समाज की आंख, लोकतंत्र की आवाज
पत्रकार केवल खबरें लिखने वाले लोग नहीं होते, वे समाज का आईना होते हैं। जिन मुद्दों पर आम नागरिक को नजर नहीं पहुँच पाती, वहाँ पत्रकार अपनी कलम और कैमरा लेकर खड़े मिलते हैं। लोकतंत्र के चार स्तंभों में प्रेस को चौथा स्तंभइसलिए कहा गया है क्योंकि यह सत्ता को सच का आईना दिखाने की हिम्मत रखता है।
सच की तलाश, खतरे के बीच
समाचारों की दुनिया जितनी आकर्षक दिखती है, उसकी हकीकत उतनी ही कठिन होती है। जमीनी रिपोर्टिंग के दौरान पुलिस-प्रशासन, राजनीतिक दबाव-सबके बीच पत्रकार अपने कर्तव्य पर डटे रहते हैं। रात-दिन, बारिश-धूप, भीड़ तनाव, कई बार बिना सुरक्षा, विना संसाधन और बिना किसी सहयोग के भी वे सच को सामने लाने की लड़ाई लड़ते हैं।
समाज के लिए महत्वपूर्ण योगदान
🔹भ्रष्टाचार बेनकाब करना
पत्रकारों की रिपोर्टिंग से कई भ्रष्टाचार उजागर होते हैं, जिनसे
प्रशासन हरकत में आता है।
🔹कमजोर की आवाज बनना
गाँव, कस्बों और शहरों के कोने-कोने में आम जनता की समस्याओं को सामने लाने वाला पत्रकार ही होता है।
🔹सरकार और जनता के बीच कड़ी
पत्रकार नीतियों, योजनाओं और समस्याओं को सही रूप में जनता तक पहुंचाकर लोकतंत्र को मजबूत करते हैं।
🔹आपदा और संकट में सेवा
बाढ़, दुर्घटना, महामारी या किसी भी संकट में सबसे पहले मौके
पर मौजूद रहने वाले पत्रकार ही होते हैं।
चुनौतियां और जिम्मेदारियां
पत्रकारों के सामने चुनौतियाँ कम नहीं-
– झूठे मुकदमे।
– दबाव।
– धमकियाँ।
– संसाधनों की कमी।
– डिजिटल युग में फेक न्यूज का बढ़ता खतरा।
इसके बावजूद पत्रकारिता का असली धर्म सच्चाई, निष्पक्षता और जनता के हित के प्रति समर्पित रहता है।
आज जरूरत किस बात की है ?
आज पत्रकारों को सिर्फ सम्मान ही नहीं, बल्कि सुरक्षा, स्वतंत्रता और सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता है। समाज को भी यह समझना होगा कि एक ईमानदार पत्रकार वही कहता है जो सच है, न कि जो सुनने में अच्छा लगे। पत्रकार लोकतंत्र की रीढ़ हैं।
उनकी कलम में वह ताकत है जो समाज को बदले, व्यवस्था को सुधार दे और जन-जन की समस्याओं को आवाज दे सके।
सत्य के इस मार्ग पर चलने वाले सभी पत्रकारों को सम्मान –
क्योंकि जब तक पत्रकार जिंदा हैं, तब तक लोकतंत्र जिंदा है।
लेखक: विनोद वर्मा;
(राष्ट्रीय अध्यक्ष, पत्रकार सुरक्षा सेवा समिति।)





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