कोरबा/बालकोनगर (पब्लिक फोरम)। औद्योगिक विकास की चमक के पीछे अक्सर वह अंधेरा छिप जाता है, जिसका सामना विस्थापित और प्रभावित परिवारों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में करना पड़ता है। परसाभांठा स्थित बालको (वेदांता) कंपनी के गेट के सामने का मौजूदा नजारा इसी कड़वी सच्चाई का जीता-जागता प्रमाण है।
कंपनी के 1200 मेगावाट पावर प्लांट के कूलिंग टावर से फैल रहे जानलेवा प्रदूषण और अपने छिने हुए अधिकारों के खिलाफ ‘शांति नगर संघर्ष समिति’ का अनिश्चितकालीन धरना आज अपने 10वें दिन में प्रवेश कर गया है।
यह सिर्फ एक धरना नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की एक निर्णायक लड़ाई है। इस शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ आंदोलन में महिलाएं, युवा और बुजुर्ग- हर वर्ग के लोग खुले आसमान के नीचे अपने हक की आवाज पूरी एकजुटता के साथ बुलंद कर रहे हैं।

जीवन के अधिकार से जुड़ी हैं प्रमुख मांगें
आंदोलनकारियों की मांगें किसी अतिरिक्त सुख-सुविधा की नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन जीने के उन मौलिक अधिकारों की हैं, जो इस पावर प्लांट की स्थापना और प्रदूषण के कारण उनसे छिन गए हैं। प्रभावित परिवारों ने प्रबंधन के सामने पांच स्पष्ट मांगें रखी हैं:-
🔹स्थायी रोजगार: प्रभावित परिवारों के सदस्यों को कंपनी में स्थायी और सुरक्षित नौकरी दी जाए।
🔹पुनर्वास हेतु भूमि: प्रदूषण मुक्त और सुरक्षित वातावरण में रहने के लिए उचित जमीन आवंटित की जाए।
🔹उचित मुआवजा: अब तक हुए शारीरिक, मानसिक और आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए सम्मानजनक मुआवजा मिले।
🔹मुफ्त चिकित्सा सुविधा: प्लांट के प्रदूषण से पनप रही गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए आजीवन निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हों।
🔹मूलभूत सुविधाएं: प्रभावित परिवारों के लिए पानी, बिजली और सड़क जैसी जीवन की प्राथमिक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जाएं।
‘न्याय नहीं, तो शांति नहीं’ का अटल संकल्प
लगातार गिरते स्वास्थ्य और प्रशासन की अब तक की खामोशी ने प्रदर्शनकारियों के इरादों को कमजोर करने के बजाय और मजबूत कर दिया है। धरना स्थल पर डटी महिलाओं और बुजुर्गों की आंखों में थकान से ज्यादा अपने हकों को हासिल करने की जिद नजर आती है। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी सभी न्यायसंगत मांगें धरातल पर पूरी नहीं हो जातीं, उनका यह आंदोलन बिना थमे जारी रहेगा।
शांति नगर के निवासियों का नारा “न्याय नहीं, तो शांति नहीं” महज कुछ शब्द नहीं हैं; यह कॉर्पोरेट संवेदनहीनता के खिलाफ एक गहरी हुंकार है। यह इस बात का प्रतीक है कि जब तक आम इंसान को उसके हिस्से का न्याय नहीं मिल जाता, तब तक कोई भी विकास सच्चा और स्थायी नहीं हो सकता।
अब देखना यह है कि बालको प्रबंधन और प्रशासन कब अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इन प्रभावित परिवारों की जायज मांगें पूरी करते हैं, या फिर विकास की इस अंधी दौड़ में इंसानियत को यूं ही हाशिए पर रख छोड़ा जाएगा।





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