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छत्तीसगढ़ का गौरव, पंडवानी गायिका तीजन बाई का निधन: लोक कला के एक स्वर्णिम युग का अंत

रायपुर/कोरबा (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ की माटी की खुशबू और लोक संस्कृति को वैश्विक पटल पर स्थापित करने वाली, अद्वितीय पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का निधन हो गया है। उनका जन्म 8 अगस्त 1956 को हुआ था। उनके जाने से लोक कला और संगीत जगत में एक ऐसा शून्य पैदा हो गया है, जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा।

प्रारंभिक जीवन और कड़ा सामाजिक संघर्ष
तीजन बाई का जन्म एक बेहद साधारण पारधी समाज (अनुसूचित जनजाति) परिवार में हुआ था।
– बचपन का रुझान: बचपन में अपने नाना ब्रजलाल को महाभारत की कहानियां गाते-सुनाते देखकर उनका झुकाव पंडवानी की ओर हुआ। वे चोरी-छिपे इसे सीखने और गुनगुनाने लगीं।
– सामाजिक बहिष्कार: उस दौर में किसी महिला का मंच पर आकर पुरुषों के सामने गाना, वह भी खड़े होकर अभिनय करना, सामाजिक रूप से वर्जित माना जाता था। तीजन बाई को इसके लिए भारी सामाजिक विरोध झेलना पड़ा। यहाँ तक कि उन्हें कुछ समय के लिए समाज और गांव से बहिष्कृत भी कर दिया गया था, लेकिन उन्होंने कला का दामन नहीं छोड़ा।

पंडवानी में क्रांति: ‘कापालिक शैली’ की पहली महिला गायिका
पंडवानी गायन की मुख्य रूप से दो शैलियां होती हैं – वेदमती (जिसमें बैठकर शांति से गाया जाता है) और कापालिक (जिसमें खड़े होकर हाथ में तंबूरा लेकर आक्रामक अभिनय के साथ गाया जाता है)।
– तीजन बाई से पहले महिलाएं केवल वेदमती शैली में गाती थीं।
– तीजन बाई ने रूढ़ियों को तोड़ते हुए कापालिक शैली को चुना। वे जब मंच पर अपने हाथ में तंबूरा लेकर उतरती थीं, तो वही तंबूरा कभी अर्जुन का गांडीव धनुष, कभी भीम की गदा तो कभी दुःशासन की छाती चीरने वाला खंजर बन जाता था। उनकी कड़कती आवाज, दमदार अभिनय और चेहरे के हाव-भाव दर्शकों को सीधे महाभारत के कुरुक्षेत्र में ले जाते थे।

प्रमुख सम्मान और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार
तीजन बाई भारत की उन गिने-चुने कलाकारों में से हैं, जिन्हें देश के तीनों सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा जा चुका है:
1. पद्म श्री (1987): मात्र 31 वर्ष की आयु में कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए।
2. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995): भारत की संगीत और नाटक अकादमी द्वारा सम्मानित।
3. पद्म भूषण (2003): कला जगत में निरंतर सक्रियता और विशिष्ट पहचान के लिए।
4. एम.एस. सुब्बालक्ष्मी शताब्दी पुरस्कार (2016): शास्त्रीय और लोक संगीत में बड़ा योगदान देने पर।
5. फुकुओका पुरस्कार (2018): कला और संस्कृति के लिए दिया जाने वाला प्रतिष्ठित जापानी अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार।
6. पद्म विभूषण (2019): देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान।
7. डी.लिट की मानद उपाधि: बिलासपुर विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि भी प्रदान की गई थी।

वैश्विक मंच पर छत्तीसगढ़ का मान
तीजन बाई ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार भी छत्तीसगढ़ी लोक कला का परचम लहराया।
उन्होंने इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, तुर्की, माल्टा और ट्यूनिशिया जैसे दर्जनों देशों में पंडवानी की सफल प्रस्तुतियां दीं। 1980 के दशक में पेरिस में आयोजित ‘फेस्टिवल ऑफ इंडिया’ में उनकी प्रस्तुति ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था, जिसके बाद वे वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय हो गईं।

तीजन बाई सिर्फ एक कलाकार नहीं थीं, बल्कि वे महिला सशक्तिकरण और विपरीत परिस्थितियों से लड़कर जीतने की एक जीती-जागती मिसाल थीं। उन्होंने अपनी कला के दम पर गरीबी, सामाजिक रूढ़िवादिता और अशिक्षा जैसी बेड़ियों को काटकर दुनिया में अपना लोहा मनवाया। उनका जाना लोक संस्कृति के एक जीवंत अध्याय का अवसान है।
“पब्लिक फोरम” की ओर से छत्तीसगढ़ महतारी की इस महान बेटी को भावभीनी श्रद्धांजलि।

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