सरगबुंदिया में 27 फरवरी को प्रस्तावित पर्यावरण जनसुनवाई से पहले भड़का आक्रोश, नगर निगम अध्यक्ष नूतन सिंह ठाकुर ने ईआईए (EIA) रिपोर्ट पर उठाए गंभीर सवाल, दी कोर्ट जाने की चेतावनी।
कोरबा (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ की ‘ऊर्जा धानी’ कहा जाने वाला कोरबा शहर अब अपने ही विकास के धुएं से घुट रहा है। अडानी समूह द्वारा संचालित ‘कोरबा पावर लिमिटेड’ के नए प्रस्तावित पावर प्लांट ने शहर में एक बड़े जनाक्रोश की चिंगारी भड़का दी है। 27 फरवरी 2026 को सरगबुंदिया में होने वाली पर्यावरण जनसुनवाई से ठीक पहले, इस कोयला आधारित बिजली परियोजना के खिलाफ बगावत के सुर तेज हो गए हैं।
नगर पालिक निगम कोरबा की अध्यक्ष नूतन सिंह ठाकुर ने इस महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का कड़ा विरोध करते हुए जनसुनवाई को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की मांग की है।
क्या है पूरा प्रोजेक्ट और क्यों हो रहा है विरोध?
जानकारी के मुताबिक, कोरबा पावर लिमिटेड ने सरगबुंदिया, खोड्डल और पताडी गांवों में 1320 मेगावाट के विस्तार और 1600 मेगावाट के एक बिल्कुल नए विद्युत संयंत्र की स्थापना का प्रस्ताव रखा है। इसी सिलसिले में 27 फरवरी को जनसुनवाई होनी है।
लेकिन, नूतन सिंह ठाकुर ने कॉर्पोरेट वादों की कड़वी हकीकत बयान करते हुए कहा कि पूर्व में ‘लैंको इन्फ्राटेक लिमिटेड’ (Lanco Infratech Limited) ने भी सुनहरे सपने दिखाए थे, जो कभी पूरे नहीं हुए। न तो वादे के मुताबिक हरियाली लाई गई, न ही उड़ती हुई राख (ऐश मैनेजमेंट) का कोई ठोस इंतजाम हुआ। जिन गांवों की जमीनें ली गईं, उनके बुनियादी ढांचे का विकास आज तक नहीं हुआ। ऐसे में उसी संवेदनशील इलाके में एक और विशालकाय प्लांट थोपना, आम जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।
बीमारियों का गढ़ बनता कोरबा: “यह शहर अब और धुआं नहीं सह सकता”
एक संवेदनशील और जमीनी सच्चाई को उजागर करते हुए उन्होंने कहा कि कोरबा पहले ही बारूद के ढेर पर बैठा है। शहर के चारों ओर एनटीपीसी (NTPC), छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी, बाल्को (BALCO), स्वास्तिक और लैंको जैसी कंपनियों की चिमनियाँ रात-दिन जहर उगल रही हैं। करीब 4500 मेगावाट की क्षमता वाले इन प्लांट्स और आसपास की खदानों ने शहर का दम निकाल दिया है।
हवा और ध्वनि प्रदूषण के कारण कोरबा के नागरिक कैंसर, अस्थमा और त्वचा जैसी गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। पर्यावरण का संतुलन पूरी तरह चरमरा चुका है। ऐसे में 1600 मेगावाट का यह अतिरिक्त बोझ कोरबा के लिए ‘ताबूत की आखिरी कील’ साबित हो सकता है।
रिपोर्ट में तथ्यों से छेड़छाड़ का गंभीर आरोप
विरोध सिर्फ प्रदूषण को लेकर ही नहीं है, बल्कि नीयत को लेकर भी है। नूतन सिंह ठाकुर ने आरोप लगाया है कि कंपनी की ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन’ (EIA) रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण और संवेदनशील तथ्यों को जानबूझकर छिपाया गया है। संरक्षित वन क्षेत्र, पहाड़ियों की स्थिति, जनसंख्या के वास्तविक आंकड़े, जलीय संतुलन, जीव-जंतुओं की मौजूदगी और प्रदूषण के पुराने स्तर (Baseline data) को सही तरीके से पेश नहीं किया गया है।
न्यायालय जाने की स्पष्ट चेतावनी
उन्होंने पर्यावरण संरक्षण मंडल और जिला कलेक्टर से इस भ्रामक रिपोर्ट की वैधानिक जांच कराने और जनसुनवाई को रद्द करने की पुरजोर मांग की है। साथ ही प्रशासन को दो-टूक चेतावनी दी है कि अगर जनभावनाओं को कुचलकर यह प्रोजेक्ट थोपा गया, तो आम जनता के जीवन की रक्षा के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा।
अब निगाहें 27 फरवरी पर…
विकास और विनाश के इस चौराहे पर खड़ा कोरबा अब 27 फरवरी की जनसुनवाई का इंतजार कर रहा है। देखना दिलचस्प होगा कि क्या प्रशासन जनस्वास्थ्य और पर्यावरण की इस गुहार को सुनता है, या फिर कॉर्पोरेट विस्तार के आगे कोरबा की सिसकती सांसों को नजरअंदाज कर दिया जाएगा। इस जनसुनवाई का नतीजा ही कोरबा के भविष्य की दिशा तय करेगा।





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