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गुरूवार, जनवरी 22, 2026
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फेसबुक पर आरक्षण विरोधी अभद्र टिप्पणी से बवाल: राजनांदगांव के मनीष जैन पर एफआईआर की मांग; मूलनिवासी संघ ने खोला मोर्चा

राजनांदगांव (पब्लिक फोरम)। सोशल मीडिया, जो लोगों को जोड़ने का एक माध्यम होना चाहिए था, आज समाज में दरार डालने का हथियार बनता जा रहा है। ताजा मामला छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के चिरचारी का है, जहां एक फेसबुक पोस्ट ने पूरे मूलनिवासी समाज को आंदोलित कर दिया है। चिरचारी निवासी मनीष जैन द्वारा फेसबुक पर मूलनिवासियों के संवैधानिक अधिकारों और आरक्षण को लेकर की गई कथित अभद्र टिप्पणी के खिलाफ मूलनिवासी संघ ने कड़ा मोर्चा खोल दिया है। संघ ने इसे केवल एक व्यक्ति की राय नहीं, बल्कि संविधान पर हमला बताते हुए हर जिले में एफआईआर (FIR) दर्ज कर कड़ी कार्यवाही की मांग की है।

क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के अनुसार, मनीष जैन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर आरक्षण व्यवस्था को लेकर बेहद आपत्तिजनक और अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया। इस पोस्ट के वायरल होते ही मूलनिवासी समाज में भारी रोष व्याप्त हो गया। मूलनिवासी संघ का आरोप है कि उक्त व्यक्ति ने अपनी टिप्पणी के जरिए न केवल एक बड़े वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है, बल्कि समाज में नफरत फैलाने और शांति भंग करने का प्रयास किया है। संघ ने साफ शब्दों में कहा है कि संविधान के खिलाफ ऐसी ‘ओछी मानसिकता’ को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

आरक्षण: खैरात नहीं, प्रतिनिधित्व का अधिकार
इस विवाद के केंद्र में आरक्षण की समझ और नासमझी का द्वंद्व है। मूलनिवासी संघ ने मनीष जैन की टिप्पणी का तार्किक जवाब देते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा इतिहास की गहराई और संविधान की मंशा को समझे बिना ही सोशल मीडिया पर न्यायाधीश बन जाता है।

संघ ने स्पष्ट किया कि:-
🔹आरक्षण का दायरा: आज आरक्षण केवल ST, SC या OBC तक सीमित नहीं है। केंद्र सरकार द्वारा लागू EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) आरक्षण के तहत सवर्ण समाज को भी इसका लाभ मिल रहा है। अतः इसे जाति विशेष से जोड़ना अज्ञानता है।
🔹सामाजिक संतुलन: इतिहास गवाह है कि मूलनिवासी समाज पर सदियों तक अत्याचार हुए और उन्हें विकास की मुख्य धारा से काटा गया। आरक्षण कोई ‘भीख’ या ‘खैरात’ नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक अन्याय को संतुलित करने और समाज में बराबरी लाने का एक नायाब संवैधानिक तरीका है।

संविधान का अपमान देशद्रोह के समान
मूलनिवासी संघ ने अपनी शिकायत में बहुत ही गंभीर मुद्दे उठाए हैं। उनका कहना है कि भारत की आत्मा उसके संविधान में बसती है। जो व्यक्ति संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों (जैसे आरक्षण) पर अभद्र टिप्पणी करता है, वह परोक्ष रूप से संविधान का ही विरोध कर रहा है। संघ के प्रतिनिधियों ने कहा, “आरक्षण विरोध के नाम पर अमर्यादित बातें करना देशद्रोह की श्रेणी में आता है, क्योंकि इससे सांप्रदायिक हिंसा भड़कने और देश की अखंडता टूटने का खतरा रहता है।”

अभिव्यक्ति की आजादी बनाम सामाजिक जिम्मेदारी
यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा क्या है? भारतीय संविधान हर नागरिक को अपनी बात कहने का हक देता है, लेकिन किसी को भी असभ्य भाषा का प्रयोग कर दूसरे की गरिमा को कुचलने का अधिकार नहीं है। मनीष जैन की टिप्पणी को संघ ने ‘क्रिमिनल एक्ट’ करार दिया है।

संघ की मांग है कि:-
🔹मनीष जैन सार्वजनिक रूप से माफी मांगें।
🔹प्रशासन उन पर सख्त कानूनी कार्यवाही करे ताकि भविष्य में कोई भी सोशल मीडिया पर ऐसी ‘जहर बुझी’ भाषा का प्रयोग करने से पहले सौ बार सोचे।

नफरत के मोहरे न बनें
इस पूरे घटनाक्रम के बीच मूलनिवासी संघ ने सर्व समाज के लिए एक भावुक अपील भी जारी की है। उन्होंने कहा कि अक्सर लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए युवाओं को आरक्षण के खिलाफ भड़काते हैं। संघ ने युवाओं से अपील की है कि वे किसी के उकसावे में न आएं और न ही किसी नफरती एजेंडे का मोहरा बनें।
मनीष जैन की टिप्पणी ने समाज में छिपी असमानता की भावना को एक बार फिर उजागर कर दिया है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है, ताकि संविधान के प्रति आस्था रखने वालों का विश्वास कानून व्यवस्था पर बना रहे। समाज तभी आगे बढ़ेगा जब हम एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करेंगे, न कि उनका अपमान।

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