कोरबा (पब्लिक फोरम)। एक तरफ सरकार “विकसित भारत” का नारा बुलंद कर रही है, दूसरी तरफ कोरबा जिले की ग्राम पंचायत बेला के आश्रित मोहल्ले सूअरधार में लगभग 15 परिवार पिछले एक महीने से बिजली के बिना अंधेरे में रात गुजारने को मजबूर हैं। यही नहीं, पीने के साफ पानी के लिए भी ये ग्रामीण नदी पर निर्भर हैं क्योंकि सरकारी बोर पंप करीब एक साल से बंद पड़ा है और उसे ठीक करने की सुध किसी को नहीं है।
मोबाइल चार्ज करने के लिए जाना पड़ता है पड़ोसी गांव
बिजली न होने की तकलीफ यहां के लोगों की दिनचर्या को कितना प्रभावित कर रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मोहल्ले के निवासियों को अपना मोबाइल फोन चार्ज करने के लिए पड़ोसी गांव “टापरा” तक जाना पड़ता है। वहां के घरों में जाकर वे अपने फोन चार्ज करते हैं। जो मोबाइल आज के दौर में एक जरूरी जीवनरेखा बन चुका है – बीमारी में डॉक्टर को फोन करना हो, बच्चों की पढ़ाई हो या किसी आपात स्थिति में मदद मांगनी हो – उसे चार्ज करने के लिए भी इन लोगों को किसी और की दया पर निर्भर रहना पड़ता है।

नदी का पानी पीने और खाना पकाने में हो रहा उपयोग
मोहल्ले की निवासी महिला “सुखमोती” ने बताया कि पीने के पानी के लिए लोग नदी से पानी ढोकर लाते हैं। यही पानी पीने और खाना बनाने दोनों कामों में इस्तेमाल होता है। उन्होंने बताया कि सरकारी बोर पंप लगभग “एक साल से खराब” पड़ा है। न कोई अधिकारी देखने आया, न कोई जनप्रतिनिधि। नदी का पानी पीना स्वास्थ्य के लिहाज से कितना खतरनाक हो सकता है, यह किसी से छुपा नहीं – खासकर तब, जब इसी पानी में जानवर भी जाते हों और गंदगी भी मिली हो।
अंधेरे में रात, और उजाले में झूठे दावे
गांव सूअरधार के ये परिवार रात होते ही घुप्प अंधेरे में समा जाते हैं। बच्चे पढ़ नहीं सकते, बुजुर्ग दवाई का रंग नहीं देख सकते, महिलाएं रात में घर का काम ठीक से नहीं कर सकतीं। और इसी दौरान दिल्ली से लेकर राजधानी रायपुर तक के मंचों पर हमारे नेता बड़े गर्व से घोषणाएं करते हैं – “हर घर बिजली”, “हर घर जल”। जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी सुनाती है।
सरकारी तंत्र की विफलता का आईना
– बिजली आपूर्ति ठप: लगभग “1 महीने” से बाधित, कोई सुनवाई नहीं।
– बोर पंप बंद: करीब “1 साल” से खराब, मरम्मत की कोई पहल नहीं।
– पीने का पानी: नदी से ढोकर लाना पड़ रहा है।
– मोबाइल चार्जिंग: पड़ोसी गांव टापरा जाकर करनी पड़ती है।
– प्रभावित परिवार: लगभग “15 परिवार”, जो गांव सूअरधार मोहल्ले में निवास करते हैं।
ये वादे धरातल पर कब उतरेंगे?
“अब नई सहबो, बदल के रहिबो!”
ग्राम पंचायत बेला का यह आश्रित गांव/मोहल्ला “सूअरधार” सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है – यह उस खाई का प्रतीक है जो सरकारी घोषणाओं और जमीनी वास्तविकता के बीच बनी हुई है। जब तक बिजली, पानी और बुनियादी सुविधाएं समाज के अंतिम छोर तक नहीं पहुंचतीं, तब तक “विकास” का दावा खोखला ही रहेगा।
ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन तत्काल बोर पंप की मरम्मत कराए और बिजली आपूर्ति बहाल करे – ताकि ये परिवार भी उसी “विकसित भारत” का हिस्सा बन सकें जिसकी बात हर मंच पर और हर मौके पर होती है।





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