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कोरबा: बंद पड़े राखड़ बांध के नाम पर करोडों का खेल

एएमसी के बावजूद अलग-अलग निविदाएं निकाल कर कंपनी को पहुॅचाया जा रहा भारी आर्थिक नुकसान।

संभाग – 2 में पदस्थ महिला कार्यपालन अभियंता  द्वारा निविदाओं में पृथक से डाली जा रही शर्तें संदेह के घेरे में- जाँच जरूरी।

कोरबा (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी में राखड़ प्रबंधन और राखड़ बांधों के रखरखाव के नाम पर करोड़ो रूपये की अनियमितताओं से जुड़े कई गंभीर मामले सामने आए है। गंभीर बात ये है कि ये सारा खेल उस बंद पड़े राखड़ डेम पाड़ीमार में वर्षों से जारी है जिसे 2021 में बंद कर दिया गया और पर्यावरण की स्टेबिलिटी रिपोर्ट भी उपलब्ध है। उपलब्ध दस्तावेजों पे गौर करें तो जिन कार्यों के लिये एक समग्र निविदा कंम्प्रिहेंसिव टेडर निकाल कर ठेकेदार को दियाप गया है उसी निविदा में शामिल कार्यों के फिर से अलग-अलग  टेंडर निकाले गए हैं जिससे उत्पादन कंपनी को करोड़ों रूपये की क्षति पहुॅचाई जा रही है। और ये सब कुछ हो रहा है स्थानीय स्तर के उच्चाधिकारियों की सरपरस्ती में। मनमानी का दौर और कारगुजारियों का आलम ये है कि सिविल संभाग – 2 में पदस्थ महिला कार्यपालन अभियंता अपने क्षेत्र के लिये निकाली जा रही निविदाओं में अलग से तीन नियमों और शर्तों का उल्लेख कर रही है. जो ना तो मुख्यालय द्वारा निकाली गई निविदाओं में देखने मिलती और ना ही अन्य सम्भागों की निविदाओं में।

बताया जाता है “Priority should not be given to such contractors whose work is pending even after the deadline in this division * Priority should not be given to such contractors who would have opted for tender blouse 3(C) or clouser from this division * Preference should be given to  such contrators who have vehicles/ poclain in their own name” जैसे घुमावदार शब्दों के अतिरिक्त नियम शर्तों का उल्लेख इस लिये किया जाता है ताकि अधिकारी  द्वारा चहेतों को लाभ पहुॅचाया जा सके। अगर ये शर्तें  बगैर अनुमति या नियम विरुद्ध  डाली गई हैं  तो यह कृत्य कूटरचना के गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है जो कि जांच का विषय है।

छत्तीसगढ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी के कोरबा स्थित 200 मेगावाट विद्युत संयंत्र के बंद होते ही संयंत्र के पाड़ीमार स्थित राखड़ डेम को भी 1 जनवरी 2021 से बंद कर दिया गया। राखड़ डेम के बंद होने के बाद भी उसके रख रखाव की जिम्मेदारी सिविल संभाग-2 के हवाले है जहाॅ से बीते पाॅच सालों से वार्षिक रखरखाव के नाम पर लाखों की निविदा निकाली जाती है। पिछले कई वर्षों से 15 से लेकर लगभग 19 लाख प्रति वर्ष का यह ठेका ग्रेसफुल नाम की कंपनी को दिया जा रहा है। उक्त निविदा में राखड़ बांध मेन्टेनेंस के लिये सीमेन्ट की खाली बोरियाॅ जिनमें रेत भर कर कटाव को रोकने के इंतजाम किये जा सकें, रख रखाव के लिये मजदूरों की आपूर्ति, नाली निर्माण, सड़क निर्माण, स्प्रेडिंग, वाटरिंग, डोजिंग जैसे काम शामिल होते है। इन कार्यों में बोल्डर पीचिंग के अलावा जेसीबी और टैक्टर का भी जिक्र निविदा मे किया जाता है। रखरखाव के लिये निकाली गई लाखों की उक्त निविदा में हर एक कार्यों का स्पष्ट उल्लेख होता है।

जाहिर है पूरे साल भर के लिये निकाली गई उक्त निविदा के जरिये बंद पड़े पाड़ीमार राखड़ बांध का साल भर रखरखाव किया जाता है बावजूद इसके उत्पादन कंपनी के स्थानीय स्तर के अधिकारियों के संरक्षण में उपरोक्त निविदा में शामिल कई कार्यों के लिये अलग-अलग छोटी निविदाएं निकाली जाती है। सिविल संभाग-2  द्वारा इन निविदाओं में अलग से तीन शर्तें लागू कर दी जाती हैं जिनका जिक्र ऊपर किया गया है। जबकि मुख्यालय से लेकर अन्य सिविल संभागों में निकाली जा रही ऐसी ही निविदाओं में कहीं भी ऐसी बेतुकी शर्तों का उल्लेख नहीं है। पहली शर्त के अनुसार निविदाओं में उस ठेका कंपनी या फर्म को प्रथमिकता नहीं दी जाएगी जिनके पहले के कार्य लंबित हैं। जबकि कार्य लंबित होना और तयशुदा समय सीमा में कार्य ना हो पाने की स्थिति में उन कारणों और वस्तुस्थिति पर भी सुनवाई होती है जिसकी वजह से कार्य में देर हो रही या हुई इसके लिए कई बार संबंधित विभाग भी जिम्मेदार होता है। यही नहीं ऐसा होने पर संबंधित फर्म या ठेकेदार के उपर पेनाल्टी का भी प्रावधान है,  समय के साथ-साथ पेनाल्टी की राशि भी बढती है। यही वजह है कि दूसरे संभागों और मुख्यालय से निकलने वाली किसीभी निविदाओं में ऐसे  नियमों का कोई जिक्र नहीं होता।

सूत्रों की माने तो ऐसे कई ठेकेदार हैं जिनके कार्य कई महिने से लंबित है बावजूद वे सिविल संभाग – 2 में काम ले रहे हैं क्योकि उनके जो कार्य लंबित हैं वे  दूसरे संभाग में हैं। डेम को रेनकट से बचाने के लिये यहां वाटर डिस्चार्ज के लिये नाली निर्माण कराया गया है जो चर्चाओं में है इसकी गुणवक्ता और तकनीकी खामियां जांच का विषय है अधिकारियों को चाहिए कि वे इसकी जांच भुगतान से पहले कर लें।  आउटलेट और अन्य तकनीकी समस्या किसी बड़ी दुर्घटना को जन्म ना दे दे। 5 वर्षों से लगातार हो रहे रखरखाव और अलग-अलग निविदाओं के बावजूद पाडीमार राखड़ बांध की सैकडो टन राख ढेंगुर नाले में बह रही है। झाडियों को काटे जाने का कार्य दिये जाने के बावजूद झाड़ियां नहीं काटी जातीं।

इस पूरे मामले में बेहद जरूरी हैं कि प्रदेश के ऊर्जा मंत्रालय को सबसे पहले इस दिशा में जांच करनी होंगी कि पहले ही ए एम सी के तहत् दिये जा चुके कार्यों के लिये अलग से निविदा निकालने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है क्या यह सरकारी धन के दुरूपयोग या पैसों की लूट का सुनियोजित तरीका तो नहीं? जिस राखड़ बांध को कागजों में पूरी तरह बंद कर दिया गया हो, वन विकास निगम को वृक्षारोपण के लिये करोडों की राशि सौंपी गई हो, जिसकी कई स्तर पर निगरानी की जा रही हो वहाॅ अब पूरे मामले मे जरूरी हो गया है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय,तकनिकी और वित्तिय जाॅच कराई जाए  वर्ष 2021 से अब तक सिविल संभाग- 2 में राखड डेम के रखरखाव के लिये निकाली गई समस्त निविदाओं, कार्यादशोऔर भुगतान को भी जांच के घेरे में लेना चाहिए। यदि जाॅच हुई तो कई अधिकारियों की भूमिका और कंपनी को पहुॅचाए जा रहे नुकसान के चैंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं।  

राखड़ डेम की निगरानी के लिये संभाग – 2 में 7 जुलाई 2026 को 4 लाख 33 हजार रूपये की लागत का एक टेंडर निकाला गया है जिसमे मानसून के दौरन पूरे ढाई महिने रोज ड्रोन कैमरे से बांध की  माॅनिटरिंग की जानी है। अब ये ड्रोन कितनी देर और किस तरह काम करेगा ये सोंचने वाली बात है। जानकारों के अनुसार ये तरीका व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है। जबकि वहीं दूसरी तरफ  संभाग -1 द्वारा 6 जुलाई  को गोढ़ी पंडरीपानी राखड बांध के लिए Round the clock guarding को महत्व देते हुए लगभग 5 लाख की निविदा निकाली गई है। और ये दोनों निविदाएँ महज एक दिन के अंतराल में ही निकली है। ये बहुत ही गंभीर जांच का विषय है कि एक जैसे नियम से बंधे एक संस्था  के दो संभाग अलग अलग दिशा में किस तरह काम कर रहे है वह भी एक तरह के कार्य के लिये आखिर यह निविदाएं क्यों और किसके कहने पर निकली जा रही है। हवाई निगरानी का ये नायाब आईडिया किस अधिकारी का है? यहाॅ यह बताना भी लाजमी है कि इस राखड बांघ के दैनिक निरीक्षण की जिम्मेदारी जेई, एई और डीई  की है जिन्हे ना केवल रोज निरीक्षण करना है वरन् दैनिक रिपोर्ट भी तैयार करके विभाग को सौंपना है। ऐसे मे आखिर ड्रोन से निगरानी पे इतनी राशि खर्च करने का क्या औचित्य है।

7 जुलाई 2026 को ही विभाग ने बंद पडे पाडीमार और रिस्दा राखड़ बांध के लिये 4 लाख 30 हजार की अनुमानित राशि का एक अलग से टेंडर निकाला जिसमें मानसून के दौरान एक जेसीबी 24 घंटे रखी जाएगी ताकि किसी भी अप्रत्याषित स्थिति से निपटा जा सके। जबकि वार्षिक रख रखाव के कार्य में जेसीबी का प्रावधान है

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