महासमुंद (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ के महासमुंद ज़िले के एक छोटे-से गाँव डुमरपाली की बेटी टिकेश्वरी ध्रुव ने वह कर दिखाया, जो कई बड़े शहरों के युवाओं के लिए भी सपना बना रहता है। टिकेश्वरी ने रसायन विज्ञान (Chemistry) में पीएचडी की उपाधि प्राप्त कर न केवल अपने परिवार और गाँव का नाम रोशन किया, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ को गर्व से भर दिया। खास बात यह है कि उन्होंने अपनी शोध के लिए किसी विदेशी विषय को नहीं चुना – बल्कि छत्तीसगढ़ की रसोई की शान, यहाँ की देसी भाजियों को अपने शोध का आधार बनाया।
भाजी में छुपा विज्ञान – एक अनूठी शोध
छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी विविध भाजियों से है। चाहे वह लाल भाजी हो, चेंच भाजी हो या कोई और – यहाँ के लोग इन्हें सदियों से बड़े चाव से खाते आए हैं। लेकिन इन भाजियों में कितना पोषण है, इसे वैज्ञानिक तरीके से प्रमाणित करने का काम टिकेश्वरी ने किया।
उन्होंने अपनी पीएचडी शोध में इन देसी भाजियों में पाए जाने वाले “विटामिन B1, B2, B3, B6 और B9” की मात्रा का विधिवत परीक्षण और विश्लेषण किया। यह शोध न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि आम जनजीवन के लिए भी अत्यंत उपयोगी है – क्योंकि इससे यह पता चलता है कि हमारे पूर्वजों की थाली में पोषण का कितना गहरा विज्ञान छुपा था।

पुरखों की विरासत को मिला वैज्ञानिक सम्मान
टिकेश्वरी की इस शोध का एक और गहरा अर्थ है। हमारे पुरखों ने अपने जीवन-अनुभव से अनेक बातें जानी और समझीं – उन्होंने जाना कि कौन-सी भाजी शरीर को ताकत देती है, कौन-सी बीमारी में काम आती है। लेकिन अक्षर ज्ञान के अभाव में वे इसे लिख नहीं सके, प्रमाणित नहीं कर सके। उनकी यह अनमोल विरासत पीढ़ी-दर-पीढ़ी मुँह से मुँह तक चलती रही, पर उसे कभी वह श्रेय नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी।
टिकेश्वरी ध्रुव ने अपनी शोध के ज़रिए उस लोकज्ञान को वैज्ञानिक मंच पर प्रतिष्ठित किया है। यह केवल एक पीएचडी नहीं है – यह हमारे पुरखों की अनकही मेहनत को मिला एक देर से, पर सच्चा सम्मान है।
समाज ने जताई खुशी, बधाइयों का तांता
टिकेश्वरी की इस उपलब्धि की खबर जैसे ही फैली, डुमरपाली से लेकर महासमुंद तक और पूरे छत्तीसगढ़ में बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया। समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने उन्हें शुभकामनाएँ दीं और उनकी इस यात्रा को प्रेरणादायी बताया।
यह उपलब्धि उन तमाम लड़कियों के लिए भी एक संदेश है, जो छोटे गाँवों में रहकर बड़े सपने देखती हैं – कि गाँव की मिट्टी से भी पीएचडी के फूल खिल सकते हैं, बशर्ते मन में लगन हो।
नए शोधार्थियों के लिए एक नई राह
टिकेश्वरी की यह शोध आने वाले शोधार्थियों के लिए भी एक नई दिशा खोलती है। छत्तीसगढ़ में सैकड़ों प्रकार की भाजियाँ और वनस्पतियाँ पाई जाती हैं, जिन पर अब तक बहुत कम वैज्ञानिक कार्य हुआ है। टिकेश्वरी ने जो पहला कदम उठाया है, वह इस क्षेत्र में शोध की एक पूरी नई परंपरा की शुरुआत हो सकती है।
“डुमरपाली की इस बेटी ने यह साबित कर दिया कि शोध के लिए विदेशी विषयों की ज़रूरत नहीं – अपनी ज़मीन, अपनी थाली और अपने पुरखों की विरासत में ही ज्ञान का अथाह सागर छुपा है। टिकेश्वरी ध्रुव को “पब्लिक फोरम” की ओर से हार्दिक बधाई और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना।





Recent Comments