कोरबा (पब्लिक फोरम)। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने 1 सितंबर को दिल्ली में आयोजित होने वाली ‘दिल्ली चलो—बदलाव जरूरी है’ महारैली में भाग लेने का ऐलान किया है। पार्टी के जिला सचिव पवन कुमार वर्मा के अनुसार, कोरबा जिले से 20 कार्यकर्ता रैली में शामिल होंगे। रैली में रोजगार, महंगाई, मजदूर अधिकार, कृषि उपज के न्यूनतम समर्थन मूल्य, शिक्षा-चिकित्सा, जल-जंगल-जमीन और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाए जाएंगे।
रोजगार और खाली पदों को बनाया प्रमुख मुद्दा
भाकपा ने केंद्र सरकार की रोजगार नीति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि एक ओर बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में हजारों पद खाली पड़े हैं।
हाल में सामने आए वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग के पे रिसर्च यूनिट के आंकड़ों के अनुसार, 1 मार्च 2024 तक 80 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों में 39,23,212 स्वीकृत नागरिक पदों में से 8,23,556 पद खाली थे। 30,99,656 पदों पर कर्मचारी कार्यरत थे। वर्ष 2015 में रिक्त पदों की संख्या 4,20,547 थी। यानी एक दशक में रिक्त पदों की संख्या लगभग दोगुनी हुई है।
इन आंकड़ों को लेकर भाकपा ने सरकार से सभी खाली पदों को भरने की मांग की है। हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि ये आंकड़े केंद्रीय सरकार के नागरिक पदों से संबंधित हैं और इन्हें देश में कुल बेरोजगारी या सभी सरकारी नौकरियों की रिक्तियों का आंकड़ा नहीं माना जा सकता।
रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा क्षेत्र के नागरिक प्रतिष्ठानों में करीब 2.42 लाख और रेलवे में करीब 2.40 लाख पद रिक्त थे। डाक विभाग में भी 61,546 पद खाली बताए गए हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र में ठेकाकरण पर भी सवाल
भाकपा ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में नियमित रोजगार की जगह ठेका व्यवस्था बढ़ने का मुद्दा भी उठाया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में ठेका कर्मचारियों की हिस्सेदारी वर्ष 2015 के 18.6 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में करीब 49.1 प्रतिशत हो गई। इसी अवधि में नियमित कर्मचारियों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई।
पार्टी का तर्क है कि स्थायी रोजगार के अवसरों में कमी और ठेका व्यवस्था के विस्तार से रोजगार की गुणवत्ता, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक अधिकारों पर असर पड़ सकता है।
चार श्रम संहिताओं को लेकर विरोध
भाकपा ने चार श्रम संहिताओं को भी रैली के प्रमुख मुद्दों में शामिल किया है। पार्टी का आरोप है कि नई श्रम व्यवस्था से मजदूरों के अधिकार कमजोर होंगे और रोजगार में अस्थिरता बढ़ेगी।
केंद्र सरकार ने चार श्रम संहिताओं—वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता तथा व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा संहिता—को 21 नवंबर 2025 से लागू किया था। भारत सरकार के आधिकारिक विधिक अभिलेख में भी औद्योगिक संबंध संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा संहिता की यही प्रवर्तन तिथि दर्ज है।

भाकपा इन संहिताओं को मजदूर हितों के प्रतिकूल बताते हुए इन्हें वापस लेने की मांग कर रही है। दूसरी ओर, सरकार का दृष्टिकोण रहा है कि चार संहिताओं का उद्देश्य पुराने श्रम कानूनों को सरल और समेकित करना तथा श्रम कानूनों के दायरे को व्यवस्थित करना है। इसलिए इस मुद्दे पर राजनीतिक और श्रमिक संगठनों के बीच मतभेद बने हुए हैं।
महंगाई और एथेनॉल नीति पर भी निशाना
भाकपा ने चीनी की कीमतों और एथेनॉल नीति को भी रैली के मुद्दों में शामिल किया है। पार्टी का आरोप है कि गन्ने के उपयोग में एथेनॉल उत्पादन को प्राथमिकता देने से चीनी की उपलब्धता और कीमतों पर दबाव पड़ा।
हालांकि, चीनी की कीमतों में बदलाव को केवल एथेनॉल नीति से जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा। चीनी का उत्पादन, गन्ने की उपलब्धता, मौसम, निर्यात नीति, घरेलू मांग और सरकारी नियंत्रण जैसे कई कारक इसकी कीमत को प्रभावित करते हैं। इसलिए पार्टी के इस आरोप को उसके राजनीतिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए।
किसानों और आदिवासी अधिकारों पर जोर
रैली के एजेंडे में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी, जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा तथा दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार एवं विस्थापन रोकने की मांग भी शामिल है।
भाकपा का कहना है कि प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसलों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी और उनके अधिकारों की रक्षा जरूरी है। पार्टी ने रोजगार की गारंटी तथा सरकारी विभागों में सभी खाली पदों को भरने की मांग भी रखी है।
लोकतंत्र और चुनावी व्यवस्था पर सवाल
भाकपा ने मतपत्र की व्यवस्था बहाल करने और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की मांग भी रैली के प्रमुख मुद्दों में रखी है।
पार्टी ने इस संदर्भ में जनप्रतिनिधियों की पृष्ठभूमि का मुद्दा भी उठाया है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के 2024 लोकसभा विश्लेषण के अनुसार, 543 नवनिर्वाचित सांसदों में से 251 यानी 46 प्रतिशत ने अपने चुनावी हलफनामों में आपराधिक मामले घोषित किए थे। इनमें 170 सांसदों ने गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए थे।
इसी तरह ADR के 2025 के विश्लेषण में 28 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों के 4,092 विधायकों के हलफनामों का अध्ययन किया गया। इनमें 1,861 यानी करीब 45 प्रतिशत विधायकों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए थे। इनमें 1,205 विधायकों ने गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए थे।

यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी जनप्रतिनिधि के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होना दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। मामलों का अंतिम निर्धारण न्यायालय करता है।
भाकपा जिला सचिव पवन कुमार वर्मा ने कहा कि कोरबा जिले से 20 साथी 1 सितंबर की दिल्ली रैली में भाग लेंगे। उन्होंने कहा कि रोजगार, महंगाई, श्रमिक अधिकार, किसानों की मांग और सामाजिक न्याय जैसे सवाल केवल किसी एक वर्ग के नहीं, बल्कि व्यापक जनहित से जुड़े मुद्दे हैं।
भाकपा नेता वर्मा के अनुसार, इन सवालों के समाधान के लिए मजदूरों, किसानों, छात्रों और युवाओं को एकजुट होकर आंदोलन में भाग लेना होगा।





Recent Comments