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सम्मानपुर बुलडोजर कार्रवाई: 85 परिवारों के उजड़ने के बाद मुआवजे की मांग तेज, जांच के बाद किसान महासभा ने सरकार को घेरा

रायपुर (पब्लिक फोरम)। रायपुर जिले के नकटी (सम्मानपुर) गांव में 29 जून को हुई बेदखली और मकान ढहाने की कार्रवाई को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। छत्तीसगढ़ किसान महासभा की तीन सदस्यीय जांच टीम ने प्रभावित परिवारों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनीं और सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाए। संगठन ने दावा किया है कि प्रभावित परिवारों की पुश्तैनी निस्तार भूमि को सरकारी बताकर कार्रवाई की गई, जबकि प्रशासन का कहना है कि संबंधित भूमि शासकीय है और वहां जनप्रतिनिधियों के लिए आवासीय एवं अन्य निर्माण प्रस्तावित हैं।

छत्तीसगढ़ किसान महासभा की जांच टीम ने रायपुर जिले के नकटी (सम्मानपुर) गांव का दौरा कर 29 जून को हुई बेदखली कार्रवाई का जायजा लिया। संगठन के अनुसार, गांव के भांठा क्षेत्र में रहने वाले 85 संयुक्त परिवारों के लगभग 130 पक्के और कच्चे मकानों को हटाया गया, जिनमें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने कुछ मकान भी शामिल बताए गए हैं।

महासभा का आरोप है कि बेदखली की प्रक्रिया मानवीय दृष्टिकोण से उचित नहीं थी और प्रभावित परिवारों को पर्याप्त राहत एवं पुनर्वास उपलब्ध नहीं कराया गया। संगठन ने इसे गंभीर सामाजिक और मानवीय मुद्दा बताया है।

प्रशासन का पक्ष
प्रभावित ग्रामीणों के अनुसार, प्रशासन ने उन्हें बताया कि संबंधित भूमि शासकीय है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि इस भूमि पर भविष्य में विधायक और सांसदों के लिए फ्लैट, क्लब तथा विश्राम गृह जैसी सुविधाओं का निर्माण प्रस्तावित है।

ग्रामीणों का कहना है कि इस संबंध में ग्राम पंचायत या ग्रामसभा में कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया गया। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

पुश्तैनी भूमि होने का दावा
किसान महासभा के संयोजक नरोत्तम शर्मा के नेतृत्व में गठित जांच दल का कहना है कि प्रभावित परिवारों ने उन्हें बताया कि यह भूमि उनके पूर्वजों के समय से निस्तार और पशुचारे के उपयोग में रही है। ग्रामीणों ने दावा किया कि वर्ष 1944 के चकबंदी अभिलेखों में भी इसका उल्लेख दर्ज है।

संगठन का आरोप है कि यदि भूमि के स्वामित्व और उपयोग को लेकर विवाद है तो उसका समाधान कानूनी प्रक्रिया और संवाद के माध्यम से होना चाहिए था।

प्रभावित परिवारों ने सुनाई आपबीती
जांच के दौरान प्रभावित महिलाओं ने कहा कि मकान टूट जाने के बाद उनका जीवन बेहद कठिन हो गया है। उनका कहना था कि बारिश के मौसम में छोटे बच्चों और बुजुर्गों के साथ तिरपाल और प्लास्टिक की चादरों के नीचे रहने को मजबूर हैं।

ग्रामीणों ने बताया कि फिलहाल भोजन और अन्य जरूरी सहायता कुछ सामाजिक संगठनों तथा स्थानीय लोगों के सहयोग से मिल रही है। उनका कहना है कि अब उनके सामने रोजी-रोटी और दोबारा घर बसाने, दोनों की चुनौती खड़ी हो गई है।

जनप्रतिनिधियों के आश्वासन का भी किया उल्लेख
प्रभावित ग्रामीण विष्णु साहू और सोनी यादव ने बताया कि लगभग एक वर्ष पहले भूमि खाली करने की सूचना मिलने पर क्षेत्र के सांसद बृजमोहन अग्रवाल और विधायक अनुज शर्मा ने उन्हें आश्वस्त किया था कि किसी का मकान नहीं टूटेगा। इसी भरोसे के कारण वे निश्चिंत रहे।

उनका कहना है कि बाद में 26 जून को नोटिस मिला और 29 जून को कार्रवाई से पहले पूरे गांव में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया। ग्रामीणों का आरोप है कि विरोध या सवाल उठाने वाले लोगों को गांव से दूर ले जाया गया, जिसके बाद मकानों को हटाने की कार्रवाई की गई।
इन दावों पर संबंधित जनप्रतिनिधियों या प्रशासन की प्रतिक्रिया इस समाचार के उपलब्ध होने तक सामने नहीं आई है।

किसान महासभा की मांगें
छत्तीसगढ़ किसान महासभा ने राज्य सरकार से प्रभावित परिवारों को सम्मानजनक मुआवजा देने, स्थायी पुनर्वास सुनिश्चित करने और पक्के आवास उपलब्ध कराने की मांग की है। संगठन ने यह भी कहा कि यदि भूमि के स्वामित्व को लेकर विवाद है तो उसकी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए और प्रभावित परिवारों के साथ संवाद स्थापित किया जाना चाहिए।
महासभा की जांच टीम में संयोजक नरोत्तम शर्मा के साथ डॉ. खंझन रात्रे और गोवर्धन पाल भी शामिल थे।

सम्मानपुर की बेदखली केवल भूमि विवाद का मामला नहीं, बल्कि पुनर्वास, आजीविका और नागरिक अधिकारों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है। एक ओर प्रशासन इसे शासकीय भूमि पर की गई कार्रवाई बता रहा है, वहीं प्रभावित परिवार और किसान संगठन भूमि के पुश्तैनी उपयोग तथा पुनर्वास के मुद्दे उठा रहे हैं। ऐसे मामलों में पारदर्शी जांच, संवेदनशील प्रशासनिक प्रक्रिया और सभी पक्षों की बात सुनकर समाधान निकालना ही दीर्घकालिक और न्यायसंगत रास्ता माना जाता है।

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