मजदूरों की जान सस्ती नहीं, कोरबा में इंटक ने कहा- औद्योगिक हादसों में शीर्ष प्रबंधन तक तय होनी चाहिए जवाबदेही
कोरबा (पब्लिक फोरम)। औद्योगिक हादसों की जिम्मेदारी किस पर होनी चाहिए? इस संवेदनशील मुद्दे पर जाने-माने उद्योगपति नवीन जिंदल के हालिया बयान ने एक बड़े विवाद को जन्म दे दिया है। जिंदल द्वारा उठाए गए इस सवाल पर कि “क्या पीएसयू (PSU) में हादसा होने पर चेयरमैन पर एफआईआर (FIR) होती है?”, राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस (INTUC) ने तीखी और मार्मिक प्रतिक्रिया दी है।
इंटक ने इस बयान को ‘अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और भ्रामक’ करार देते हुए इसे उद्योगपतियों की अपनी मूल जवाबदेही से भागने की एक सोची-समझी कोशिश बताया है।
मुनाफे पर अपना हक, हादसों पर ठेकेदार का जिक्र!
इस पूरे विवाद की जड़ में वह दोहरा रवैया है जो दशकों से कॉरपोरेट जगत में चला आ रहा है। इंटक के कोरबा जिला अध्यक्ष शशांक दुबे और जिला सचिव संजय कुमार पटेल ने एक संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति जारी कर सीधा सवाल दागा है।
उन्होंने कहा, “जब कंपनियों का मुनाफा आसमान छूता है, तब उद्योगपति सीना तानकर कहते हैं कि यह हमारा विजन, हमारी मेहनत और हमारा निवेश है। लेकिन जैसे ही कोई जानलेवा औद्योगिक हादसा होता है, तो पूरी की पूरी जिम्मेदारी पलक झपकते ही किसी छोटे ठेकेदार, सुपरवाइजर या इंजीनियर के सिर फोड़ दी जाती है।” यह दोहरा मापदंड अब देश के मजदूर और कानून स्वीकार नहीं करेंगे।
उत्पादन की अंधी दौड़ और मजदूरों की जान की कीमत
एक अनुभवी विश्लेषक के नजरिए से देखें तो यह सिर्फ एक बयानबाजी का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह कारखानों की चिमनियों के नीचे पसीना बहाते उन हजारों मजदूरों की जिंदगी का सवाल है। इंटक के नेताओं ने इस कड़वी सच्चाई को उजागर किया कि उत्पादन बढ़ाने की अंधी दौड़ में अक्सर प्रबंधन द्वारा सुरक्षा मानकों की बलि चढ़ा दी जाती है।
फैक्ट्री इंस्पेक्टर और बॉयलर इंस्पेक्टर जैसे निगरानी तंत्रों को ‘प्रभावित’ करके प्रमाणपत्र हासिल करने का खेल किसी से छिपा नहीं है। दबाव ठेकेदारों पर बनाया जाता है और अंततः मजदूरों को असुरक्षित और खतरनाक परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। जब कोई हादसा होता है, तो वातानुकूलित कमरों में बैठे शीर्ष अधिकारी खुद को बचाने की जुगत में लग जाते हैं।
कानून से ऊपर कोई नहीं, न प्राइवेट, न पीएसयू
नवीन जिंदल के बयान को कानून की समझ के विपरीत बताते हुए इंटक ने ‘कारखाना अधिनियम, 1948’ (Factories Act, 1948) का हवाला दिया। यह कानून स्पष्ट रूप से “ऑक्यूपायर” (Occupier) यानी कारखाने के वास्तविक नियंत्रक की जिम्मेदारी तय करता है।
उत्पादन क्षमता को बढ़ाने या नीतियों में बदलाव का निर्णय कोई ठेकेदार नहीं लेता, बल्कि यह कंपनी के बोर्ड और उच्च प्रबंधन द्वारा तय किया जाता है। इसलिए, जब फैसले उनके हैं, तो हादसों की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होनी चाहिए। इंटक ने दो-टूक लहजे में कहा कि नियम और कानून सबके लिए समान हैं। कोई भी उद्योगपति, चाहे उसका कद कितना भी बड़ा क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं हो सकता।
इंटक की सीधी चेतावनी:
अपनी विज्ञप्ति के अंत में, शशांक दुबे और संजय कुमार पटेल ने स्पष्ट शब्दों में मजदूर हित का शंखनाद करते हुए कहा:-
*औद्योगिक हादसों में जवाबदेही हर हाल में तय होगी और यह जांच शीर्ष स्तर तक जाएगी।
*ऐसे भ्रामक बयान देकर जनता और सिस्टम को गुमराह करने की कोशिशें तुरंत बंद होनी चाहिए।
*हादसों का शिकार हुए पीड़ित श्रमिकों और उनके परिवारों को न्याय मिलना ही चाहिए।
“इस बयान ने एक बार फिर इस बहस को जिंदा कर दिया है कि देश के विकास का पहिया घुमाने वाले मजदूर की जान आखिर कितनी सस्ती है? अब वक्त आ गया है कि “मुनाफे का निजीकरण और हादसों का राष्ट्रीयकरण” करने की इस पुरानी कॉरपोरेट आदत पर विराम लगे। जवाबदेही से भागना अब कोई विकल्प नहीं है।”





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