रायपुर/कोरबा (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा नवीन शिक्षा सत्र 2026–2027 से सरकारी और अर्ध-सरकारी शालाओं में सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र और भोजन मंत्र जैसे विशिष्ट धार्मिक मंत्रों को अनिवार्य करने का आदेश जारी किया गया है। राष्ट्रीय संयुक्त मोर्चा भारत के राष्ट्रीय संयोजक गोपाल ऋषिकर भारती ने इस आदेश को भारतीय संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन करार देते हुए इसके विरोध में जनांदोलन की चेतावनी दी है।
आदेश का विवरण
शिक्षा विभाग के पत्र क्रमांक GENCOR-35010/1981/2026/SCHOOL-EDUCATION SECTION, दिनांक 12 जून 2026 के माध्यम से यह निर्देश जारी किया गया है कि आगामी शैक्षणिक सत्र से स्कूलों में प्रातःकालीन प्रार्थना और मध्याह्न भोजन के समय इन धार्मिक मंत्रों का आयोजन “सुनिश्चित करना होगा।” विरोधियों का कहना है कि यह शब्दावली स्वयं ही इसे एक अनिवार्य निर्देश की श्रेणी में रखती है।

संवैधानिक आपत्तियाँ
गोपाल ऋषिकर भारती ने इस आदेश के विरुद्ध ठोस संवैधानिक आधार प्रस्तुत किए हैं। उनके अनुसार भारतीय संविधान का “अनुच्छेद 28(1)” स्पष्ट रूप से यह कहता है कि पूर्णतः राज्य निधि से संचालित शिक्षण संस्थानों में किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा या विशिष्ट धार्मिक प्रार्थना आयोजित नहीं की जा सकती। इसी प्रकार “अनुच्छेद 28(3)” के अंतर्गत किसी भी छात्र को उसके या उसके अभिभावकों की सहमति के बिना धार्मिक प्रार्थना में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। भारती का मानना है कि यह आदेश “अनुच्छेद 25” के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का भी उल्लंघन करता है।
विविधता और धर्मनिरपेक्षता का सवाल
सरकारी और अर्ध-सरकारी स्कूलों में विभिन्न धर्मों, पंथों और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के बच्चे एक साथ पढ़ते हैं। मोर्चे का कहना है कि किसी एक विशेष परंपरा की प्रार्थनाओं को सबके लिए अनिवार्य बनाना भारत के संविधान की मूल भावना – धर्मनिरपेक्षता – के विरुद्ध है। यदि राज्य सरकार वाकई सांस्कृतिक एकता चाहती है, तो राष्ट्रीय संयुक्त मोर्चा का सुझाव है कि सभी शालाओं में केवल संविधान की प्रस्तावना का पाठ कराया जाए, जो हर नागरिक को समान रूप से स्वीकार्य है।
ऐतिहासिक महापुरुषों की उपेक्षा पर चिंता
गोपाल ऋषिकर भारती ने यह भी कहा कि भगवान बुद्ध, सम्राट अशोक, संत कबीर, गुरु रविदास, गुरु घासीदास, भगवान बिरसा मुंडा, महात्मा ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर और भगत सिंह जैसे भारत के महान विचारकों और स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को विस्मृत कर एकांगी धार्मिक एजेंडा थोपना स्वीकार्य नहीं होगा।
आंदोलन की चेतावनी
राष्ट्रीय संयुक्त मोर्चा भारत और मूलनिवासी मुक्ति मोर्चा ने आम जनता से अपील की है कि इस आदेश के विरुद्ध संयुक्त रूप से जनांदोलनात्मक कार्यवाही के लिए तैयार रहें। भारती ने कहा कि यह मामला केवल एक शैक्षणिक आदेश का नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा का है।
स्कूल केवल पाठ्य पुस्तकें पढ़ाने की जगह नहीं हैं – वे उस भारत की नींव रखते हैं जो संविधान ने स्वप्न में देखा था। जब किसी आदेश से उस नींव पर सवाल उठने लगें, तो यह केवल राजनीतिक विवाद नहीं, एक संवैधानिक विमर्श बन जाता है। अब देखना यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार इन संवैधानिक प्रश्नों का उत्तर नीति में देती है या न्यायालय के कठघरे में।





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