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वेदांता प्लांट हादसे पर उबाल: श्रमिक संगठनों के द्वारा 20 मजदूरों की मौत के बाद न्यायिक जांच, मुआवजा और सुरक्षा कानूनों के सख्त पालन की मांग

दुर्ग (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में स्थित वेदांता पावर प्लांट में हुए भीषण औद्योगिक हादसे के बाद श्रमिक संगठनों में गहरा आक्रोश देखा जा रहा है। ऐक्टू, सीटू, एटक और एसडब्ल्यूयू सहित विभिन्न श्रमिक संगठनों ने इस घटना को “व्यवस्था की घोर लापरवाही” बताते हुए राज्य सरकार से कठोर कार्रवाई की मांग की है। इसी क्रम में संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने संयुक्त कलेक्टर उतम ध्रुव के माध्यम से मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ शासन के नाम ज्ञापन सौंपा।

ज्ञापन में बताया गया कि इस दर्दनाक हादसे में अब तक 20 श्रमिकों की मौत हो चुकी है, जबकि 20 से अधिक मजदूर गंभीर रूप से घायल हैं। संगठनों ने मृतकों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए इसे केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी का परिणाम बताया। उन्होंने मांग की कि सभी घायलों का उच्च स्तरीय इलाज सुनिश्चित किया जाए और मृतकों के परिजनों को पर्याप्त मुआवजा देने के साथ परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए।

श्रमिक संगठनों ने इस पूरे मामले की न्यायिक जांच कराने की भी जोरदार मांग उठाई है। उनका कहना है कि जब तक जिम्मेदार अधिकारियों और कंपनी प्रबंधन के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं होती, तब तक ऐसे हादसे रुकने वाले नहीं हैं। ज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि राज्य की सभी औद्योगिक इकाइयों में सुरक्षा मानकों और श्रम कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि मजदूरों की जान के साथ खिलवाड़ बंद हो।

संगठनों ने यह भी रेखांकित किया कि मजदूरों को आज भी उचित मजदूरी, आवश्यक सुरक्षा उपकरण और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। उन्होंने कंपनी मालिकों पर “मुनाफे की अंधी दौड़” में श्रमिकों की सुरक्षा से समझौता करने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की।

इसी क्रम में एक दूसरा ज्ञापन प्रधानमंत्री, भारत सरकार के नाम भी सौंपा गया। इसमें नोएडा-मानेसर क्षेत्र में प्रदर्शन कर रहे मजदूरों के समर्थन में एकजुटता व्यक्त की गई। ज्ञापन में आरोप लगाया गया कि श्रमिकों के शांतिपूर्ण आंदोलनों को पुलिस प्रशासन द्वारा हिंसक तरीके से दबाया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है।

श्रमिक संगठनों ने मांग की कि सभी गिरफ्तार मजदूरों और यूनियन कार्यकर्ताओं को तुरंत रिहा किया जाए तथा श्रमिक आंदोलनों पर हो रहे दमन को तत्काल रोका जाए। उन्होंने न्यूनतम वेतन को “भुखमरी स्तर” का बताते हुए इसे बढ़ाकर 42,000 रुपये प्रतिमाह करने की मांग रखी। इसके साथ ही 12 घंटे के कार्यदिवस को अस्वीकार्य बताते हुए ओवरटाइम के लिए दोगुने भुगतान की गारंटी की मांग की गई।

ज्ञापन में श्रमिकों के लिए कार्यस्थल सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा को अनिवार्य बनाने की बात कही गई है। इसके अलावा श्रमिक विरोधी माने जा रहे चारों नए लेबर कोड कानूनों को रद्द करने, ठेका प्रथा समाप्त करने और फिक्स टर्म एम्प्लॉयमेंट को खत्म करने की मांग भी प्रमुख रूप से उठाई गई।

प्रतिनिधिमंडल में बृजेन्द्र तिवारी, जगन्नाथ त्रिवेदी, विनोद कुमार सोनी, नंदकिशोर गुप्ता, राजेंद्र परगनिया, टीकाराम चुनारकर, आर.पी. चौधरी, मुक्तानंद साहू, रघुवर गोंड, धनराज, समीम कुरेशी, शिव नारायण, आर.पी. गजेंद्र, विनोद तोरले, जोहनलाल साहू, शत्रुघ्न यादव और कुसुप दास सहित कई श्रमिक नेता शामिल थे।

श्रमिक संगठनों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई, तो वे व्यापक आंदोलन का रास्ता अपनाने के लिए बाध्य होंगे। यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि देश के औद्योगिक विकास की कीमत आखिर कब तक मजदूरों की जान देकर चुकाई जाती रहेगी।

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