्यों? रेलवे बजट पर संसद में गरजीं सांसद ज्योत्सना महंत

करोड़ों का खर्च ‘वंदे भारत’ के प्रचार पर, लेकिन कोरबा का आम यात्री आज भी 4 घंटे ट्रेन के इंतजार में। सांसद ने कहा- रेलवे सिर्फ मुनाफे की मशीन नहीं, एक लोक कल्याणकारी सेवा है।

नई दिल्ली/कोरबा (पब्लिक फोरम)। विकास की चमक-दमक और ‘वंदे भारत’ जैसी ट्रेनों के भव्य प्रचार के बीच, जमीनी हकीकत अक्सर खामोश रह जाती है। लेकिन कोरबा लोकसभा क्षेत्र की सांसद ज्योत्सना चरणदास महंत ने इस खामोशी को तोड़ते हुए संसद में रेलवे की नीतियों पर करारी चोट की है। रेल बजट पर अनुदान मांगों की चर्चा के दौरान उन्होंने एक ऐसा सवाल उठाया जो हर उस आम यात्री के दिल की आवाज है, जो घंटों स्टेशन पर अपनी ट्रेन का इंतजार करता है- “जब दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (SECR) को अपना 80 प्रतिशत राजस्व अकेले कोरबा से मिलता है, तो फिर इस क्षेत्र के यात्रियों की झोली खाली क्यों है?”

यह अर्थशास्त्र का एक बेहद सामान्य सा नियम है कि जो क्षेत्र सबसे ज्यादा कमा कर देता है, वहां निवेश और सुविधाएं भी उसी अनुपात में होनी चाहिए। लेकिन कोरबा के मामले में रेलवे का यह गणित पूरी तरह से उलझा हुआ है। सांसद ज्योत्सना महंत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिस क्षेत्र से राजस्व आता है, उस क्षेत्र को न्याय हर हाल में मिलना चाहिए। उन्होंने लगभग 30 लाख रुपये की लागत से तैयार, लेकिन अब तक निष्क्रिय पड़ी ‘पिटलाइन’ को तुरंत चालू करने की मांग की। क्योंकि इस बुनियादी ढांचे के बिना नई यात्री ट्रेनों का संचालन महज एक सपना बनकर रह जाएगा।

यात्रियों की पीड़ा और प्रचार का विरोधाभास
आज कोरबा का आम यात्री मालगाड़ियों के पीछे अपनी बारी का इंतजार करने को मजबूर है। सांसद ने सरकार की प्राथमिकताओं पर तीखा तंज कसते हुए कहा कि एक तरफ ‘वंदे भारत’ जैसी ट्रेनों के प्रचार-प्रसार पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कोरबा का आम आदमी एक साधारण लोकल ट्रेन के लिए तीन से चार घंटे तक प्लेटफॉर्म पर खड़ा रहता है। यह इंतजार केवल समय की बर्बादी नहीं है, बल्कि उस आम नागरिक के सम्मान को ठेस है जो देश के विकास में अपना योगदान दे रहा है।

अधूरी परियोजनाएं: क्या लोगों को रेल यात्रा का अधिकार नहीं?
क्षेत्र में रेल परियोजनाओं की कछुआ चाल पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सांसद ने कई बुनियादी मुद्दे उठाए। उन्होंने याद दिलाया कि दस साल का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी ‘गेवरा-पेंड्रा रेल कॉरिडोर’ अधूरा पड़ा है। कोरबा से कटनी के बीच सीधी ट्रेन का न होना और कोरबा-राउरकेला मार्ग पर पिछले पांच वर्षों से सिर्फ मालगाड़ियों का संचालन होना, रेलवे की नीयत पर बड़े सवाल खड़े करता है। सांसद का यह सीधा सवाल कि- “क्या इस क्षेत्र के लोगों को रेल यात्रा का अधिकार नहीं है?”- रेलवे प्रशासन के लिए एक बड़ा आईना है।

जनहित की ठोस मांगें और रेलवे का असली उद्देश्य
सांसद ने सदन में केवल कमियां ही नहीं गिनाईं, बल्कि जनहित से जुड़ी बेहद तार्किक और ठोस मांगें भी पटल पर रखीं:-

🔸चांपा और सक्ती रेलवे स्टेशनों पर ‘गीतांजलि एक्सप्रेस’ और ‘अहमदाबाद एक्सप्रेस’ के ठहराव की पुरजोर वकालत की गई।

🔸’नर्मदा एक्सप्रेस’, ‘छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस’ और ‘तिरुपति एक्सप्रेस’ जैसी महत्वपूर्ण ट्रेनों को बिलासपुर से आगे बढ़ाकर कोरबा तक लाने का सशक्त सुझाव दिया गया। (इससे न केवल लाखों यात्रियों को राहत मिलेगी, बल्कि रेलवे के राजस्व में भी इजाफा होगा।)

मुनाफा नहीं, सेवा है भारतीय रेल
अपने वक्तव्य के अंत में सांसद ने जो बात कही, वह भारतीय रेल के मूल दर्शन को छूती है। उन्होंने याद दिलाया कि रेलवे महज मुनाफा कमाने वाली एक व्यावसायिक संस्था नहीं है; यह भारत के आम आदमी की जीवनरेखा है- एक लोक कल्याणकारी सेवा। ‘अमृत भारत योजना’ के तहत चमचमाते स्टेशन और बिछाई जा रही नई पटरियां तभी सार्थक हैं, जब उन पर आम आदमी की यात्री ट्रेनें बिना किसी देरी के दौड़ें।

सांसद ज्योत्सना महंत ने अपने मुखर, बेबाक और संवेदनशील विचारों से यह स्पष्ट कर दिया है कि कोरबा अब केवल राजस्व देने वाली ‘सोने की चिड़िया’ बनकर खामोश नहीं रहेगा; वह पूरी मजबूती के साथ अपने हक की सुविधाएं मांग रहा है।

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